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अज्ञेयता, मौन एवं ज्ञान का अंत।
सत्यम
चेतावनी: यह लेख केवल ज्ञानमार्ग के उन्नत साधकों के लिए है। यदि आपको ब्रह्मज्ञान प्रमाणित है, कृपा तभी इस लेख को पढ़ें। अन्यथा आपको मार्ग में उलझन होगी। कृपा वापिस लौटें। अज्ञेयता, मौन एवं ज्ञान का अंत। अज्ञेयता, साधक की वह स्थिति है; जहां उसे प्रमाणित होता है कि **"कुछ भी जाना नहीं जा सकता।"** उसमें यह गहन बोध जागृत होता है कि यहां **"कुछ भी ऐसा नहीं है, जो जानने योग्य है।"** क्योंकि मनुष्य के अनुभव और उसकी तार्किक बुद्धि इस विराट संभावना की तुलना में कुछ भी नहीं। अनुभव विकृत होते हैं, सीमित होते हैं, झूठे होते हैं। वहीं "तर्क का तर्क होना" ही उसका सीमित होना है, वह तो केवल स्मृति में उन झूठे अनुभवों को और भी छोटे भागों में काटता है, जिनके आधार स्वयं मनुष्य द्वारा दिए गए हैं: सुक्ष्म और स्थूल, जीवित और निर्जीव, स्वप्न और जागृति, तत्व और नाम रूप, सत्य और असत्य, उपयोगी एवं व्यर्थ आदि। और फिर उन झूठे अनुभवों को भी काटकर, दूसरे ऐसे ही भाग से जो स्मृति में पड़ा है, संयोजन करके तीसरी वस्तु "ज्ञान" को जन्म देता है। इस प्रकार **"ज्ञान भी अज्ञान ही है"**, यह साधक को प्रमाणित होता है। यहां साधक, "मनुष्य रूप की सीमितता" को पूर्णतया स्वीकार करता है। इसीलिए अब उसके सभी प्रश्न ही निराधार होकर गिर जाते हैं। जिन प्रश्नों को लेकर साधक ने अपनी यह ज्ञान की यात्रा प्रारंभ की थी। वे सभी "मूल प्रश्न" ही निराधार एवं मूर्खतापूर्ण है, यह पूरी तरह से सिद्ध हो जाता है। क्योंकि इस विराट संभावना पर वे प्रश्न लगाना मूर्खता है जिन प्रश्न प्रकारों से उसने अपनी प्रजाति के जन्म से आज तक अपना जीवन चलाना सीखा है, जैसे क्या, क्यों, कैसे, कौन, कितने, कहां, कब आदि। ये "सभी प्रश्न सीमित है और प्रयोग करने पर केवल सीमित उत्तर ही प्रदान करते हैं।" जब साधक को ज्ञान की इस सीमितता का बोध होता है, तभी साधक अज्ञेयता की स्थिति प्राप्त करता है। और जब साधक का यह बोध दृढ़ हो जाता है, तब साधक अज्ञान के साथ-साथ **"ज्ञान का भी त्याग"** करता है। वह सत्य का, असत्य का, तत्व और नाम रूप आदि तथ्यों का, सत्य के मानदंडों का, ज्ञान की विधियों आदि का, और "दर्शन और मार्ग" का भी त्याग करता है। क्योंकि अब उनका कोई काम नहीं। जैसा कि गुरुजी कहते हैं कि: १. ज्ञान के कांटे द्वारा ही, अज्ञान का कांटा निकाला जाता है, परंतु अब ज्ञान के कांटे का कुछ काम नहीं। उसको भी फेंक देना है, वरना अब ज्ञान का कांटा चुभने लगेगा। २. किनारे पर पहुँच कर नाव को भी त्याग देना चाहिए। उसको सिर पर बोझ बनाकर नहीं घूमना चाहिए। यहां नाव और कांटे