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श्रीगुरुगीता
तरुण प्रधान
# श्रीगुरुगीता <br><br><br> हिंदी अनुवाद और संपादन **तरुण प्रधान** <br><br><br> ## अनुवादक की टिप्पणी गुरुगीता भगवान शिव और माता पार्वती के बीच एक संवाद है, जहाँ भगवान शिव, माता पार्वती के समक्ष गुरु के महत्व और आवश्यकता का बखान करते हैं । गुरुगीता में १८२ (कहीं कहीं २०० के ऊपर) श्लोक हैं और यह स्कंद पुराण के उत्तरखंड का एक भाग है। इसके कई संस्करण संस्कृत, हिंदी और अंग्रेज़ी में इंटरनेट पर उपलब्ध हैं। सार समान होते हुए भी सभी में थोड़ी सी अलग व्याख्या है, कम या अधिक श्लोक हैं। यहाँ उत्सुक पाठक के लिए दो कड़ियाँ दी जा रही हैं। https://ia800400.us.archive.org/१/items/ShreeGuruGeetaNarayanShaktiPeeth/Shree%20Guru%20Geeta%20-%20Narayan%20Shakti%20Peeth.pdf https://www.sahajananda-ashram.com/wp-content/uploads/2020/05/site/books/%E0%A4%97%E0%A5%8१%E0%A4%B0%E0%A5%8१-%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BE-Guru_Gita-Hindi-updated-on-१9-Sep-2020.pdf मैं इस पवित्र ग्रंथ के कुछ चुने हुए संस्कृत श्लोकों का हिंदी में अनुवाद, शब्दार्थ और व्याख्या प्रस्तुत कर रहा हूँ। मैंने आधुनिक भाषा और संक्षिप्ता पर ध्यान दिया है ताकि कम से कम समय में इस अमूल्य ग्रंथ से पाठक परिचित हो सके। आवश्यकतानुसार ज्ञानमार्ग के संदर्भ अनुसार मैंने अपनी टिप्पणियां भी जोड़ी हैं। इस कार्य में विभिन्न लेखकों के साथ साथ जेमिनी यंत्रजीव सहायक रहे हैं। मुझे आशा है यह प्रयास ज्ञानमार्ग के विद्यार्थियों और अन्य साधकों के लिए लाभदायक होगा। <br><br> तरुण प्रधान ताम्हिणी, पुणे नवंबर २०२५ *** <br><br><br> # गुरु स्तुति (गुरु स्मरण की विधि) हंसाभ्यां परिवृत्तपत्रकमलैर्दिव्यैर्जगत्कारणै- र्विश्वोत्कीर्णमनेकदेहनिलयैः स्वच्छन्दयात्मेच्छया ।। तद्योतं पदशांभवं तु चरणं दीपांकुरग्राहिणम् । प्रत्यक्षाक्षरिविग्रहं गुरुपदं ध्यायेद्विभुं शाश्वतम् ।। मम चतुर्विधपुरुषार्थसिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः । **हिंदी अनुवाद** जो दिव्य हंसों और खिले हुए कमल के पत्तों से घिरे हैं, जो जगत के कारण हैं, जिन्होंने अपनी स्वेच्छा से अनेकों शरीर धारण किए हैं, मैं उन गुरु के शाश्वत और सर्वव्यापी स्वरूप का ध्यान करता हूँ। उनके चरण शिव पद हैं जो एक दीपक के समान ज्ञान को प्रकाशित करने वाले हैं, उन श्रीविग्रह साक्षात् अविनाशी अक्षर ब्रह्म स्वरूप का मैं ध्यान करता हूँ। मैं अपने चारों पुरुषार्थों की सिद्धि के लिए इस जप का विनियोग करता हूँ। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **हंसाभ्यां** दो हंसों द्वारा (ज्ञान और वैराग्य के प्रतीक)। * **स्वच्छन्दयात्मेच्छया** अपनी स्वतंत्र इच्छा से। * **पदशांभवं** शिव के पद (शाम्भव पद)। * **दीपांकुरग्राहिणम्** दीपक की लौ के समान (ज्ञान को प्रकाशित करने वाले)। * **प्रत्यक्षाक्षरिविग्रहं** साक्षात अविनाशी ब्रह्म का प्रकट स्वरूप या मूर्ति। * **चतुर्विधपुरुषार्थसिद्ध्यर्थे** चार प्रकार के पुरुषार्थों (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) की सिद्धि के लिए। * **विनियोगः** किसी मंत्र या पाठ को किसी विशेष उद्देश्य के लिए उपयोग। *** # ऋषिरुवाच (ऋषि ने कहा) गुह्याद्गुह्यतरा विद्या गुरुगीता विशेषतः । त्वत्प्रसादाच्च श्रोतव्यं तत्सर्वं ब्रूहि सूत मे ।।१।। **हिंदी अनुवाद** यह ज्ञान जो गोपनीय से भी अति गोपनीय है, विशेष रूप से गुरुगीता, इसलिए हे सूतजी, कृपा करके आप मुझे सबकुछ बताएं जो श्रवण योग्य है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **गुह्याद्गुह्यतरा** गुप्त से भी अधिक गुप्त। * **त्वत्प्रसादाच्च** आपकी कृपा से। * **श्रोतव्यं** सुनने योग्य। * **सूत** उपदेशक। *** # सूत उवाच (सूत ने कहा) कैलासशिखरे रम्ये भक्तिसाधननायकं । प्रणम्य पार्वती भक्त्या शंकरं परिपृच्छति ।।२।। **हिंदी अनुवाद** कैलाश के रमणीय शिखर पर, भक्ति साधनों के स्वामी भगवान शंकर को, माता पार्वती ने भक्तिपूर्वक प्रणाम करके प्रश्न पूछा। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **भक्तिसाधननायकं** भक्तों, आराधकों के स्वामी। *** # पार्वत्युवाच (पार्वती ने कहा) ॐ नमो देवदेवेश परात्पर जगद्गुरो । सदाशिव महादेवो गुरुदीक्षां प्रदेहि मे ।।३।। **हिंदी अनुवाद** हे देवों के देव! हे परम से भी परे! हे जगद्गुरु! आपको नमस्कार है। हे सदाशिव! हे महादेव! मुझे गुरु दीक्षा प्रदान करें। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **परात्पर** परम (श्रेष्ठ) से भी परे (श्रेष्ठतम)। * **गुरुदीक्षां** गुरु से मिलने वाली दीक्षा। *** केन मार्गेण भो स्वामिन् देही ब्रह्ममयो भवेत् ।।४।। त्वं कृपां कुरु मे स्वामिन्नमामि चरणं तव ।।५।। **हिंदी अनुवाद** हे स्वामी! वह कौन सा मार्ग है जिससे यह देहधारी जीव ब्रह्ममय हो जाता है? हे स्वामी! मुझ पर कृपा करें। मैं आपके चरणों में नमन करती हूँ। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **देही** देहधारी जीव। मनुष्य। * **ब्रह्ममयो भवेत्** ब्रह्म स्वरूप को प्राप्त कर लेता है। *** # ईश्वर उवाच (ईश्वर, शिव ने कहा) *** मम रूपासि देवि त्वं त्वत्प्रीत्यर्थं वदाम्यहं । लोकोपकारकः प्रश्नो न केनापि कृतः पुरा ।।६।। **हिंदी अनुवाद** हे देवी! तुम मेरा ही स्वरूप हो। तुम्हारे प्रेम के कारण मैं यह ज्ञान तुम्हें बताता हूँ। तुम्हारा यह प्रश्न संसार का उपकार करने वाला है, ऐसा प्रश्न पहले किसी ने नहीं किया। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **मम रूपासि** तुम मेरा ही रूप हो। * **त्वत्प्रीत्यर्थं** तुम्हारे प्रेम के लिए। * **लोकोपकारकः** संसार का कल्याण करने वाला। *** दुर्लभं त्रिषु लोकेषु तच्छृणुष्व वदाम्यहं । किञ्चिद् गुरुंविना नान्यत्सत्यं सत्यं वरानने ।।