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ज्ञानोक्तियाँ
तरुण प्रधान
## ज्ञानमार्ग ज्ञानमार्ग मार्गहीन मार्ग है। सीधा लक्ष्य पर ले जाता है। ज्ञानमार्ग का लक्ष्य अज्ञान का नाश करके स्वयं के तत्व में स्थित होना है। ज्ञानमार्ग वैश्विक है, किसी भी संप्रदाय या स्थान या काल से सम्बंधित नहीं है। ज्ञानमार्ग सर्वश्रेष्ठ और अंतिम मार्ग है। ज्ञानमार्ग शुरू होते ही समाप्त हो जाता है। ज्ञानमार्ग के फल विरक्ति, शुद्धि, मौन, शांति, आनंद, समाधी, आवागमन मुक्ति, मोक्ष, निर्वाण, तेज विकासक्रम आदि हैं। किन्तु ये लक्ष्य नहीं हैं। ज्ञानमार्ग में कोई साधना नहीं है। किन्तु शिष्य के कल्याण हेतु कोई साधना दी जा सकती है। ज्ञानमार्ग में ज्ञान नहीं मिलता। ज्ञानमार्ग से कोई सांसारिक लाभ नहीं मिलता। ज्ञानमार्ग में कोई प्रगति नहीं होती। या तो अज्ञान नष्ट होगा या रह जायेगा। ज्ञानमार्ग में कोई शाब्दिक ज्ञान नहीं होता। शब्द संकेत मात्र हैं। ज्ञानमार्ग में कोई बौद्धिक ज्ञान नहीं होता। बुद्धि की शुद्धि होती है। ज्ञानमार्ग विनाशक मार्ग है। यहाँ खोना ही पाना है। ज्ञानमार्ग में कुछ मिलता नहीं बल्कि सब खो जाता है। जो तैयार हैं उनके लिए ज्ञानमार्ग सरल है। बाकी के लिए कठिन। साधक के गुणों का होना तैयारी का चिन्ह है। ज्ञानमार्ग में न कर्मकांड हैं न कोई नियम। यहाँ पूर्ण स्वतंत्रता है। ज्ञानमार्ग में कई दर्शन, परम्पराएं, संघ, उपमार्ग आदि हैं। परन्तु इनसे जुड़ना आवश्यक नहीं। ज्ञानमार्ग किसी पुस्तक पर आधारिक नहीं, पर हज़ारों पुस्तकें ज्ञानमार्ग पर आधारित हैं। विज्ञान ज्ञानमार्ग की एक शाखा है। तंत्र ज्ञानमार्ग का सहयोगी मार्ग है। ज्ञानमार्ग सबके लिए नहीं है। करोड़ों में एक को मिलता है। दुर्लभ है। ## लक्ष्य ज्ञानमार्ग का लक्ष्य लक्ष्यहीन होना है। किसी भी आध्यात्मिक मार्ग का लक्ष्य स्वयं के सत्य को जानना और अपने मूल स्वरुप में स्थित रहना है। मनुष्य का लक्ष्य मनुष्य जीवन से मुक्ति है। जीवों का प्राकृतिक लक्ष्य सुख और मुक्ति है। सिद्धियाँ, विचित्र अनुभव, विभिन्न लक्षण आदि साधना का लक्ष्य नहीं, साधना से भटकना है। अज्ञानी का जीवन लक्ष्य प्रारब्ध से निर्धारित होता है। जीवन का कोई ऊँचा लक्ष्य न होने पर व्यक्ति दुःख और दासता का जीवन जीता है। यदि आप अपना लक्ष्य नहीं निर्धारित करते तो दूसरे कर देंगे और आप आजीवन उनकी गुलामी करेंगे। किसी और से लक्ष्य लेना मानसिक गुलामी है। सबसे ऊँचा लक्ष्य स्वयं को जानना है। दूसरों से मिला लक्ष्य या थोपा गया लक्ष्य दुःख और पतन का कारण होता है। ऐसा जीवन व्यर्थ होता है। आपने जीवन का लक्ष्य स्वयं चुनें। सही प्रारब्ध या जीवन लक्ष्य न होने पर एक समर्पित शिष्य को गुरु लक्ष्य प्रदान करते हैं। कोई लक्ष्य न होना मूर्खता और अज्ञान का लक्षण है। जब कोई बड़ा लक्ष्य नहीं होता तो तुच्छ बातें बड़ी हो जाती हैं। जीवन लक्ष्य बदल सकता है या २-३ लक्ष्य हो सकते हैं। इससे अधिक संख्या में लक्ष्य होना लक्ष्यहीनता ही है। बिना लक्ष्य के की गई साधना निरर्थक है। लक्ष्य चुनना पड़ता है, दिया नहीं जाता। साधक का उप-लक्ष्य गुणों का विकास करना है। अस्तित्व लक्ष्यहीन है। न पाने का कुछ है न त्यागने का। ## मार्ग मार्ग लक्ष्य तक पहुँचने का साधन मात्र है। मार्ग लक्ष्य आधारित है। लक्ष्य नहीं है, तो सभी मार्ग बेकार हैं। सबका मार्ग अलग होगा। सबको यह स्वयं निर्धारित करना है। किसी और के मार्ग पर चलना निरर्थक है। भेड़चाल है। मनगढंत या मनमानी साधना फलहीन या हानिकारक हो सकती है। मार्गों में भिन्नता है क्योंकि