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जन्म स्वप्न है, मरण स्वप्न है। आत्मज्ञान कविता।
सत्यम
जन्म स्वप्न है, मरण स्वप्न है, स्वप्न है, ये जीवन सारा, भौतिक स्वप्न है, सुक्ष्म स्वप्न है, स्वप्न ही है, अनुभव सारा। जागृति स्वप्न है, सुक्ष्म स्वप्न है, विस्मय है, अनुभव धारा, देश नहीं है, काल नहीं है **"मैं ही सत्य"**,**"देखने वाला"** ।। कविता का आशय: सभी अवस्थाएं स्वप्न के समान होती हैं जोकि असत्य है, मिथ्या है। चाहे वह स्वप्न हो, सुसुप्ति हो, जागृति हो या तुरिय ही क्यों न हो। न तो जीवन ही है, और न मृत्यु ही है। क्योंकि इस अनुभव में अजैविक से जैविक, और जैविक से जीवन बनता है। जिसका सीधा सा तात्पर्य है कि जीवित और निर्जीव में कोई भेद नहीं है। इस प्रकार, संपूर्ण अनुभव, सदा से अनुभवकर्ता के सामने गतिमान रहता है। जिसपर मनुष्य की बुद्धि बार बार विस्मय करती है, उसको जानने का प्रयास करती है, उसको किसी प्रकार से पकड़ने और धारण करने का प्रयास करती है। परंतु सब बेकार है। स्वयं बुद्धि भी, उसी बदलती हुई धारा का ही भाग सिद्ध हो जाती है। मनन करने पर समय और स्थान या समय स्थान की धारणा बिल्कुल गलत साबित होती है। अंत में सत्य के मानदंड के अनुसार, वह जो निरंतर इस प्रतीत होती धारा का स्थिर और सर्वव्यापी दृष्टा है। वही सत्य सिद्ध होता है। वह सत्य अनुभवकर्ता ही मेरा वास्तविक स्वरूप है। इस अस्तित्व का तत्व है जिसे धारण किया जाना चाहिए। धन्यवाद।
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