७।। **हिंदी अनुवाद** हे सुंदरी ! जो तीनों लोकों में दुर्लभ है वो मैं कहता हूँ, उसे सुनो। गुरु के बिना अन्य कुछ भी सत्य नहीं है, यही सत्य है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **त्रिषु लोकेषु** तीनों लोकों में (पाताल , पृथ्वी, आकाश)। * **शृणुष्व** सुनो। * **गुरुंविना नान्यत्सत्यं** भावार्थ - गुरु के बिना सत्य नहीं जाना जा सकता। * **वरानने** हे सुंदर मुख वाली (पार्वती के लिए संबोधन)। *** वेदशास्त्रपुराणानि चेतिहासादिकानि च । मंत्रयंत्रादिविद्यानां स्मृतिरुच्चाटनादिकं ।।८।। शैवं शाक्तागमादीनि अन्यद्बहुमतानि च । अपभ्रंशः समस्तानि जीवानां भ्रांतचेतसाम् ।।९।। **हिंदी अनुवाद (८-९)** वेद, शास्त्र, पुराण, इतिहास आदि, तथा मंत्र, यंत्र, उच्चाटन आदि विद्याएं, शैव, शाक्त, आगम आदि विभिन्न मत, ये सभी भ्रमित चित्त वाले जीवों के लिए मार्ग से भटकाने वाले हैं। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **उच्चाटनादिकं** उच्चाटन आदि तंत्र क्रियाएं। * **अपभ्रंशः** पथभ्रष्ट करने वाले। ज्ञान का लाभ न देने वाले। * **भ्रांतचेतसाम्** भ्रमित चित्त (बुद्धि) वालों के लिए। भावार्थ - अज्ञानियों के लिए उक्त साधन अनुपयोगी हैं। *** यज्ञो व्रतं तपो दानं जपस्तीर्थं तथैव च । गुरुतत्त्वमविज्ञाय मूढास्ते चेतरे जनाः ।।१०।। **हिंदी अनुवाद** गुरु तत्व को जाने बिना जो लोग यज्ञ, व्रत, तप, दान, जप और तीर्थ करते हैं, वे मूर्ख हैं। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **गुरुतत्त्वमविज्ञाय** गुरु के तत्व को बिना जाने। (या गुरु द्वारा दर्शाये तत्त्वज्ञान/मूलज्ञान को जाने बिना) * **मूढास्ते** वे मूर्ख हैं। *** यदंघ्रिकमलद्वंद्वं द्वंद्वतापनिवारकं । तारकं भवसिंधौ हि सद्गुरोः प्रणमाम्यहं ।।११।। **हिंदी अनुवाद** जिनके चरणकमल द्वंद्व के ताप का निवारण करने वाले हैं और जो भवसागर से तारने वाले हैं, उन सद्गुरु को मैं प्रणाम करता हूँ। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **अंघ्रिकमलद्वंद्वं** दो चरण कमल। * **द्वंद्वतापनिवारकं** सुख-दुःख, लाभ-हानि आदि द्वैत अनुभवों के कष्टों का निवारण करने वाले। * **तारकं** तारने वाले, पार कराने वाले। * **भवसिंधौ** संसार रूपी सागर। *** गूढ़विद्या जगन्माया देहे चाज्ञानसंभवा । उदयं स्वप्रकाशेन गुरुशब्देन कथ्यते ।।१२।। **हिंदी अनुवाद** अज्ञान से उत्पन्न शरीर और जगत की माया का गूढ़ ज्ञान, जिसका उदय स्वयं के प्रकाश से होता है, उस ज्ञान प्रदान कर्ता को 'गुरु' कहा जाता है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **गूढ़विद्या** गुप्त ज्ञान। * **अज्ञानसंभवा** अज्ञान से उत्पन्न। * **स्वप्रकाशेन** स्वयं के प्रकाश से। आत्मज्ञान से। स्वयं को जानकर। * **गुरुशब्देन कथ्यते** 'गुरु' शब्द से कहा जाता है (यहाँ 'गु' का अर्थ अंधकार और 'रु' का अर्थ प्रकाश करने वाला है)। *** देही ब्रह्म भवेद्येन तत्कृपार्थं वदामि ते । सर्वपापविशुद्धात्मा श्रीगुरोः पादसेवनात् ।।१३।। **हिंदी अनुवाद** मैं तुम्हें उनके बारे में बताता हूँ जिन श्री गुरु के चरण कमलों की सेवा करने से उनकी कृपा से आत्मा सब पापों से शुद्ध हो जाती है और जीव ब्रह्म हो जाता है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **देही ब्रह्म भवेत्** देहधारी जीव ब्रह्म हो जाता है। *** सर्वतीर्थावगाहस्य प्राप्नोति स फलं नरः । गुरुपादोदकं पीत्वा जलं शिरसि धारयेत् ।।१४।। **हिंदी अनुवाद** गुरु के चरणामृत को पीकर और उस जल को सिर पर धारण करके मनुष्य सभी तीर्थों में स्नान करने का फल प्राप्त कर लेता है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **सर्वतीर्थावगाहस्य** सभी तीर्थों में स्नान का। * **गुरुपादोदकं** गुरु का चरणामृत। *** शोषणं पापपंकस्य दीपनं ज्ञानतेजसाम् । गुरुपादोदकं सम्यक् संसारार्णवतारकम् ।।१५।। **हिंदी अनुवाद** गुरु का चरणामृत पाप रूपी कीचड़ को सुखाने वाला, ज्ञान रूपी तेज (दीपक) को प्रदीप्त करने वाला और संसार सागर से पार कराने वाला है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **शोषणं** सुखाने वाला। नाश या साफ़ करने वाला। * **पापपंकस्य** पाप रूपी कीचड़ का। * **गुरुपादोदकं** गुरु का चरणामृत या जिस जल से गुरु के पैर धोये गए हैं। (यहाँ और पुस्तक में कहीं और यह केवल उपमा मात्र है, विनम्रता का भाव दर्शाता है, कविता है। कहना नहीं पड़ेगा की यह कोई कर्मकांड नहीं है, ऐसे जल का उपयोग या सेवन बुद्धिमानी नहीं है और मात्र रोगों का कारण हो सकता है, ज्ञान का नहीं। ज्ञान गुरु के सिखाये मार्ग और साधना से होगा।) * **संसारार्णवतारकम्** संसार के सागर से पार कराने वाला। इस मायावी स्वप्न में डूबने से बचाने वाला। *** अज्ञानमूलहरणं जन्मकर्मनिवारणम् । ज्ञानवैराग्यसिद्ध्यर्थं गुरुपादोदकं पिबेत् ।।१६।। **हिंदी अनुवाद** अज्ञान को जड़ से उखाड़ने के लिए, जन्म और कर्म के बंधन से छूटने के लिए, तथा ज्ञान और वैराग्य की सिद्धि के लिए गुरु का चरणामृत पीना चाहिए। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **गुरुपादोदकं पिबेत्** भावार्थ - गुरु की कृपा का लाभ लेना चाहिए। यहाँ चरणामृत पीना उपमा मात्र है कोई कर्मकांड नहीं। *** *** गुरुपादोदकं पानं गुरोरुच्छिष्टभोजनम् । गुरुमूर्तेः सदा ध्यानं गुरुस्तोत्रं सदा जपेत् ।।१७।। **हिंदी अनुवाद** गुरु के चरणामृत का पान करना, गुरु के प्रसाद का सेवन करना, गुरु के स्वरूप का सदा ध्यान करना और प्रार्थना या गुरुमंत्र का सदा जप करना चाहिए। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **गुरोरुच्छिष्टभोजनम्** गुरु के जूठे भोजन को प्रसाद रूप में ग्रहण करना यहाँ उपमा मात्र है। यह गुरु के प्रति शिष्य के अनन्य समर्पण और विनय को दर्शाता है, जिसमें शिष्य गुरु की हर आज्ञा या उपदेश को पूर्ण श्रद्धा से ग्रहण करता है। * **सदा जपेत् ** इसका अर्थ केवल तोते की तरह रटना न होकर गुरु की शिक्षाओं पर सदा मनन और सदा स्मरण करना है (ऐसा ही पुस्तक के अन्य भागों में जप का भावार्थ है।) *** काशीक्षेत्रनिवासोऽसौ जाह्नवीचरणोदकम् । गुरुर्विश्वेश्वरः साक्षात् तारको ब्रह्म निश्चितम् ।।१८।। **हिंदी अनुवाद** गुरु का निवास स्थान ही काशी क्षेत्र है, गुरु का चरणामृत ही गंगाजल है। गुरु साक्षात भगवान विश्वेश्वर (शिव) हैं और वे ही निश्चित रूप से तारने वाले ब्रह्म हैं। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **काशीक्षेत्रनिवासोऽसौ** गुरु का निवास या आश्रम (या संपर्क) ही काशी क्षेत्र (सर्वोच्च तीर्थ स्थान) है। *** गुरोः पादांकितं भूत्वा गयास्ते सोऽक्षयो वटः । तीर्थराजः प्रयागस्तु गुरुमूर्ते नमो नमः ।।१९।। **हिंदी अनुवाद** गुरु के चरण जहाँ पड़ते हैं, वह भूमि गया तीर्थ है, गुरु स्वयं अक्षय वट हैं। गुरु मूर्ति ही तीर्थराज प्रयाग है, ऐसे गुरुदेव को बारम्बार नमस्कार है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **पादांकितं** चरणों की छाप से अंकित भूमि। जहाँ गुरु रहते हैं वह तीर्थस्थान है, मुक्ति का द्वार है। * **सोऽक्षयो वटः** भावार्थ - गुरु की छत्रछाया में बैठने से कल्याण होगा न कि किसी वृक्ष की। *** गुरुमूर्तिं स्मरेन्नित्यं गुरुनाम सदा जपेत् । गुरोराज्ञां प्रकुर्वीत गुरोरन्यन्न भावयेत् ।।२०।। **हिंदी अनुवाद** नित्य गुरु के स्वरूप का स्मरण करना चाहिए, सदा गुरु के नाम का जप करना चाहिए। गुरु की आज्ञा का पालन करना चाहिए, गुरु के अतिरिक्त और किसी का चिंतन नहीं करना चाहिए। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **गुरुमूर्तिं स्मरेन्नित्यं** गुरु के तत्व का या प्रदत्त तत्वज्ञान का नित्य स्मरण करना चाहिए। (न केवल उनके भौतिक रूप का।) * **गुरोरन्यन्न भावयेत्** अन्य लोगों की कही बातें या दूसरी शिक्षाएं न ग्रहण करें या उन पर मनन न करें। (दोनों का समय नष्ट होगा।) *** गुरुवक्त्रस्थितं ब्रह्म प्राप्यते तत्प्रसादतः । गुरुमूर्तेः सदा ध्यानं कुलस्त्री स्वपतेर्यथा ।।२१।। **हिंदी अनुवाद** ब्रह्मज्ञान गुरु के मुख से उनकी कृपा से ही प्राप्त होता है। गुरु के स्वरूप का सदा इस प्रकार ध्यान करना चाहिए जैसे एक कुलीन स्त्री केवल अपने पति का ध्यान करती है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **कुलस्त्री स्वपतेर्यथा** सभ्य पतिव्रता पत्नी। भावार्थ - एक बार में केवल एक गुरु होना लाभदायी है। एक साथ कई गुरुओं से न सीखें। *** स्वाश्रमं च स्वजातिं च स्वकीर्तिपुष्टिवर्धनम् । एतत्सर्वं परित्यज्य गुरोरन्यं न भावयेत् ।।२२।। **हिंदी अनुवाद** अपना आश्रम , अपनी जाति, अपनी कीर्ति और अपनी उन्नति, इन सबको त्यागकर गुरु के अतिरिक्त अन्य किसी का चिंतन नहीं करना चाहिए। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **स्वाश्रमं** ब्रह्मचर्य, गृहस्थ आदि। सामाजिक रूढ़ि , मतारोपण आदि। सांसारिक वृत्तियों की अति मार्ग में बाधा है। *** अनन्याश्चिन्तयन्तो मां सुलभं परमं पदम् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन गुरोराराधनं कुरु ।।२३।। **हिंदी अनुवाद** जो अनन्य भाव से उनका चिंतन करते हैं, उनके लिए परम पद सुलभ हो जाता है। इसलिए, सभी प्रयत्नों से गुरु की आराधना करो। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **परमं पदम्** सर्वोच्च पद (मोक्ष या ब्रह्मपद या ब्रह्मज्ञान)। *** त्रैलोक्ये स्फुटवक्तारो देवाद्याः सुरपन्नगाः । गुरुवक्त्रस्थिता विद्या गुरुभक्त्या तु लभ्यते ।।२४।। **हिंदी अनुवाद** तीनों लोकों में देवता, नाग आदि स्पष्ट कहते हैं, कि गुरु के मुख से प्रकट जो (ब्रह्म) विद्या है, वह तो गुरुभक्ति से ही प्राप्त होती है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **गुरुभक्त्या तु लभ्यते** गुरुभक्ति का अर्थ अंधभक्ति या गुरु उपासना नहीं बल्कि गुरु का अनुसरण करना या उनके दिखाए मार्ग पर चलना है। * **त्रैलोक्ये स्फुटवक्तारो** एक और अर्थ में - इस सृष्टि में अन्य कई ज्ञानी या वक्ता है फिर भी। *** गुकारस्त्वन्धकारः स्याद् रुकारस्तन्निरोधकृत् । अन्धकारविनाशित्वाद् गुरुरित्यभिधीयते ।।२५।। **हिंदी अनुवाद** 'गु' का अर्थ है अंधकार (अज्ञान) और 'रु' का अर्थ है उसका निरोध करने वाला (प्रकाश, ज्ञान)। अज्ञान रूपी अंधकार का नाश करने के कारण ही उन्हें 'गुरु' कहा जाता है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **गुकारः** 'गु' अक्षर। * **रुकारः** 'रु' अक्षर। * **गुरु** शब्द के अन्य अर्थ हैं - बड़ा, महत्वपूर्ण, विराट, भारी, (आधुनिक अर्थ - विशेषज्ञ या शिक्षक या निपुण) *** गुकारः प्रथमो वर्णो मायादि गुणभासकः । रुकारो द्वितीयो ब्रह्म मायाभ्रान्तिविमोचकम् ।।२६।। **हिंदी अनुवाद** 'गु' पहला अक्षर है जो माया आदि गुणों को प्रकाशित करता है। दूसरा अक्षर 'रु' परब्रह्म का प्रतीक है जो माया के भ्रम से मुक्ति दिलाता है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **मायादि गुणभासकः, मायाभ्रान्तिविमोचकम्** सगुण माया के भ्रम से मुक्त करने वाला और निर्गुण तत्व का ज्ञान देने वाला ही 'गुरु' है। *** श्लोक २७-३१ : यहाँ शरीर को मलिन मानकर उससे विरक्त होना, अपनी संपत्ति, पशुधन, पत्नी, बच्चे और सम्बन्धियों को गुरु को अर्पित कर देने का वर्णन है। थोड़ा प्राचीन है और समकालीन मानसिकता के अनुरूप नहीं हैं इसलिए यहाँ उल्लेखित नहीं हैं। *** संसारवृक्षमारूढाः पतन्ति नरकार्णवे । येन चैवोद्धृताः सर्वे तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।३२।। **हिंदी अनुवाद** जो संसार रूपी वृक्ष पर चढ़े हुए हैं, वे नरक रूपी सागर में गिरते हैं। जिन्होंने उन सबका उद्धार किया है, उन श्री गुरुदेव को नमस्कार है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **संसारवृक्षमारूढाः** संसार रूपी वृक्ष पर चढ़े हुए। * **नरकार्णवे** नरक रूपी सागर में। * **उद्धृताः** ऊपर उठाना। *** गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुरेव परं ब्रह्म तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।३३।। **हिंदी अनुवाद** गुरु ही ब्रह्मा हैं, गुरु ही विष्णु हैं, गुरु ही भगवान शंकर हैं। गुरु ही साक्षात परब्रह्म हैं, उन श्री गुरुदेव को नमस्कार है। *** हेतवे जगतामेव संसारार्णवसेतवे । प्रभवे सर्वविद्यानां शम्भवे गुरवे नमः ।।३४।। **हिंदी अनुवाद** जो जगत के कारण हैं, जो संसार सागर के लिए सेतु (पुल) के समान हैं, जो सभी विद्याओं के स्वामी हैं, उन शिव स्वरुप गुरु को नमस्कार है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **हेतवे** कारण हेतु। * **संसारार्णवसेतवे** संसार सागर के लिए सेतु। * **प्रभवे** स्वामी, उद्गम स्थान। *** अज्ञानतिमिरान्धस्य ज्ञानाञ्जनशलाकया । चक्षुरुन्मीलितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।