साधकों के मनो-शरीरों में भिन्नता है। कोई मार्ग ऊँचा है कोई नहीं, क्योंकि सबकी प्रगति का स्तर अलग अलग है। जैसा साधक वैसा मार्ग। मार्ग युगों और स्थानों के अनुसार बदलते रहते हैं, आते जाते हैं, क्योंकि मनुष्य बदलता रहता है। सही मार्ग वो है जो लक्ष्य तक पहुँचाये , जहाँ साधक की प्रगति हो। जो सबसे प्रिय है वही सबसे अच्छा मार्ग है। जो सबसे आकर्षक लगे वो मार्ग पहले आज़माना चाहिए। ज्ञानमार्ग पर सफल होने पर सभी मार्ग अर्थहीन हो जाते हैं। ज्ञानमार्ग सबसे पहले आज़माना चाहिए, क्योंकि यह शुरू होते ही समाप्त हो जाता है और यदि यहाँ सफलता मिलती है, तो बहुत समय और प्रयास बच जाता है। ## गुरु शिष्य गुरु बिन ज्ञान नहीं होता। जो गुरु के मार्गदर्शन में न की जाये वो साधना फलदायी नहीं होती। गुरु वो है जो अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाता है। सद्गुरु वो है जो आत्मज्ञान देता है। गुरु ज्ञान का साधन नहीं है। गुरु केवल संकेत करता है। गुरु से बड़ा कोई नहीं। व्यक्ति गुरु नहीं हो सकता। व्यक्ति माध्यम हो सकता है। सच्चा गुरु तत्व स्वयं है। व्यक्ति के माध्यम से प्रकट है। मार्ग में सफलता के लिए देहधारी (जीवित) गुरु होना आवश्यक है। एक साधक के कई गुरु हो सकते हैं। पालक से सद्गुरु तक। जो सीखा दे वो गुरु है। जो आपसे अधिक जानता है वो आपका गुरु है। जो प्रिय है वो गुरु है। गुरु का सबसे बड़ा गुण करुणा है। पंडित होना और गुरु होना बहुत अलग है। सारा संघर्ष बस गुरु मिलने तक का है। शिष्य तैयार है तो गुरु तैयार है। सबसे नीच कर्म गुरुजनों का अपमान करना है। गुरु-शिष्य संबंध पूर्णतया निजी संबंध है और कई जन्मो तक रहता है। गुरु और शिष्य दो नहीं हैं। ज्ञान होने पर शिष्य गुरु हो जाता है। कोई फर्क नहीं रह जाता। सबसे बुरा दुर्भाग्य गुरु द्वारा त्यागा जाना है। गुरु के निर्देशों को न मानना गुरुहीन होने के समान है। सभी गुरुजनों में एक ही गुरु विद्यमान है। गुरु केवल शिष्य की प्रगति चाहता है और कुछ नहीं। गुरु सब छीन लेता है। गुरु-शिष्य संबंध सबसे बड़ा है। गुरु मेरा सबकुछ है। बाकी संबंध झूठे हैं, स्वार्थ के हैं। गुरु वो है जिसने आपके कल्याण के लिए अपनी मुक्ति रोक दी है। ये सबसे बड़ा त्याग है। शिष्य को हमेशा अपने स्तर का गुरु मिलता है। शिष्य गुरु के स्तर तक नहीं आ सकता , गुरु शिष्य के स्तर तक आता है। शिष्य गुरु नहीं चुनता , गुरु शिष्य चुनता है। यदि आप गुरु से भी अधिक जानते हैं, तो आप ही गुरु हैं। गुरु स्वयं को गुरु नहीं कहता, दम्भी मुर्ख अपने आप को गुरु मानते हैं। अज्ञानी की पहचान है कि वो स्वयं को गुरु से बड़ा मानता है। सुपात्र शिष्य वो है जो अपने गुणों का विकास करता है। असली गुरुदक्षिणा शिष्य की प्रगति है। गुरुपूजा मूर्खता है। गुरु के निर्देशों पर चलना बुद्धिमानी है। गुरु को प्रेम से प्रभावित किया जाता है न कि पांडित्य से। गुरु-शिष्य का प्रेम सबसे बड़ा है क्योंकि निस्वार्थ है, दिव्य है। जो गुरु कर रहा है वो करना गुरुऋण चुकाना है। सद्गुरु मिलना अंतिम जन्म का सूचक है। ## ज्ञान ज्ञान स्मृति में अनुभवों का तार्किक संयोजन है। ज्ञान के बिना जीवन असंभव है। अज्ञान का नाश ही ज्ञान है। ज्ञान भी मिथ्या है , अज्ञान भी। अज्ञान का सबसे बड़ा कारण मतारोपण है। स्मृति की शुद्धि ही ज्ञान है। ज्ञान हमेशा नकारात्मक होता है। सकारात्मक ज्ञान अज्ञान है। बौद्धिक ज्ञान अज्ञान ही है। शाब्दिक ज्ञान अज्ञान ही है। जो बिना प्रमाण के सत्य मान लिया गया है वो अज्ञान है। अज्ञान होना ज्ञान का भ्रम होने से अच्छा है। अनुभव नहीं