ज्ञानाक्षर
वर्षा ऋतू करे इशारा
निशिगंधा क्षीरसागर
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वर्षा ऋतू लायी दिलासा बारिश बरसे तृप्त वसुधा शांत करकें सारी सुधा घनघोर गगन छायी घटा आकाश चहूऔर अंधियारा घिरा आषाढ मेघ काळे काळे आक्रंद जैसे बादल गिरे आसू जैसे बरसे मेघा बरसे वर्षा घनन घोर झर गये बादल अब शांत आकाश हलके बादल काले मेघ अब श्यामरंगी रिमझिम रिमझिम मन रिझायें दुःख ढला ऋतू बरवा शरद ऋतू सुखदायी गारवा दव में सुख कें भिगे दुःख कें मोती क्षण मनहर सुखकें जैसे थमे थमे रुके रुकेसें सुखमें छिपा दुःख पुन्हा ऋतू कें बाद ऋतू चलता उत्पत्ती स्थिती लय चला आवर्त यही पुन्ह: पुन्ह: आवर्त सुख और दुःखो का आवर्त ऋतूचक्र जीवन का आवर्त जीवन जन्म मरण का दुःख पीडा संकट व्यथा निमित्त मात्र जीवन कथा प्रगती विकास कें चिन्ह सूचकता जानले जीव ब्रह्म कीं एकता स्वरूप भुलकर जीव का जीवपना यही तो हुवा सारा गुन्हा जन्म मरण पुन्हा पुन्हा दुष्टचक्र जैसे पानी का चला ग्रीष्म ऋतू सर्वत्र उष्मा तपकर सूक्ष्म भाप आकाशा सूक्ष्म सें स्थूल फिर धरा देह में बनकर जीवपना..... काल सें बद्ध देह सिमीत असीम कालातीत अविकारी स्वस्वरूप कसे प्राप्त करे यह निजस्वरूप? प्रश्न है अज्ञानी जीव का गुरुवाणी बतावे उपाय शिष्यको अर्जुन होकर उठा गांडीव खुद का युद्ध खुद हि लढ चक्र सुदर्शन लेकर हाथ गुरुकृपा सें चक्रव्युह भेद इच्छा अपेक्षा विकार वासना स्मृती संस्कार विचार भावना चित्तमें छिप गयी मानवा अपूर्णताको काट अनुभव पूर्णत्व पूर्तीहतू हुई माया कीं रचना तृप्ती समाधान संतुष्टी में होकर स्थित रह सदा अब ना कर कोई नई इच्छा ना स्पृहा वापस लौटनें सागर स्वरूपा सरिता बेहती नित्य सदा आस अनामिक प्रकृती जान दुर्लभ प्राप्ती मानुष जन्म जीवनरूपी स्वप्न देहरूपी साधन संसार में छिपा सत्य सार ढुंढ उसे खोज कारण इसीलिये प्राप्त है सारे साधन दुःख है प्रभाव संसारमात्र कारण बगैर संभव कैसे ?? खोज कारण कर मनन गुरुवचन श्रवण मनन निदीध्यासन दुःखकीं निवृत्ती सुखकीं प्राप्ती लक्ष्य बना इसी जनम मानव जन्म सें मुक्ती यही सार्थकता मानव जन्म कीं त्याग संसारी क्षणिक सुख प्राप्त कर शाश्वत स्वरूप नित्य आनंद निरव शांतता सत ओंकारी शब्दातीत मौनता साक्षी होश में खोज जरा तुझमें छिपा स्वरूप तेरा तुझमें छिपा स्वरूप तेरा वर्षा ऋतू करे इशारा ऋतूचक्र प्रकृती करे इशारा खुद को खोज ले जरा तुझमें छिपा स्वरूप तेरा तुझमें छिपा स्वरूप तेरा.....