३५।। **हिंदी अनुवाद** अज्ञान के अंधकार से अंधे हुए व्यक्ति की आँखों को जिन्होंने ज्ञान रूपी अंजन तूलिका से खोल दिया है, उन श्री गुरुदेव को नमस्कार है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **अज्ञानतिमिरान्धस्य** अज्ञान के अंधकार में जो अंधा है। * **ज्ञानाञ्जनशलाकया** ज्ञान रूपी काजल की तीली से। * **चक्षुरुन्मीलितं** आँखें खोल दीं। *** अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम् । तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।३६।। **हिंदी अनुवाद** जिन्होंने उस पद (परमात्म तत्व) को दिखाया है, जो अखंड मंडल के रूप में इस समस्त चर-अचर सभी में व्याप्त है, उन श्री गुरुदेव को नमस्कार है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **अखण्डमण्डलाकारं** अखंड ब्रह्मांड में। मण्डल - क्षेत्र। * **व्याप्तं** फैला हुआ। * **चराचरम्** जड़ और चेतन। * **तत्पदं दर्शितं** उस पद को दिखाया। *** *** सर्वश्रुतिशिरोरत्नविराजितपदांबुजम् । वेदान्ताम्बुजसूर्याय तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।३७।। **हिंदी अनुवाद** समस्त श्रुतियों (वेदों) के रत्नों से जिनका शीश सुशोभित हैं, और जो वेदान्त रूपी कमल को खिलाने वाले सूर्य हैं, उन श्री गुरुदेव के चरणकमल को नमस्कार है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **सर्वश्रुतिशिरोरत्न** सभी वेदों को मस्तक पर रत्न समान धारण करने वाले। * **वेदान्ताम्बुजसूर्याय** वेदान्त रूपी कमल के लिए सूर्य के समान। जैसे सूर्य उदय होने पर कमल खिलता है, वैसे ही गुरु वेदान्त के ज्ञान को शिष्य के समक्ष प्रकट करते हैं। गुरु द्वारा यदि न समझाया जाये तो शास्त्र बस शाब्दिक ज्ञान देता है और अज्ञान और दम्भ बढ़ाता है। *** यस्य स्मरणमात्रेण ज्ञानमुत्पद्यते स्वयम् । स एव सर्वसम्पत्तिस्तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।३८।। **हिंदी अनुवाद** जिनका स्मरण मात्र करने से ज्ञान स्वयं ही उत्पन्न हो जाता है, ज्ञानसम्पदा दाता, उन श्री गुरुदेव को नमस्कार है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **स्मरणमात्रेण** केवल याद करने से। * **ज्ञानमुत्पद्यते स्वयम्** ज्ञान अपने आप प्रकट हो जाता है। * **स एव सर्वसम्पत्तिः** वे ही सभी प्रकार की संपत्ति हैं। आध्यात्मिक दृष्टि से, गुरु कृपा ही सबसे बड़ी संपत्ति है। *** चैतन्यं शाश्वतं शान्तं व्योमातीतं निरञ्जनम् । बिन्दुनादकलातीतं तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।३९।। **हिंदी अनुवाद** जो चैतन्य स्वरूप, शाश्वत, शांत, आकाश से भी परे, शुद्ध, तथा बिन्दु, नाद और कला (परिवर्तन का चक्र) से परे हैं, उन श्री गुरुदेव को नमस्कार है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **व्योमातीतं** आकाश से भी परे, अर्थात् देश (स्थान, दूरी) की सीमाओं से रहित। * **निरञ्जनम्** दोष रहित, निर्मल। अंजन - कालिख। * **बिन्दुनादकलातीतं** ये योग और तंत्र की शब्दावली है, जो सृष्टि की सूक्ष्म अवस्थाओं या रचनाओं को दर्शाती है। गुरु इन सबसे परे, परम तत्व स्वरूप हैं। आप भी यही हैं, गुरु ये प्रत्यक्ष दिखाते हैं। *** स्थावरं जङ्गमं चैव तथा चैव चराचरम् । व्याप्तं येन जगत्सर्वं तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।४०।। **हिंदी अनुवाद** यह समस्त जगत, जिसमें स्थावर (अचल), जंगम (चल) और चर-अचर सभी शामिल हैं, उनमें व्याप्त श्री गुरुदेव को नमस्कार है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **स्थावरं जङ्गमं** अचल (पर्वत, वृक्ष) और चल (प्राणी)। * **व्याप्तं** फैला हुआ, समाया हुआ। यह गुरु के सर्वव्यापी, ब्रह्म स्वरूप को दर्शाता है। (इस प्रकार के श्लोकों में गुरु का अर्थ गुरुव्यक्ति नहीं है।) *** ज्ञानशक्तिसमारूढस्तत्त्वमालाविभूषितः । भुक्तिमुक्तिप्रदाता यस्तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।४१।। **हिंदी अनुवाद** जिनमें ज्ञान की शक्ति स्थित है, तत्व ज्ञान की माला से जो विभूषित हैं, और जो भोग (भुक्ति) तथा मोक्ष (मुक्ति) दोनों को प्रदान करने वाले हैं, उन श्री गुरुदेव को नमस्कार है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **भुक्तिमुक्तिप्रदाता** सांसारिक सुख (भुक्ति) और आध्यात्मिक स्वतंत्रता (मुक्ति) देने वाले। गुरु में शिष्य की सांसारिक इच्छाओं को पूर्ण करने की शक्ति होती है, ताकि वो निर्बाध प्रगति कर सके। *** अनेकजन्मसम्प्राप्तकर्मबन्धविदाहिने । आत्मज्ञानप्रभावेण तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।४२।। **हिंदी अनुवाद** जो अनेक जन्मों से संचित हुए कर्म-बंधन को आत्मज्ञान के प्रभाव से जला देते हैं, उन श्री गुरुदेव को नमस्कार है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **कर्मबन्धविदाहिने** कर्म के बंधन को जलाने वाले। मेरा न कर्म है न बंधन - यह ज्ञान संचित कर्म का नाश करता है जो गुरु प्रदत्त आत्मज्ञान का परिणाम है। *** मन्नाथः श्रीजगन्नाथो मद्गुरुः श्रीजगद्गुरुः । ममात्मा सर्वभूतात्मा तस्मै श्रीगुरवे नमः ।।४३।। **हिंदी अनुवाद** मेरे नाथ मेरे गुरु ही श्री जगन्नाथ हैं, मेरे गुरु ही श्री जगद्गुरु हैं। मेरी आत्मा ही सभी प्राणियों की आत्मा है, उन श्री गुरुदेव को (जो ऐसा ज्ञान देते हैं) नमस्कार है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * यह श्लोक "अहं ब्रह्मास्मि" और "तत्त्वमसि" जैसे महावाक्यों के सार को प्रकट करता है, जिसमें शिष्य अपने गुरु और परमात्मा में कोई भेद नहीं देखता। सबकुछ, सम्पूर्णता मैं हूँ। *** ध्यानमूलं गुरोर्मूर्तिः पूजामूलं गुरोः पदम् । मन्त्रमूलं गुरोर्वाक्यं मोक्षमूलं गुरोः कृपा ।।