तो ज्ञान नहीं। ज्ञान त्याग मात्र है। ज्ञान संचय नहीं है। खोना है। जो भी स्मृति में जमा है अज्ञान ही है। ज्ञान नहीं हो सकता केवल अज्ञान का नाश हो सकता है। ज्ञान अज्ञेयता तक पहुँचने की सीढ़ी है। कहीं से सुन लेना या पढ़ लेना ज्ञान नहीं। अस्तित्व में जानने का कुछ नहीं। अनुभवकर्ता में न ज्ञान है न अज्ञान। ज्ञान का परिणाम पाण्डित्य नहीं अज्ञेयता है। ज्ञान मान्यताओं का त्याग है। सूचना ज्ञान नहीं। विज्ञान ज्ञान नहीं पर उपयोगी है। ज्ञान का कोई उपयोग नहीं है। कहीं से एक-दो वाक्य सुन लेना ज्ञान नहीं है। न ज्ञान होता है न ज्ञानी। केवल मिथ्या का ही ज्ञान होता है। ज्ञान हुआ है इसका लक्षण कोई शंका न बचना है। जो चरणबद्ध अनुशासित नहीं चलता या निर्देश नहीं मानता उसे ज्ञान नहीं होता। ज्ञानी का कोई विशेष व्यव्हार या गुण नहीं होता। साधारण होता है। ज्ञान समर्पण की ओर ले जाता है। सच्चा ज्ञान विनम्रता लाता है दम्भ नहीं। कोई भी ज्ञानी स्वयं को ज्ञानी नहीं कहता। ज्ञान का अंतिम चरण अज्ञेयवाद है। अज्ञानी ज्ञानी को नहीं पहचान सकता। अज्ञान की पहचान दुःख, आसक्ति, अशांति, असंतुष्टि और हिंसा है। ज्ञान का परिणाम मुक्ति, शांति, आनंद और विरक्ति है। अज्ञानी को अज्ञानी कहने से वो हिंसक हो जाता है, अपना अज्ञान नहीं छोड़ देता। मुर्ख को मुर्ख कहने से वो और जड़ हो जाता है, बुद्धिमान नहीं हो जाता। लोग ज्ञान नहीं खोजते , अपनी मान्यताओं का समर्थन खोजते हैं। सच्चा खोजी वो है जो अपने अनुभव से सीखता है। ज्ञान का परिणाम अधिक जानना नहीं , होना है। आप जो हैं वो हो जाते हैं। जो हो वो हो जाओ। माया का ज्ञान भी माया है। न जानना जानने से श्रेष्ठ है। मानो मत , जानो। जो स्वयं को नहीं जानता वो कुछ नहीं जानता। स्वयं को जान लेना सम्पूर्णता को जान लेना है। ज्ञान की इच्छा कृपा से मिलती है। आत्मज्ञान सबसे बड़ा ज्ञान है। आत्मज्ञान अंतिम ज्ञान है। आत्मज्ञान अपनी दिव्यता को पहचान लेना है। आत्मज्ञान सीमित से असीमित हो जाना है। आत्मज्ञान अहम् या व्यक्ति की मिथ्या देख लेना है। जिस जन्म में आत्मज्ञान होता है वो अंतिम जन्म है। ## सत्य अस्तित्व में न सत्य है न असत्य और दोनों का आभाव भी नहीं। सत्य के मानदंड व्यक्तिनिष्ठ और ऐच्छिक है। अपना सत्य स्वयं खोजें। किसी के कहने से कुछ सत्य नहीं हो जाता न वो असत्य होता है। मेरे कहने से कुछ सत्य नहीं हो जाता। जो मेरी बातों को बिना परखे सत्य मान लेता है, अंधविश्वासी है। सत्य कड़वा होता है। सत्य जानने के लिए साहस चाहिए। सत्य बहुत सरल है इसलिए बुद्धि उसे नकार देती है। आम व्यक्ति की बुद्धि कहती है कि सत्य जटिल होना चाहिए जो हज़ार पुस्तकें पढ़ने पर मिलगे। वास्तव में सत्य दो शब्दों में लिखा जा सकता है। आपको सत्य नहीं मिलता क्योंकि आप उसे गलत जगह खोज रहे हैं। सत्य आपके भीतर है। जो बदलते हुए अनुभवों में सत्य खोजता है वो केवल भ्रमित होता है। जो नहीं बदलता वो परमसत्य है। व्यावहारिकता में सत्य का कोई उपयोग नहीं है। सारा जीवन असत्य ही है। माया में माया ही काम आती है। सत्य मनुष्य की कल्पना मात्र है। तत्व ही सत्य है। उपयोगी असत्य विसत्य है। सत्य अज्ञेय है। जो सत्य नहीं जान सकता उसको सत्य के नाम पर ऐसा असत्य बताया जाता है जिससे उसकी प्रगति हो। सत्य बहुस्तरीय है। निचले स्तर का सत्य ऊपरी स्तर पर असत्य होता है किन्तु ऊपरी सत्य निचले स्तर पर भी सत्य होता है। उपयोगिता सत्य का उचित मानदंड नहीं है। वैज्ञानिक धारणाएं उपयोगी हैं पर सत्य नहीं। उपयोगी होने और सत्य होने में फर्क है। हर सन्दर्भ का अपना सत्य