Wise Words
Home
Read
Write
Publish
Profile
Logout
अकर्ता
दिप्तज्योती
देखिए,, जब भी हम विचारशून्य हो जाते हैं ।या हम सो जाते हैं।। या शांत हो जाते हैं ।।या होश बढ़ने पर सजगता से देख लेते हैं ।।यह जितना भी सब कुछ हमारे सामने दिख रहा है,, यह सब सिर्फ विचार मात्र है।। विचार के खेल से ही सारा संसार प्रकट होता है और विचार शून्यता में संसार नहीं है।। इस स्थिति को प्राप्त करने पर यह जो जीव नाम की व्यवस्था है,, वह खत्म हो जाती है।। परंतु यदि इस जीव में कोई भी विचार शेष रह गया तो वह फिर से नया संसार खड़ा कर लेता है।।।इसी ज्ञान की उपलब्धता ही दृष्टि पलट जाना है और यही आध्यात्मिकता का सार है।। विचारों के सिलसिले से एक के बाद एक संसार खड़ा हो जाता है क्योंकि कुछ ना कुछ चाह है । चाह अर्थात विचार।। चाह रही तो विचार बनेंगे।। और आश्चर्य यह है कि विचार भी कहीं से दिए जा रहे हैं, स्वतः ही उठ रहे हैं।।विचार बनेंगे तो संसार खड़ा हो जाएगा।। तो जीते जागते विचार शून्यता अर्थात इच्छा रहित या आसक्ति रहित हो जाने से ही जीवन मुक्त दशा बन जाती है तथा बंधन से मुक्ति की दशा होती है।। इससे अकर्ता पन का बोध होता है और साथ ही साथ जो हो रहा है,, वह बस हो रहा है।। यह आपके अंदर जागरण बनता है।। फिर आप प्रकृति गत किसी भी कार्य में हस्तक्षेप नहीं करते हैं और कर्ता होते हुए भी हर कार्य में को करते हुए देखते हैं या होते हुए देखते हैं।। अध्यात्म का सार जो मैंने समझा,, या जाना ।।यही स्वरूप का बोध है।। कर्ता में अकर्ता और अकर्ता होते हुए भी कर्ता।।।
Share This Article
Like This Article
© Gyanmarg 2024
V 1.2
Privacy Policy
Cookie Policy
Disclaimer
Terms & Conditions