४४।। **हिंदी अनुवाद** ध्यान का मूल गुरु का स्वरूप है, पूजा का मूल गुरु के चरण हैं। मंत्र का मूल गुरु का वाक्य है और मोक्ष का मूल गुरु की कृपा है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * यह श्लोक साधना के सभी अंगों का केंद्र गुरु को बताता है। शिष्य के लिए गुरु की मूर्ति, चरण, वचन और कृपा ही सब कुछ है। *** सप्तसागरपर्यन्तं तीर्थस्नानादिजं फलम् । गुरोरङ्घ्रिपयोबिन्दुसहस्रांशेन दुर्लभम् ।।४५।। **हिंदी अनुवाद** सातों समुद्रों के तीर्थों में स्नान आदि से जो दुर्लभ फल मिलता है, वह गुरु के चरणामृत के एक बिंदु के हजारवें हिस्से के समान है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **अङ्घ्रिपयोबिन्दु** चरण के जल का बिंदु (चरणामृत)। * **सहस्रांशेन** हजारवें हिस्से के। *** ज्ञानं विना मुक्तिपदं लभ्यते गुरुभक्तितः । गुरोः समानतो नास्ति श्रेयोऽस्ति गुरुमार्गिणाम् ।।४६।। **हिंदी अनुवाद** ज्ञान न होने पर भी, केवल गुरुभक्ति से मोक्ष पद प्राप्त किया जा सकता है। गुरु के समान कोई और नहीं है, गुरु के बताये मार्ग पर चलने वालों का परम कल्याण होता है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **श्रेयोऽस्ति गुरुमार्गिणाम्** गुरु के बताये मार्ग पर चलना ही उनकी सच्ची भक्ति है जिससे मुक्ति संभव है न कि शास्त्रों आदि के ज्ञान से। *** यस्मात्परतरं नास्ति नेति नेति च वै श्रुतिः । मनसा वचसा चैव सर्वदाऽऽराधयेद्गुरुम् ।।४७।। **हिंदी अनुवाद** जिनसे परे और कुछ भी श्रेष्ठ नहीं है, ऐसा वेद भी 'नेति-नेति' (यह नहीं, यह नहीं) कहकर संकेत करते हैं, उन गुरुदेव की मन और वाणी से सदा आराधना करनी चाहिए। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **यस्मात्परतरं नास्ति** जिनसे श्रेष्ठ कुछ नहीं है। * **नेति नेति** यह उपनिषदों की एक प्रसिद्ध उक्ति है, जिसके द्वारा परब्रह्म का वर्णन निषेध के माध्यम से किया जाता है, क्योंकि उसे किसी सकारात्मक शब्द में बांधा नहीं जा सकता। यहाँ गुरु को उसी परब्रह्म के तुल्य बताया गया है। * **श्रुतिः** वेद। * **मनसा वचसा** मन और वाणी से। यहाँ आशय है कि शिष्य को अपने विचारों और शब्दों में सदैव गुरु के प्रति भक्ति और सम्मान रखना चाहिए। *** मदाहंकारगर्वेण विद्यातपबलान्वितः । संसारकुहरावर्ते घटीयन्त्रवद् भ्रमति पुनः ।।४८।। **हिंदी अनुवाद** विद्या (ज्ञान) और तपोबल से युक्त होने पर भी, जो व्यक्ति मद, अहंकार और गर्व से भरा होता है, वह संसार के भंवर में रहट की तरह बार-बार घूमता रहता है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **मदाहंकारगर्वेण** मद (नशा), अहंकार और गर्व के कारण। * **घटीयन्त्र** कुम्हार के रहट के चक्र के समान। यह जन्म-मृत्यु के अंतहीन चक्र का प्रतीक है, जिसमें अज्ञानी जीव बिना किसी प्रगति के घूमता रहता है। *** न मुक्ता देवगन्धर्वाः पितरो यक्षकिन्नराः । ऋषयः सर्वसिद्धाश्च गुरुसेवापराङ्मुखाः ।।४९।। **हिंदी अनुवाद** देवता, गंधर्व, पितर, यक्ष, किन्नर, ऋषि और समस्त सिद्ध पुरुष भी, यदि गुरु की सेवा से विमुख हो जाएं तो वे मुक्त नहीं हो सकते। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **देवगन्धर्वाः...** यहाँ विभिन्न दिव्य योनियों का उल्लेख यह दर्शाने के लिए किया गया है कि पद या शक्ति चाहे कितनी भी ऊंची क्यों न हो, गुरु कृपा के बिना मुक्ति असंभव है। * **गुरुसेवापराङ्मुखाः** जो गुरु सेवा से मुँह मोड़ लेते हैं। *** ब्रह्मानन्दं परमसुखदं केवलं ज्ञानमूर्तिम् । द्वन्द्वातीतं गगनसदृशं तत्त्वमस्यादिलक्ष्यम् ।। एकं नित्यं विमलमचलं सर्वधीसाक्षिभूतम् । भावातीतं त्रिगुणरहितं सद्गुरुं तं नमामि ।।५१।। **हिंदी अनुवाद** जो ब्रह्मानंद स्वरूप हैं, परम सुख देने वाले हैं, जो अद्वैत (कैवल्य) ज्ञान की मूर्ति हैं, जो द्वैत से परे हैं, आकाश के समान सर्वव्यापी हैं, 'तत्त्वमसि' (वह तुम हो) आदि महावाक्य जिसकी ओर संकेत करते हैं; जो एकमात्र, नित्य, निर्मल, अचल और बुद्धि के परे साक्षी तत्व हैं; जो दृश्य जगत से परे और तीनों गुणों (सत्, रज, तम) से रहित हैं, उन सद्गुरु को मैं नमन करता हूँ। **शब्दार्थ और व्याख्या** * सद्गुरु के निराकार तत्व, ब्रह्म स्वरूप का वर्णन किया गया है। शिष्य भी वही हो जाता है। *** नित्यं शुद्धं निराभासं निराकारं निरञ्जनम् । नित्यबोधं चिदानन्दं गुरुं ब्रह्म नमाम्यहम् ।।५२।। **हिंदी अनुवाद** जो नित्य, शुद्ध, भ्रमरहित, निराकार और निष्कलंक हैं, जो नित्य ज्ञान स्वरूप और सच्चिदानंदमय हैं, उन ब्रह्म स्वरूप गुरु को मैं नमस्कार करता हूँ। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **निराभासं** जिसका कोई आभास या प्रतिबिंब नहीं है, जो मूल तत्व है। जो माया या भ्रम नहीं। * **नित्यबोधं** जो शाश्वत चैतन्य या ज्ञान स्वरूप हैं। * **चिदानन्दं** सत्-चित्-आनंद स्वरूप। *** हृदम्बुजे कर्णिकमध्यसंस्थं सिद्धासने संस्थितदिव्यमूर्तिम् । ध्यायेद्गुरुं चन्द्रकलाप्रकाशं सच्चित्सुखभीष्टवरप्रदं तम् ।।५३।। **हिंदी अनुवाद** हृदय रूपी कमल के मध्य में सिद्धासन में स्थित दिव्य मूर्ति वाले, जिनकी आभा चन्द्रमा की कला के समान है, और जो सत्-चित्-आनंद, सुख तथा अभीष्ट वरदान देने वाले हैं, उन गुरुदेव का ध्यान करना चाहिए। **शब्दार्थ और व्याख्या** * यह श्लोक गुरु के साकार रूप के ध्यान की विधि बताता है। * **हृदम्बुजे** हृदय रूपी कमल में। * **कर्णिकमध्यसंस्थं** कमल के मध्य भाग (बीजकोष) में स्थित। * **चन्द्रकलाप्रकाशं** चंद्रमा की कला के समान शीतल और सौम्य प्रकाश वाले। *** आनन्दमानन्दकरं प्रसन्नं ज्ञानस्वरूपं निजबोधरूपम् । योगीन्द्रमीड्यं भवरोगवैद्यं श्रीमद्गुरुं नित्यमहं नमामि ।।५४।। **हिंदी अनुवाद** जो स्वयं आनंद स्वरूप हैं, दूसरों को आनंद देने वाले हैं, जो सदा प्रसन्न रहते हैं, जो ज्ञान स्वरूप और आत्म-बोध स्वरूप हैं, जो योगियों में श्रेष्ठ और स्तुति करने योग्य हैं, तथा जो संसार रूपी रोग के वैद्य हैं, उन श्री गुरुदेव को मैं नित्य नमस्कार करता हूँ। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **आनन्दकरं** आनंद की परम अवस्था देने वाले। * **निजबोधरूपम्** अपने वास्तविक स्वरूप (आत्म-बोध) में स्थित। * **भवरोगवैद्यं** संसार (जन्म-मरण) रूपी रोग के चिकित्सक। *** न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकं न गुरोरधिकम् । शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः शिवशासनतः ।।