होता है। जैसे गणितीय सत्य, वैज्ञानिक सत्य, स्वप्न सत्य। सत्य जानना हर साधक का कर्तव्य है। अज्ञानी जो सुन लेता है उसे सत्य मान लेता है। सत्य की परीक्षा अपरिवर्तनशीलता है। जो बदल गया वो झूठ है। सत्य जाना नहीं जा सकता हुआ जा सकता है। वो आप पहले से ही हैं। अपनी मान्यताओं पर प्रश्नचिन्ह लगाना बुद्धिमानी है। प्रगति मान्यताओं के त्याग से होती है। ## अस्तित्व पूर्ण शून्य अस्तित्व पूर्ण भी है शून्य भी। शून्य ही पूर्ण हो सकता है। शून्य ही अनंत है। अस्तित्व अनंत संभावना है। मैं ही अस्तित्व हूँ। मैं पहले से पूर्ण हूँ पहले से शून्य हूँ। शून्यता का अर्थ कुछ न होना नहीं है। अनास्तित्व संभव नहीं। अस्तित्व का तत्व अनुभवकर्ता है। अस्तित्व ही अनुभवकर्ता है। अस्तित्व निर्गुण है। गुण प्रतीत होते हैं। अस्तित्व को अपने ही मिथ्या रूपों का अनुभव हो रहा है। अनुभवक्रिया ही अस्तित्व है। जो है वो है। सात प्रश्न मनुष्य निर्मित धारणाएं हैं। अस्तित्व पर लागू नहीं होते। अज्ञान अस्तित्व पर मान्यताओं और धारणाओं का आरोपण है। अस्तित्व अज्ञेय है। अनुभव शून्य है। अस्तित्व में वास्तव में कुछ नहीं होता। परिवर्तन प्रतीत होता है। अस्तित्व समयहीन है। समय धारणा मात्र है। मैं ही वो अस्तित्व हूँ। मैं और आप एक ही हैं। ## व्यक्ति मैं अनुभवकर्ता दृष्टा साक्षी मैं की स्थिति बदलती रहती है। वस्तुओं से लेकर अस्तित्व तक। जो बदल गया वो मिथ्या है। आत्मज्ञान के पहले मैं का अर्थ मनोशरीर है और आत्मज्ञान के बाद मैं अनुभवकर्ता है। अज्ञानी में मैं अधिकतर अहम् की ओर संकेत करता है। व्यक्ति मिथ्या है। धारणा मात्र है। व्यक्ति नहीं है। केवल मैं हूँ। सभी अनुभवकर्ता हैं , कुछ जानते हैं कुछ नहीं। अनुभवकर्ता कुछ नहीं करता। साक्षी मात्र है। मैं कर्ता नहीं दृष्टा हूँ। व्यक्ति साक्षी नहीं बन सकता। व्यक्ति का नाश साक्षी का उदय है। साक्षीभाव चित्तवृत्ति मात्र है। ज्ञान का स्मरण साक्षीभाव है। मैं पहले से ही साक्षी हूँ। किसी साधना से साक्षी नहीं हो जाऊंगा। आत्मज्ञान मनोशरीर से पहचान का मिटना है। मैं कोई अनुभव नहीं यही आत्मज्ञान है। अनुभव अनुभवकर्ता नहीं हो सकता और अनुभवकर्ता अनुभव नहीं हो सकता। दृश्य दृष्टा का भेद जानना आत्मज्ञान है। मेरा तत्व अनुभवकर्ता है। तत्वज्ञान ही आत्मज्ञान है। केवल अनुभवकर्ता सत्य है। सभी अनुभव माया हैं। मैं ब्रह्म हूँ कहना अहम् का पूर्ण नाश दर्शाता है। मैं मनुष्य हूँ कहना अहंकार दर्शाता है। अनुभव और अनुभवकर्ता दो नहीं एक हैं। जैसे लहर और पानी। मैं स्वयं अस्तित्व हूँ। मैं और आप एक ही हैं। एक हो जाना प्रेम है। अस्तित्व प्रेम स्वरुप है। सच्चा प्रेम एक हो जाना है। बाकी या तो मिथ्या भाव है या स्वार्थ। अज्ञानी को प्रेम नहीं हो सकता। व्यक्ति अस्तित्व की अभिव्यक्ति है। मैं अस्तित्व स्वयं हूँ व्यक्ति नहीं। अनुभवकर्ता निर्गुण और अपरिवर्तनशील है। अनुभवकर्ता वो पर्दा है जिस पर अनुभव के चित्र प्रकट होते हैं। पर्दा ही चित्र है। अनुभवकर्ता आनंद स्वरूप है। मुझमें न सुख है न दुःख न इच्छा न स्मृति। अनुभवकर्ता परम शुद्धता है। जन्म मृत्यु मिथ्या हैं। मेरा न जन्म होता है न मृत्यु। स्वप्नदृष्टा ही स्वप्न भी है। मुझमें न गुण हैं न दोष। मैं पूर्ण हूँ। मेरी न मुक्ति है न बंधन। न आदि न अंत। ## अनुभव माया मिथ्या जगत जो प्रकट है वो अनुभव है। अनुभव मूलभूत है। सभी अनुभव परिवर्तनशील माया हैं। जगत मिथ्या है। संसार मेरी कल्पना मात्र है। सबकुछ कल्पना ही है। ये सपना अनंत है। अस्तित्व अनुभवों की अनंत श्रृंखला है। जन्म मृत्यु नहीं होता