से तात्पर्य, यह मार्ग और इसकी शिक्षाएं ही हैं जिनका त्याग आवश्यक है। अब इस स्थिति में साधक कैसे कहे कि "है।" या "नहीं है।", क्योंकि जानना संभव नहीं। जानने के पश्चात ही निश्चित तौर पर कुछ भी कहा जा सकता है कि "है।" या "नहीं है।" इसीलिए चुप रहना ही सही विकल्प के रूप में चुना जाता है। यह बोध ही ज्ञानमार्ग का अंत और वास्तविक शांति का आरंभ है। ज्ञानमार्ग ने अंततः अपना वचन पूरा किया, सम्पूर्ण विनाश। ज्ञानमार्ग की कृपा इतनी है कि यह अपने आप को भी, आपके ऊपर बोझ नहीं बनने देता। यह अपना काम करके स्वयं को भी मार्ग से हटा देता है। इस तरह से ज्ञान मार्ग व्यक्ति को मुक्त बना देता है, वैरागी बना देता है, अत्यधिक बुद्धिमान बना देता है। अब उसकी बुद्धि में कोई अशुद्धि नहीं आ सकती। इसीलिए ज्ञानमार्ग को अंतिम मार्ग कहा गया है। जब साधक अज्ञेयता की स्थिति प्राप्त करता है, तब उसे अज्ञेयवादी कहा जाता है। जिसके लक्षण ज्ञानदीक्षा कार्यक्रम में इस प्रकार बताए गए हैं: १. अज्ञेयवादी संपूर्ण ज्ञान होने के बाद ज्ञान का भी त्याग कर देता है। और सभी विचारों, अवधारणाओं, दर्शनों, विचारधाराओं, परंपराओं आदि से मुक्त हो जाता है। २. अज्ञेयवादी, सदा सम्पूर्ण स्वतंत्रता से रहता है। न इसका पक्ष लेता है न उसका पक्ष लेता है। न कहता है कि ये मेरा मार्ग है, न ये कहता है कि ये मेरा मार्ग नहीं है। न कहता है कि ये मेरी साधना है, न वो साधना है। सभी कुछ त्याग देना ही अज्ञेयवाद है। ३. अज्ञेयवादी कुछ जानने का प्रयास नहीं करता क्योंकि जानने के लिए कुछ नहीं है। बस प्रश्न पूछता रहता है कि ये जाना गया है, क्या ये सत्य है? क्या ऐसा ही है? और ये प्रश्न पूछते ही साथ अज्ञेयता प्रकट हो जाती है। और अब कुछ नहीं करना। ४. अज्ञेयवादी उपदेश नहीं देता कि ये सत्य है, वो सत्य है। ऐसा जान लो, वैसा जान लो। सीधा ज्ञान देता है। सीधा ज्ञान अर्थात संपूर्ण विनाश। धो देता है, साफ कर देता है। अब तर्क नहीं आते, अब वाद-विवाद नहीं होता, अब शांति आती है, अब शब्द नहीं आते, अब मौन आता है। परंतु तब भी अज्ञेयवादी विसत्य का पूरा प्रयोग करता है। अपने सभी कार्य बिल्कुल वैसे ही करता है जैसे पहले करता था। क्योंकि वे ऐसे ही होते हैं इसीलिए वह उनको वैसे ही करता जारी रखता है। अब उसकी बुद्धि शुद्ध होती है। मेरा व्यक्तिगत सुझाव है कि तब भी मृत्यु तक चेतना का साथ न छोड़े। जिससे अज्ञान आपको जरा भी न छू पाए। वैसे तो अब अज्ञान कभी भी अपनी जड़े नहीं जमा सकता। परन्तु साक्षीभाव साधना के अपने फायदे हैं जैसे अनावश्यक का त्याग, चित्त की शांति, चित्त की परतों का शुद्धिकरण आदि आदि। धन्यवाद।
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