५५।। **हिंदी अनुवाद** गुरु से बढ़कर कुछ नहीं, गुरु से बढ़कर कुछ नहीं, गुरु से बढ़कर कुछ नहीं, गुरु से बढ़कर कुछ नहीं। यह शिव का आदेश है, यह शिव का आदेश है, यह शिव का आदेश है, यह शिव का आदेश है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * यहाँ पुनरावृत्ति का प्रयोग गुरु तत्व की सर्वोच्चता और इस कथन की परम सत्यता पर जोर देने के लिए किया गया है। यह भगवान शिव का अकाट्य वचन है। *** एवं श्रुत्वा महादेवि गुरुनिन्दां करोति यः । स याति नरकं घोरं यावच्चन्द्रदिवाकरौ ।।५६।। **हिंदी अनुवाद** हे महादेवी! इतना सुनने के बाद भी जो व्यक्ति गुरु की निंदा करता है, जब तक सूर्य और चंद्रमा रहेंगे, तब तक वह घोर नरक में पड़ा रहता है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **गुरुनिन्दां** गुरु की निंदा, अपमान या आलोचना। गुरु के कार्य में बाधा डालना। या गुरु का विरोध। * **यावच्चन्द्रदिवाकरौ** जब तक चंद्रमा और सूर्य हैं, अर्थात् अनंत काल तक। यह गुरु-निंदा के भीषण परिणाम को दर्शाता है। सभी गुरुजनों का गुरुतत्व समान या एक है इसलिए अपने या किसी और (मार्ग या संप्रदाय) के गुरु की निंदा का भी यही परिणाम होगा। *** यो वै हुंकृत्य हुंकृत्य गुरुं निर्जित्य वादतः । अरण्ये निर्जले देशे स भवेद्ब्रह्मराक्षसः ।।५७।। **हिंदी अनुवाद** जो व्यक्ति हुंकारते हुए गुरु से वाद-विवाद करता है, वह निर्जन और जलरहित वन में ब्रह्मराक्षस बनता है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **हुंकृत्य** 'हुं' शब्द का प्रयोग करना, जो अहंकार और तिरस्कार का प्रतीक है। * **निर्जित्य वादतः** वाद-विवाद में जीतकर। यहाँ आशय है कि शिष्य को अपने ज्ञान के अहंकार में गुरु से तर्क-वितर्क करके उन्हें नीचा दिखाने का प्रयास नहीं करना चाहिए। * **ब्रह्मराक्षसः** एक ऐसी योनि जो अपने पूर्व जन्म के बुरे कर्मों (विशेषकर ज्ञान के अहंकार) के कारण कष्ट भोगती है। यह केवल उपमा मात्र है , ऐसा व्यक्ति नीच ही रहेगा प्रगति नहीं करेगा, ऐसा तात्पर्य है। *** मुनिभिः पन्नगैर्वापि सुरैर्वा शापितो यदि । कालमृत्युभयाद्वापि गुरु रक्षति पार्वति ।।५८।। **हिंदी अनुवाद** हे पार्वती! यदि कोई मुनियों, नागों या देवताओं द्वारा शापित भी हो, काल और मृत्यु से भयग्रस्त हो, तो भी गुरु उसकी रक्षा करते हैं। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **पन्नगैर्वापि** नागों द्वारा भी। * **गुरु रक्षति** गुरु रक्षा करते हैं। यह श्लोक गुरु की सामर्थ्य और उनके शरणागत-वत्सल स्वभाव को दर्शाता है। गुरु की कृपा सबसे बड़े संकटों और श्रापों से भी शिष्य को बचा सकती है। *** अशक्ता हि सुराः सर्वे ह्यशक्ता मुनयस्तथा । गुरुशापहताः क्षीणाः क्षयं यान्ति न संशयः ।।५९।। **हिंदी अनुवाद** गुरु के सामने समस्त देवता और मुनि भी अशक्त हैं। जो गुरु के शाप से ग्रस्त होते हैं, वे क्षीण होकर नष्ट हो जाते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **गुरुशापहताः** गुरु के शाप से आहत। * **क्षयं यान्ति** नाश को प्राप्त होते हैं। यह श्लोक गुरु के अपमान के भयानक परिणामों को रेखांकित करता है। गुरु की अप्रसन्नता से देवता भी रक्षा नहीं कर सकते। *** मन्त्रराजमिदं देवि गुरुरित्यक्षरद्वयम् । श्रुतिवेदान्तवाक्येन गुरुः साक्षात्परं पदम् ।।६०।। **हिंदी अनुवाद** हे देवी! 'गुरु' यह दो अक्षरों का शब्द सभी मंत्रों का राजा है। वेदों और उपनिषदों के वाक्यों के अनुसार, गुरु साक्षात परम पद हैं। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **गुरुरित्यक्षरद्वयम्** 'गु' और 'रु' यह दो अक्षर। * **गुरुः साक्षात्परं पदम्** गुरु प्रत्यक्ष रूप से सर्वोच्च अवस्था (परब्रह्म) हैं। *** श्रुतिस्मृतिमविज्ञाय केवलं गुरुसेवकाः । ते वै संन्यासिनः प्रोक्ता इतरे वेषधारिणः ।।६१।। **हिंदी अनुवाद** जिन्होंने श्रुति (वेद) और स्मृति (शास्त्र) को (विधिवत) नहीं भी जाना है, किंतु वे गुरु के सेवक हैं, वास्तव में वे ही 'संन्यासी' कहलाते हैं। अन्य तो केवल वेश धारण करने वाले हैं। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **श्रुतिस्मृतिमविज्ञाय** श्रुति और स्मृति को न जानकर भी। * **इतरे वेषधारिणः** दूसरे तो केवल संन्यासी का वेश धारण (पाखण्ड) करते हैं। यह श्लोक सच्ची गुरु-सेवा को शास्त्र-ज्ञान से भी ऊँचा स्थान देता है। सच्चा त्याग बाहरी वेश में नहीं, बल्कि गुरु के प्रति समर्पण में है। *** नित्यं ब्रह्म निराकारं निर्गुणं बोधयेत्परम् । पूर्णब्रह्म निराभासं दीपो दीपान्तरं यथा ।।६२।। **हिंदी अनुवाद** जिस प्रकार एक दीपक दूसरे दीपक को प्रज्वलित कर देता है, उसी प्रकार गुरु शिष्य को नित्य, निराकार, निर्गुण, निराभास और पूर्ण ब्रह्म का बोध कराते हैं। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **बोधयेत्परम्** परम तत्व का ज्ञान कराते हैं। * **दीपो दीपान्तरं यथा** जैसे एक दीपक से दूसरा दीपक। यह ज्ञान के हस्तांतरण की प्रक्रिया का एक सुंदर रूपक है। गुरु शिष्य की बुद्धि को अपनी बुद्धि के प्रकाश से प्रकाशित करते हैं। *** गुरोः कृपाप्रसादेन आत्मारामो हि लभ्यते । अनेन गुरुमार्गेण आत्मज्ञानं प्रवर्तते ।।६३।। **हिंदी अनुवाद** गुरु की कृपा और प्रसाद से ही 'आत्माराम' (आत्मा में ही रमण करने की अवस्था) प्राप्त होती है। गुरु द्वारा निर्देशित मार्ग से ही आत्मज्ञान होता है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **आत्मारामो** साक्षीभाव। वह व्यक्ति जो बाहरी वस्तुओं में सुख न खोजकर अपनी आत्मा में ही आनंद पाता है। यह आत्म-साक्षात्कार के बाद की स्थिति है। *** आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं परमात्मस्वरूपकम् । स्थावरं जङ्गमं चैव प्रणमामि जगन्मयम् ।।६४।। **हिंदी अनुवाद** मैं उस जगन्मय (गुरु) को प्रणाम करता हूँ, जो ब्रह्म से लेकर एक तृण (स्तम्ब) तक, और समस्त चर (जंगम) तथा अचर (स्थावर) जगत में परमात्मा के स्वरूप में व्याप्त हैं। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **आब्रह्मस्तम्बपर्यन्तं** ब्रह्म से लेकर तिनके तक। यह सृष्टि की समग्रता को दर्शाता है। * **जगन्मयम्** जो सम्पूर्ण जगत में व्याप्त है। शिष्य के लिए गुरु ही वह सर्वव्यापी परमात्मा है। *** अगोचरं तथा गम्यं रूपनामादिवर्जितम् । निःशब्दं तु विजानाति स्वभावं ब्रह्म पार्वति ।।६६।। **हिंदी अनुवाद** हे पार्वती! जो इंद्रियों से अगोचर, फिर भी जानने योग्य, रूप और नाम आदि से रहित तथा निःशब्द है, उस ब्रह्म के सत्य स्वभाव को जानना चाहिए। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **अगोचरं** जो इंद्रियों (आंख, कान आदि) की पहुँच से परे हो। * **गम्यं** जानने योग्य, अनुभव करने योग्य। * **निःशब्दं** शब्दों से परे, परम मौन। *** एकाकी निःस्पृहः शान्तः स्थातव्यं तत्प्रसादतः । यस्यावलोकनादेव सर्वसङ्गविवर्जितः ।।६९।। **हिंदी अनुवाद** उन (गुरु) की कृपा से, जिनका दर्शन मात्र ही साधक को समस्त आसक्तियों से रहित कर देता है, (शिष्य को) एकाकी, इच्छा रहित और शांत होकर रहना चाहिए। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **एकाकी** अकेला या एकांतवास। इसका अर्थ भौतिक अकेलेपन से अधिक मानसिक रूप से संग-दोष से मुक्त रहना है। * **निःस्पृहः** जिसे कोई कामना या इच्छा न हो। * **सर्वसङ्गविवर्जितः** सभी प्रकार के मोह या आसक्ति से मुक्त। *** सर्वज्ञोऽयमिति प्राहुर्देही सर्वमयो बुधः । सदानन्दः सदा शान्तो रमते यत्रकुत्रचित् ।।७०।। **हिंदी अनुवाद** ज्ञानीजन कहते हैं कि यह देहधारी जीव (गुरु कृपा से) सर्वज्ञ और सर्वमय हो जाता है। वह ज्ञानी, सदानंद और सदा शांत होकर कहीं भी (स्वच्छंद रूप से) विचरण करता है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **रमते यत्रकुत्रचित्** जहाँ कहीं भी आनंदपूर्वक रहता है। ऐसे ज्ञानी पुरुष स्थान, समाज, परिवार या परिस्थितियों से बंधे नहीं होते। *** उपदेशो मया देवि गुरुमार्गेण दर्शितः । गुरुभक्तिस्तथा ध्यानं सफलं तव कीर्तितम् ।।७१।। **हिंदी अनुवाद** हे देवी! मेरे इस उपदेश से गुरु के मार्ग पर चलना सिखाया गया है। गुरुभक्ति और ध्यान द्वारा तुमको सफलता प्राप्त होगी। *** अनेनैव भवेत्कार्यं यद्वदामि महाशये । लोकोपकारकं देवि लौकिकं तु न भावयेत् ।।७२।। **हिंदी अनुवाद** हे महाशये! मैं जो कह रहा हूँ, इसी से तुम्हारा कार्य सिद्ध होगा। हे देवी! यह सबके उपकार के लिए है, न कि सांसारिक कार्य के लिए। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **महाशये** पार्वती। * **लौकिकं तु न भावयेत्** इसे सांसारिक या साधारण नहीं समझना चाहिए। यह ज्ञान परम सत्य प्राप्ति के लिए है। *** लौकिकात्कर्मतो यान्ति ज्ञानहीना भवार्णवे । ज्ञानेन भावयेत्सर्वं कर्म निष्कर्म साम्प्रतम् ।।७३।। **हिंदी अनुवाद** ज्ञानहीन मनुष्य लौकिक कर्मों के कारण संसार के सागर में डूब जाते हैं। ज्ञान के प्रकाश में समस्त कर्मों को इस भाव से करने पर वे इसी समय 'निष्कर्म' हो जायेंगे। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **लौकिकात्कर्मतो** सांसारिक कर्मों से। रक्षण भक्षण प्रजनन या उपभोग या भौतिकवाद तक सीमित कर्म। * **भवार्णवे** संसार रूपी सागर में। * **निष्कर्म** वह कर्म जो कर्तापन के अभिमान से रहित होकर किया जाता है और इसलिए कोई बंधन उत्पन्न नहीं करता। *** इदं तु भक्तिभावेन पठ्यते श्रूयते यदि । लिखित्वा यत्प्रदातव्यं तत्सर्वं सफलं भवेत् ।।७४।। **हिंदी अनुवाद** यदि इस (गुरुगीता) को भक्ति भाव से पढ़ा या सुना जाए, अथवा इसे लिखकर किसी को प्रदान किया जाए, तो सभी कार्य सफल हो जाते हैं। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **लिखित्वा यत्प्रदातव्यं** लिखकर जो दिया जाता है। यह ज्ञान के प्रसार के महत्व (और फल) को दर्शाता है। *** भवव्याधिविनाशार्थं स्वयमेव जपेत्सदा । गुरुगीतात्मकं देवि शुद्धं तत्त्वं मयोदितम् ।।७६।। **हिंदी अनुवाद** हे देवी! मैंने यह जो शुद्ध तत्व रूपी गुरुगीता कही है, संसार रूपी रोग के विनाश के लिए इसका स्वयं ही सदा जप (स्मरण या अनुसरण) करना चाहिए। *** *इसके बाद के कई श्लोक कुछ तांत्रिक विधिओं में गुरुगीता के प्रयोग का वर्णन करते हैं। यह पुस्तक मनोकामना पूर्ति, सम्मोहन, धन, शत्रुओं पर विजय, स्त्री को मनचाहा पति पाने आदि आदि के लिए उपयोगी हो सकती है ऐसा वर्णित है, जो शायद समकालीन ज्ञानमार्गी साधक के लिए इतना उपयोगी नहीं, इसलिए यहाँ उल्लेखित नहीं है।* *** संसारमूलनाशार्थं भवपाशनिवृत्तये । गुरुगीता भवेत्स्नानं तत्त्वज्ञः कुरुते सदा ।।९१।। **हिंदी अनुवाद** संसार के मूल (अज्ञान) का नाश करने के लिए और भव-बंधन से निवृत्ति के लिए, तत्त्व को जानने वाला ज्ञानी पुरुष सदा गुरुगीता में (अर्थात इसके ज्ञान में) स्नान करता है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **संसारमूलनाशार्थं** संसार के कारण (अज्ञान) को नष्ट करने के लिए। * **भवपाशनिवृत्तये** जन्म-मरण के बंधन से छूटने के लिए। * **गुरुगीता भवेत्स्नानं** गुरुगीता ही स्नान है। यहाँ ज्ञान-गंगा में स्नान करने का भाव है। *** शयनस्थो ह्यासनस्थो वा गच्छंस्तिष्ठंस्तथापि वा । अश्वारूढो गजारूढः सुप्तो वा जाग्रतोऽपि वा ।।९२।। शुचिर्भूत्वा सदा ज्ञानी गुरुगीताजपेन तु । तस्य दर्शनमात्रेण पुनर्जन्म न विद्यते ।।९३।। **हिंदी अनुवाद** सोते हुए, बैठे हुए, चलते हुए या खड़े हुए, घोड़े पर या हाथी पर सवार, सोई हुई या जागी हुई अवस्था में भी, जो ज्ञानी पुरुष पवित्र होकर सदा गुरुगीता का जप करता है, उसके दर्शन मात्र से ही (देखने वाले का) पुनर्जन्म नहीं होता। **शब्दार्थ और व्याख्या** * इन श्लोकों में जप के लिए किसी विशेष अवस्था की बाध्यता को हटाते हुए निरंतर स्मरण पर बल दिया गया है। * **शुचिर्भूत्वा** पवित्र होकर (मन और शरीर से)। * **तस्य दर्शनमात्रेण** यह इसके अनुसरण के प्रभाव की महिमा का वर्णन है। चमत्कार नहीं, काव्यात्मक है। *** समुद्रे च यथा तोयं क्षीरे क्षीरं घृते घृतम् । भिन्ने कुम्भे यथाकाशस्तथात्मा परमात्मनि ।।