केवल सपना बदल जाता है। जगत को सत्य मान लेना और स्वयं को शरीर मान लेना मूल अज्ञान है। रचना और विनाश धारणाएं हैं। केवल परिवर्तन प्रतीत होता है। एक आम साधक की आध्यात्मिक यात्रा अनुभवों के अनुसंधान से शुरू होती है और अनुभवकर्ता के ज्ञान पर समाप्त होती है। तीन प्रकार के अनुभव हो रहें हैं - जगत, शरीर और मन। मूलतः सभी अनुभव मानसिक हैं। या एक ही प्रकार के हैं। जो वो नहीं है वो माया है। माया अज्ञेय है। मैं ही माया हूँ। जो बदल गया वो मिथ्या है। अनुभव का तत्व शून्य है। मैं ही वो तत्व हूँ। मुझे मेरा ही दर्शन हो रहा है। विचित्र अनुभवों के पीछे भागना मूर्खता है। अपरोक्ष अनुभव और तर्क ही प्रमाण है। ज्ञान के लिए रोज के साधारण अनुभव पर्याप्त हैं। एक विशेष अनुभव ज्ञान देगा ये मानना अतार्किक है। जगत के प्रति रूचि अज्ञान का संकेत है। विरक्ति ज्ञान का। वस्तुएं धारणा मात्र हैं। वस्तुओं का अनुभव नहीं होता। अनुभव तन्मात्राओं का होता है। वस्तुनिष्ठ अनुभव एक मान्यता है। वस्तुनिष्ठ अनुभव वो है जहाँ व्यक्तिनिष्ठ अनुभव में सहमति है। जो धीरे बदलता है उसे सत्य मान लिया जाता है। तेज बदलने वाले अनुभव को सत्य मान लिया जाता है यदि वो बदलाव हमेशा वैसा ही हो। नियमित अनुभवों को सत्य मान लिया जाता है। नियम भी मिथ्या हैं। अनियमित भी। उपयोगी को सत्य मान लिया जाता है। विचित्र अनुभवों को सत्य मान लेना या असत्य मान लेना अज्ञान है। जो असंभव लगे या सामान्य न हो उसे विचित्र या चमत्कारी मान लिया जाता है। जो अभी हो रहा है वो असंभव और असामान्य ही है। रोज का अनुभव भी चमत्कार ही है। सामान्य असामान्य की पृष्ठभूमि पर होता है। सभी अनुभव आध्यात्मिक ही हैं। कोई अनुभव विचित्र या साधारण नहीं हैं। विचित्रता रोज होने लगे तो साधारण हो जाती है। अनुभव शुद्ध हैं। अच्छा या बुरा आरोपित है। जो उत्तरजीविता के अनुकूल है उसे अच्छा या सुन्दर मान लिया जाता है। माया में रस है सत्य नीरस। जो माया में रस लेते हैं सत्य से वंचित रहते हैं। ## विरक्ति समर्पण शुद्धि नैतिकता कुछ हो तो अच्छा है न हो तो और अच्छा। ये भाव विरक्ति है। इच्छा पूर्ण हो तो अच्छा है न हो तो और अच्छा। ये भाव विरक्ति है। कोई इच्छा मेरी नहीं न कर्म मेरा है। ये भाव विरक्ति है। विरक्ति विषयों से नफरत होना नहीं है। स्वीकारभाव विरक्ति है। लगाव या आसक्ति सभी दुखों का मूल है। विरक्ति आनंद है। स्वयं के अज्ञान को स्वीकारना समर्पण है। अज्ञेयता की अवस्था बुद्धि का समर्पण है। किसी की बातों को हमेशा सत्य मान लेना समर्पण नहीं मूर्खता है। हर आदेश मान लेना समर्पण नहीं दासता है। समर्पण के समय बुद्धि का प्रयोग जरुरी है। समर्पित मुर्ख का शोषण हो जाता है। जो गुरु के प्रति समर्पित है उसकी प्रगति निश्चित है। समर्पण न होना अहंकार या दंभ दर्शाता है। ज्ञान से शुद्धि स्वतः होती है। अज्ञान मूल अशुद्धि है। साक्षीभाव शुद्धिकरण में उत्प्रेरक समान है। शुद्धिकरण सपने का ही भाग है। मैं पहले से शुद्ध हूँ। दुःख पीड़ा कष्ट असफलता मंदबुद्धि आदि अशुद्धिओं के लक्षण हैं। अशुद्ध को भी ज्ञान हो सकता है यदि गुरुकृपा हो तो। अपनी नैतिकता के मानदंड स्वयं चुनें। ज्ञानी के नैतिक मानदंड हमेशा सामाजिक मानदंडों से श्रेष्ठ होते हैं। नैतिकता के सामाजिक मानदंडों को अपना लेना मानसिक गुलामी है। ज्ञानमार्ग में नैतिकता का मानदंड अहिंसा है। आत्मरक्षा में हुई हिंसा, अहिंसा है। दूसरों पर अपने नैतिक मानदंड थोपना भी हिंसा है। नैतिक अनैतिक व्यक्तिनिष्ठ और ऐच्छिक हैं। समय और स्थान के साथ बदलते हैं। जो बदल गया वो मिथ्या