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नया नाम, नया जन्म, नया आरोपण।
सत्यम
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नया नाम, नया जन्म, नया आरोपण नई वस्तु, नई मान्यता नया भेद, नई सीमा, नया अज्ञान। क्या होता है जब एक नया नाम दिया जाता है? जब भी मानव द्वारा एक नया नाम दिया जाता है, तब एक नई वस्तु जन्म लेती है सच्ची नहीं, बल्कि एक काल्पनिक वस्तु। मनुष्य के चित्त में, उसकी धारदार एवं व्याख्याकार बुद्धि एक वस्तु का निर्माण करती है, जिसका उसने अभी नामकरण किया है। यह मानव बुद्धि की एक बड़ी क्षमता है, जो भूतकाल एवं वर्तमान पैमाने का मानव जीवन जीने के लिए बहुत सहायक सिद्ध हुई है। जब एक बार नाम रख दिया जाता है, तब उस वस्तु को मानव चित्त में एक स्वतंत्र अस्तित्व मिल जाता है। तब इस अद्वैत अस्तित्व के फिर से दो टुकड़े किए जाते हैं एक, वह वस्तु जिसका नाम अभी रखा गया है, और दूसरा, उस वस्तु को छोड़कर बचा हुआ सारा अस्तित्व जिसको चित्त के अंदर मानव ने पहले से ही अनंत नामों द्वारा अनंत भागों में, अपनी व्याख्या, अपने नियमों और अपने सीमित ज्ञान के आधार पर बाँट रखा है। विभाजन कहाँ होता है? पर याद रहे यह विभाजन हुआ है केवल चित्त में। अस्तित्व वही रहता है जो वह है अद्वैत। मनुष्य की बुद्धि ऐसे ही काम करती है। उसे उसकी सीमित इंद्रियों द्वारा केवल सीमित अनुभव होते हैं, क्योंकि सम्पूर्ण अस्तित्व का अनुभव एक बार में संभव नहीं है। इन्हीं सीमित, अधूरे और विकृत अनुभवों के आधार पर यह बुद्धि विभाजन का यह खेल खेलती है। मानव अपनी सीमित क्षमताओं और समझ से हर चीज़ की व्याख्या करता है। और नया ज्ञान प्राप्त करता है। और इसी प्रकार, मानव प्रजाति ने इस धरती पर अपने जन्म से लेकर आज तक, युगों-युगों में, अपने ज्ञान का सम्पूर्ण ताना-बाना बुना है और उसे पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित करता रहा है, ताकि अगली पीढ़ी को जीवन जीने में सहायता मिल सके। नाम कैसे फैलता है और सामूहिक सत्य जैसा बन जाता है? जब कोई नाम दिया जाता है, तब केवल वही व्यक्ति नहीं, बल्कि हर वह व्यक्ति जो उस नाम को सुनता है और अपने अनुभव, तर्क, विज्ञान के सिद्धांत, गणित के सूत्र या प्रेरणा आदि के माध्यम से उसे स्वीकार करता है उन सभी के चित्त में भी वही वस्तु जन्म ले लेती है। और जब व्यक्तियों का एक बड़ा समूह उस पर स्वीकृति देता है, तब यह नया सिद्धांत मान्यता और मत आरोपण के माध्यम से बहुत तेजी से फैलता है। क्या यह सब सत्य है? इसी प्रकार से, आप जितने भी विभिन्न नामों को जानते हैं (उन नामों को छोड़कर जो अस्तित्व के समानार्थी हैं), वे सभी आपके चित्त में अलग-अलग वस्तुओं का निर्माण करते हैं। पर वास्तव में यह सभी विभाजन झूठ हैं, और अज्ञान हैं। अद्वैत का सत्य अस्तित्व में कोई भेद नहीं है, जिसे नाम देकर दूसरे से अलग किया जा सके। अस्तित्व में कोई सीमा नहीं है, जो उसे भागों में बाँट सके। यहाँ कभी कोई अलग अलग या भिन्न वस्तु नहीं, और न ही कभी हो सकती है। यह सदा एक ही है अद्वैत अस्तित्व। अंतिम बोध अब अस्तित्व या अद्वैत शब्द को भी त्याग दो। और वह, जिसके भीतर रहकर इन सभी नामों को दिया गया है वही और केवल वही अद्वैत दर्शन का सच्चा ज्ञान और सार है।