९४।। **हिंदी अनुवाद** जैसे जल समुद्र में, दूध दूध में, और घी घी में मिलकर एक हो जाता है, और जैसे घड़ा फूट जाने पर उसके भीतर का आकाश महा-आकाश में मिल जाता है, उसी प्रकार (ज्ञानी की) आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाती है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * यह अद्वैत सिद्धांत का एक सुंदर व प्रसिद्ध उदाहरण है, जो जीवात्मा और परमात्मा की एकता को दर्शाता है। * **भिन्ने कुम्भे** घड़े के टूट जाने पर। *** तथैव ज्ञानी जीवात्मा परब्रह्मणि लीयते । ऐक्येन रमते ज्ञानी यत्र तत्र दिवानिशम् ।।९५।। **हिंदी अनुवाद** उसी प्रकार ज्ञानी जीवात्मा परब्रह्म में विलीन हो जाता है। वह ज्ञानी दिन-रात जहाँ कहीं भी रहता है, उस (ब्रह्म के साथ) एकता के आनंद में ही रमण करता है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **लीयते** विलीन हो जाता है। * **ऐक्येन रमते** एकता (अद्वैत) में आनंद लेता है। *** एवंविधो महामुक्तः सर्वदा वर्तते स्वयम् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन भक्तिभावं करोति यः ।।९६।। **हिंदी अनुवाद** इस प्रकार वह (गुरुगीता का अनुसरण करने वाला ज्ञानी) महामुक्त होकर स्वयं में स्थित रहता है। जो भी पूर्ण भक्तिभाव से ऐसा प्रयत्न करेगा वह ऐसा हो जायेगा। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **एवंविधो महामुक्तः** इस प्रकार जीवन्मुक्त होने पर। *** सर्वसिद्धिं प्राप्नुवन्ति भुक्तिमुक्तिं न संशयः । सत्यं सत्यं पुनः सत्यं निजधर्मो मयोदितः ।।९८।। **हिंदी अनुवाद** वे (ज्ञानी) सभी सिद्धियों, भोग और मोक्ष को प्राप्त करते हैं, इसमें कोई संदेह नहीं है। यह सत्य है, पुनः सत्य है, सत्य ही है; मैंने यह अपना धर्म कहा है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **निजधर्मो मयोदितः** मैंने अपना निज धर्म (कर्तव्य या स्वभाव) कहा है। यहाँ भगवान शिव इस ज्ञान की प्रामाणिकता और सत्यता की घोषणा कर रहे हैं। *** गुरुगीता समं नास्ति सत्यं सत्यं वरानने । गुरुर्देवो गुरुर्धर्मो गुरुर्निष्ठा परं तपः ।।९९।। **हिंदी अनुवाद** हे सुंदर मुख वाली (पार्वती)! गुरुगीता के समान कुछ भी नहीं है, यह सत्य है, सत्य है। गुरु ही देवता हैं, गुरु ही धर्म हैं, गुरु में निष्ठा ही परम तपस्या है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **गुरुर्निष्ठा** गुरु के प्रति अटूट श्रद्धा। * **परं तपः** सबसे बड़ी तपस्या। *** *१००-१०४ : गुरुभक्ति और गुरुगीता की महिमा का वर्णन यहाँ संक्षिप्तता हेतु उल्लेखित नहीं है।* *** शरीरमिन्द्रियं प्राणांश्चार्थः स्वजनबान्धवाः । माता पिता कुलं देवि गुरुरेव न संशयः ।।१०५।। **हिंदी अनुवाद** हे देवी! शरीर, इंद्रियाँ, प्राण, धन, अपने लोग, बंधु-बांधव, माता, पिता और कुल - यह सब कुछ गुरु ही हैं, इसमें कोई संशय नहीं है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * शिष्य की दृष्टि में गुरु ही उसके अस्तित्व का केंद्र और सर्वस्व होते हैं। *** विद्यातपोबलेनैव ये नरा मन्दभागिनः । गुरुसेवां न कुर्वन्ति सत्यं सत्यं वरानने ।।१०६।। **हिंदी अनुवाद** हे सुंदर मुख वाली! जो मंदभागी मनुष्य विद्या, तप और बल (के अहंकार) के कारण गुरु की सेवा नहीं करते, (उनका पतन निश्चित है) यह सत्य है, सत्य है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **मन्दभागिनः** अभागे। *** इदं रहस्यं नो वाच्यं तवाग्रे कथितं मया । सुगोप्यं च प्रयत्नेन येनात्मत्वं प्रयास्यसि ।।११०।। **हिंदी अनुवाद** यह रहस्य किसी (अयोग्य व्यक्ति) से नहीं कहना चाहिए जो मैंने तुम्हारे समक्ष कहा है। इसे प्रयत्नपूर्वक अत्यंत गोपनीय रखना, जिससे तुम आत्म-स्वरूप को प्राप्त करोगी। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **नो वाच्यं** नहीं कहना चाहिए। * **सुगोप्यं** भली-भांति गोपनीय। आध्यात्मिक ज्ञान को अपात्र व्यक्ति को नहीं देना चाहिए, क्योंकि वह इसका दुरुपयोग कर सकता है या इसका महत्व नहीं समझेगा या स्वयं की हानि कर लेगा। *** स्वामिमुख्यगणेशादिवैष्णवानां च पार्वति । मनसापि न वक्तव्यं मम सान्निध्यकारकम् ।।१११।। **हिंदी अनुवाद** हे पार्वती! जो (अन्य देवी-देवताओं जैसे) स्वामी, गणेश, विष्णु आदि को ही मुख्य मानते हैं, उनसे मन में भी इस ज्ञान को नहीं कहना चाहिए जो मुझे (शिव को) तुम्हारे निकट लाता है। **शब्दार्थ और व्याख्या** * यहाँ आशय उन लोगों से है जो भेद-बुद्धि रखते हैं और गुरु को परमतत्व के रूप में स्वीकार नहीं कर पाते। *** अभक्तो वञ्चको धूर्तः पाखण्डी नास्तिको नरः । मनसापि न वक्तव्या गुरुगीता कदाचन ।।११२।। **हिंदी अनुवाद** जो अभक्त, धोखेबाज, धूर्त, पाखंडी और नास्तिक मनुष्य हैं, उनसे मन में भी कभी गुरुगीता का उपदेश करने का विचार नहीं करना चाहिए। **शब्दार्थ और व्याख्या** * यह श्लोक ज्ञान देने के लिए पात्र की योग्यता पर बल देता है। *** अतीवपक्वचित्ताय श्रद्धाभक्तियुताय च । प्रवक्तव्यमिदं देवि ममात्मासि सदा प्रिये ।।११३।। **हिंदी अनुवाद** हे देवी! तुम सदा से मेरी आत्मस्वरूप प्रिया हो। यह ज्ञान उसी को देना चाहिए जिसका चित्त अत्यंत परिपक्व हो और जो श्रद्धा तथा भक्ति से युक्त हो। **शब्दार्थ और व्याख्या** * **अतीवपक्वचित्ताय** जिसकी बुद्धि अति तेज, ग्रहणशील और परिपक्व हो। गुरुगीता सबके लिए नहीं है। इसे सभी न स्वीकार करेंगे न समझ पाएंगे। इसलिए सुपात्र को ही यह पुस्तक देना चाहिए अन्यथा गोपनीय रखें, यह स्वयं शिव का आदेश है। *** संसारसागरसमुद्धरणैकमन्त्रं ब्रह्मादिदेवमुनिपूजितसिद्धमन्त्रम् । दारिद्र्यदुःखभयशोकविनाशमन्त्रं वन्दे महाभयहरं गुरुराजमन्त्रम् ।।११४।। **हिंदी अनुवाद** जो संसार सागर से उद्धार करने वाला एकमात्र मंत्र है, जो ब्रह्मा आदि देवों और मुनियों द्वारा पूजित सिद्ध मंत्र है, जो दरिद्रता, दुःख, भय और शोक का विनाश करने वाला मंत्र है, उस महाभय को हरने वाले 'गुरु' रूपी राज-मंत्र की मैं वंदना करता हूँ। *** **॥ इति श्रीस्कन्दपुराणे उत्तरखण्डे ईश्वरपार्वतीसंवादे श्रीगुरुगीता सम्पूर्णा ॥** *इस प्रकार श्री स्कन्दपुराण के उत्तरखण्ड में ईश्वर-पार्वती संवाद के अन्तर्गत श्रीगुरुगीता (की अनुवादित संपादित कृति) सम्पूर्ण हुई।* *** <br><br><br>
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