है। जो उत्तरजीविता में सहायक है उसे नैतिक मान लिया जाता है। आज वो नैतिक है कल नहीं। यहाँ जो नैतिक है वहां नहीं। एक के लिए जो नैतिक है दूसरे के लिए नहीं। जो उत्तरजीविता में सहायक है सुन्दर प्रतीत होता है। बन्दर के लिए सबसे सुन्दर बंदरिया है। मक्खी के लिए गोबर सुन्दर जगह है। नैतिकता और सुंदरता दो प्रकार की है - सार्वभौमिक और व्यक्तिनिष्ठ। ## विकासक्रम विकासक्रम सपने का भाग है। अस्तित्व में न विकास है न पतन। मेरा न विकास होता है न पतन। मैं पूर्ण हूँ। ज्ञान से विकासक्रम तेज हो जाता है। जीव की मुक्ति नहीं होती , योनिओं में विकास होता है। मैं पहले से मुक्त हूँ। विकासक्रम शुद्धि मात्र है। विकास या पतन इसके अलावा कोई विकल्प नहीं क्योंकि सब अनित्य है। इसलिए विकास चुनना बुद्धिमानी है अन्यथा पतन होगा। आपके पास दो ही विकल्प हैं - ऊपर या नीचे। स्थायित्व संभव नहीं। मनुष्य के विकासक्रम का परिणाम देवयोनि है। विकासक्रम का अर्थ कुछ नया होना या श्रेष्ठता नहीं बल्कि अपनी सीमाओं को त्यागना है , अपनी दिव्यता के निकट जाने की यात्रा है। सीमित से असीमित की यात्रा विकासक्रम है। विकासक्रम का अंतिम पड़ाव विलीनता है। विलीनता अभी इसी समय है। विकासक्रम लीला है। ## नाद स्मृति चित्त इंद्री नाद एक वैज्ञानिक परिकल्पना है। नाद का अनुभव नहीं होता। पराभौतिक और परामानसिक है। दो अवस्थाओं का परिवर्तन नाद है। सबसे सरल मूल परिवर्तन नाद है। सबकुछ नाद ही है। मैं ही नाद हूँ। सभी अनुभव नाद के आधार पर समझे जा सकते हैं। अर्धस्थायी नाद स्मृति है। जब नाद सरल से जटिल बनता है वो नादरचना हो जाता है। सभी अनुभव नादरचनाओं के हैं। जो नादरचना अर्धस्थायी है वो स्मृति में संग्रहित है। सभी अनुभव स्मृति के हैं। जो रचना परतों में जमी हैं वो चित्त है। विकासक्रम द्वारा चित्त परतों में संयोजित होता है। नियम चित्त के संयोजन का परिणाम हैं। चित्त के नियम सार्वभौमिक हैं। भौतिक जगत के नियम चित्त के नियमों का उपसमुच्चय है। सभी अनुभव चित्त के हैं। चित्त ही अनुभव है। चित्त का ही अनुभव होता है। चित्त चित्तवृत्ति मात्र है। स्मृति और स्मृति की प्रक्रियाएं चित्त है। स्मृति सदा गतिमान है। सक्रीय है। स्मृति मूल पदार्थ है। पदार्थ और ऊर्जा भिन्न नहीं। चित्त परतों में रचा है। भौतिक कणों से विश्वचित्त तक, चित्त विराट रचना है। मनुष्य चित्त विश्वचित्त का एक भाग है। जैसे गांव एक देश का। चित्तों के बीच सीमायें नहीं हैं। खंड उत्तरजीविता के कारण हैं। विश्वचित एक है अखंड है। मेरा चित्त और आपका चित्त एक है। संपर्क में है। एकता हर स्तर पर है। खंड मिथ्या हैं। चित्त में इन्द्रियां वो नादरचनाएँ हैं जो नाद को सीमित करती हैं और उसका प्रारूप बदलती हैं। सबसे विकसित भौतिक इंद्री मस्तिष्क है। बाकी भौतिक इन्द्रियां इसका विस्तार हैं। इन्द्रियां अनंत हैं। उत्तरजीविता के लिए वो आवश्यक है वो इंद्री विकसित हो जाती है। ज्ञात इन्द्रियों के ये प्रकार हैं - भौतिक (स्थूल), शारीरिक, मानसिक, सूक्ष्म। हर परत में इन्द्रियां हैं। सबसे कम और सबसे सीमित स्थूल इन्द्रियां हैं। स्थूल से सूक्ष्म की दिशा में इनकी मात्रा और क्षमता बढ़ती जाती है। अंत में सभी इन्द्रियां सूक्ष्म ही हैं। हर परत के अनुसार इन्द्रियां, शरीर और लोक हैं। साधना द्वारा ध्यान इन परतों में स्थित किया जा सकता है। ये पारलौकिक अनुभव पाने की कुंजी है। अज्ञानी का ध्यान पूर्णरूपेण स्थूल जगत, स्थूल शरीर और स्थूल इन्द्रीओं में स्थित है। इस प्रकार उसका जीवन अति सीमित है और विकास अवरुद्ध है। ध्यान की गति चेतना द्वारा नियंत्रित होती है। चेतना ज्ञान का परिणाम है। नाद को जानना और नियंत्रित करना नादविज्ञान है। नादविज्ञान तंत्र की नींव है। नाद का ज्ञान मूलज्ञान के बाद ही संभव है। जो इसको सत्य मान लेता है उसका पतन हो जाता है। ## तंत्र सिद्धि शक्ति देवी माया अथवा अनुभव का अनुसंधान और नियंत्रण तंत्र विद्या है। तंत्र सबसे कठिन मार्ग है। तंत्र साधना कई जन्मों तक चलती है। तंत्र सबके लिए नहीं है। स्वाधीन तंत्र सर्वश्रेष्ठ है। जिसमें साधक स्वयं की शक्तियों का विकास करता है। तंत्र ज्ञानमार्ग की शिक्षाओं का प्रमाण लेने में सहायक मार्ग है। किन्तु आवश्यक नहीं। सिद्धियां विकासक्रम का प्राकृतिक परिणाम हैं। सिद्धियां शुद्धिकरण का फल हैं। सिद्धियां कोई नई योग्यता पाना नहीं बल्कि अपनी सीमाओं को तोडना है। सिद्धियां अज्ञानी के लिए बाधा हैं और उसके विनाश का कारण बनती हैं। जो आपकी मूल योग्यताएं हैं वही सिद्धियों के रूप में वापस लौटती हैं। ये आध्यात्मिक प्रगति से संभव है। अधिकतर लोग तंत्र का केवल दुरूपयोग करते हैं। इसलिए मनुष्य के लिए यह मार्ग नहीं खोला गया। यह गुरु कृपा ही है। तंत्र में सफलता की कुंजी गोपनीयता है। सृष्टि की मूल शक्ति कामशक्ति या कामोर्जा है। सभी शक्तियाँ इसी के विभिन्न रूप हैं। कामोर्जा का आरोहण सिद्धि का कारण है। तांत्रिक का प्रमुख कार्य कामोर्जा को बढ़ाना और इच्छित दिशा में मोड़ना है। तंत्र वासनापूर्ति का मार्ग है। हर कामना पूर्ण होती है। वासनापूर्ति का परिणाम वासनामुक्ति और मोक्ष है। सबसे तेज विकास तंत्र मार्ग में होता है। तांत्रिक का साधारण लोगों से और समाज से मेल नहीं हो सकता। इसलिए निर्जन स्थान में एकांतवास आवश्यक है। जो प्रकट है वो देवी है। देवी मूल शक्ति है। देवी चैतन्य है जड़ नहीं। देवी मायाशक्ति स्वयं है। तंत्र मार्ग में इसे सत्य माना गया है। देवी चित्तशक्ति है। सब चित्त ही है। सृष्टि देवी है। मनुष्य देवी का सीमित रूप है। चेतना देवी का प्रसाद है। मनुष्य की सबसे बड़ी शक्ति देवी का बुद्धि रूप है। स्त्री रूप में देवी साक्षात् प्रकट है। स्त्रीकाया देवी स्वयं है। देवी स्वयं इच्छा या वासना है। मनुष्य उनकी पूर्ति का उपकरण मात्र है। सिद्धियां देवी कृपा से मिलती हैं। तांत्रिक का मुख्य उद्देश्य देवी को प्रसन्न करना और उसका उत्तम उपकरण बनना है। अंत में तांत्रिक स्वयं देवी हो जाता है। देवी तक जाने का मार्ग गुरु बताता है। गुरु बिना तंत्र साधना असंभव है। बिना ज्ञान और गुरु के तंत्र साधना सर्वनाश करती है। ## गुरुक्षेत्र विश्वस्मृति का वो क्षेत्र जहाँ ज्ञान संग्रहित है गुरुक्षेत्र है। गुरुक्षेत्र परिकल्पना मात्र है। गुरुक्षेत्र की गतिविधिओं का अनुभव संभव है। किन्तु वो स्वयं अप्रकट और निराकार है। गुरुक्षेत्र सर्वव्यापी और सर्वशक्तिमान है। गुरुक्षेत्र का कार्य आध्यात्मिक, वैज्ञानिक, तांत्रिक और कलाओं के ज्ञान का संरक्षण और प्रसार करना है। गुरुक्षेत्र देहधारी मनुष्य रूप, देव, शास्त्र, मंत्र, वेद और उपनिषदों के रूप में प्रकट है। किन्तु वो जो चाहे रूप ले सकते हैं। गुरुक्षेत्र का कार्य रहस्यमयी होता है और माया के नियमों के अंतर्गत होता है। किन्तु आवश्यक होने पर नियम तोड़े जाते हैं। गुरुक्षेत्र साधक की इच्छा के बिना न संपर्क करता है न सहायता। साधक की इच्छा सर्वोपरि है। सहायता की प्रार्थना करने पर सम्पूर्ण गुरुक्षेत्र सक्रीय हो जाता है और हरसंभव सहायता करता है। गुरुक्षेत्र का कार्य सटीक, सुन्दर, पूर्ण और न्यूनतम होता है। वे आवश्यकता से अधिक कुछ नहीं करते। यदि साधक तैयार नहीं तो वे कई जन्मों तक प्रतीक्षा करते हैं किन्तु भूलते नहीं। गुरु-व्यक्ति का गुरुक्षेत्र से सीधा संपर्क होता है। गुरु-व्यक्ति का स्वयं का न ज्ञान होता है, न कार्य, न शक्ति। वो गुरुक्षेत्र का उपकरण मात्र है। गुरुक्षेत्र असली गुरु है न कि व्यक्ति। जो गुरु बन के बैठा है वो गुरुक्षेत्र का माध्यम मात्र है। सुपात्र शिष्य ज्ञान सेवा द्वारा गुरुक्षेत्र का भाग हो सकता है। ऐसी इच्छा या वृत्ति बोधिसत्त्ववृत्ति है। मैं ही गुरुक्षेत्र हूँ। गुरुक्षेत्र माया का भाग है परन्तु माया के समान ही अति प्राचीन है और बना रहता है। उसमें वृद्धि या क्षय हो सकता है पर सम्पूर्ण नाश नहीं होता। गुरुक्षेत्र का भाग हो जाना हर गुरु का लक्ष्य है। गुरुक्षेत्र अक्सर साधक की कोई सांसारिक इच्छा भी पूरी कर देते हैं और कई बार सजा भी देते हैं। किसी भी अन्य गुरु की तरह। गुरुक्षेत्र में स्थित गुरुजन शिष्यों के लिए गुरुलोकों का निर्माण करते हैं , जहाँ प्रगति निर्बाध होती है। मृत्यु के समय गुरुक्षेत्र शिष्य के गुरु का रूप धारण कर उसको लेने आता है। मृत्यु होने पर गुरुक्षेत्र के सेवक साधक को गुरुलोक ले जाते हैं। वहां या तो वह सेवा करता है, या कर्मों का निपटारा या इच्छापूर्ति या गुरु निर्देश से अगले जन्म की तैयारी। गुरुक्षेत्र आपके सदा साथ है। शिष्य गुरु को छोड़ सकता किन्तु गुरु शिष्य को नहीं। गुरुक्षेत्र कोई और गुरु भेज देते हैं। सभी गुरु एक हैं। गुरुक्षेत्र का कार्य छुपा होता है या प्राकृतिक घटना के समान होता है या संयोग माना जाता है। गुरुक्षेत्र का माया से समझौता है। गुरुक्षेत्र में मार्गों का भेद समाप्त होता है। वो हज़ारों मार्ग बना सकते हैं, युग और लोक की आवश्यकता अनुसार। गुरुक्षेत्र का कार्य अन्तःप्रेरणा देना और कारण शरीर में सही संस्कार बनाना है। गुरुक्षेत्र को सुनिए वो आपके मन में बोलते हैं और आपकी शुभ इच्छाओं के कारण वही हैं। गुरुक्षेत्र में गुरुजन शिष्यों के कर्मों को स्वयं ग्रहण करते हैं। शिष्य की प्रगति के लिए उसकी जगह स्वयं कष्ट भोगते हैं। गुरुक्षेत्र से संपर्क स्वप्न या सूक्ष्म लोक में अच्छा होता है। आप भी थोड़ा ऊपर जाएँ , हमेशा उनको नीचे बुलाना अच्छा नहीं। शिष्य की अरुचि होने पर या सांसारिक कार्यों में अधिक रस लेने पर गुरुक्षेत्र अपनी सेवा रोक देते हैं। गुरुक्षेत्र का कार्य ठीक किसी उद्योग की तरह होता है। जहाँ फायदा नहीं वहां वो समय और ऊर्जा नहीं लगाते। उनका फायदा शिष्य की प्रगति में है। गुरुक्षेत्र कुछ नहीं मांगता केवल देता है। शिष्यों द्वारा अपमान करने पर या निर्देशों पर न चलने पर गुरुक्षेत्र नाराज़ नहीं होता किन्तु अपनी सेवा रद्द कर देता है। ऐसे शिष्यों का या तो पतन होता है या प्रगति रूक जाती है। ये क्रोधित होने से कई गुना बड़ी सजा है। लोक में ज्ञान का नाश होने पर गुरुक्षेत्र महागुरु या जगद्गुरु के रूप में अवतरित होता है और सत्य की पुर्नस्थापना करता है। ऐसा ही प्रलय के बाद भी होता है। गुरुक्षेत्र मध्य लोकों में अधिक सक्रीय है , ऊँचे और अति नीच लोकों की तुलना में क्योंकि यहाँ संभावना अधिक है। पृथ्वीलोक या मृत्युलोक मध्यलोक है। इसलिए आप बहुत भाग्यशाली हैं कि यहाँ मनुष्य रूप मिला। यहाँ ज्ञान है, गुरु हैं, शास्त्र हैं और गुरुक्षेत्र सक्रीय है। पृथ्वी पर ये जीवन एक अनमोल उपहार है। इसका लाभ उठायें , जीवन को व्यर्थ न करें। गुरुक्षेत्र से प्रार्थना करें और उनकी ऊर्जा की दिशा में बहें , आपका कल्याण होगा। **जय गुरुदेव** **जय गुरुक्षेत्र**
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