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ज्ञानतरंग: "अध्यात्म"
जानकी
"ज्ञानतरंग" सद्गुरूदेव श्री तरुण प्रधान जी द्वारा विभिन्न सत्संग, प्रवचन और लेखों में व्यक्त किए गए कुछ मुख्य विचारों का संकलन है। इस भाग में "अध्यात्म" से संबंधित कुछ ज्ञानतरंगों को प्रश्तुत किया गया है। यह श्रृखला के रुपमें इससे आगे भी क्रमश: प्रकाशित होता रहेगा। **अध्यात्म** १। अध्यात्म स्वयंका अध्ययन है, अस्तित्व का मूल तत्व का अध्ययन है, आत्मदर्शन है। २। प्रश्न आना समस्या नहीं, प्रश्न का उत्तर न खोजना समस्या है। इसके लिए अध्यात्म है। ३। जीवन यात्रा है हम यहाँ सिखने के लिए आए है सुख दुःख भोगने के लिए नहीं। ४। अध्यात्म शौकिया नहीं, मनोरंजन नहीं; जीवनशैली है। ५। जहाँ मुक्ति है वहाँ सुख है, अध्यात्म मुक्ति के लिए है। ६। अध्यात्म को संसार के ऊपर थोपा नहीं जा सकता। ७। क्रमश: लक्ष्य, मार्ग, परंपरा, गुरु, शिक्षा, साधना, उपाय, प्रगति, प्रभाव, फल; ये आध्यात्मिक यात्रा है। ८। सांसारिक बुद्धि विपरित है; उस विपरित बुद्धि के विपरित जाना अध्यात्म है। ९। असल संगत में अच्छे संस्कार अपने आप विकसित होता है। १०। सिद्धियाँ केवल आध्यात्मिक प्रगति के संकेत मात्र है, उपलब्धि नहीं। ११। लोग सोचते हैं कि अध्यात्म व्यक्ति को पत्थर कर देता है लेकिन अध्यात्म पत्थर को भी पिघला सकता है। १२। अध्यात्म का मूल शुद्धिकरण है। समाप्त कुछ नहीं होता, त्याग होता है, जो आसक्त है उनकी अध्यात्मिक प्रगति नहीं होती। १३। अध्यात्म में अनावश्यक सब छुट जाता है और आवश्यक सब मिल जाता है। १४। जीवन मनुष्य में प्रकाशित है, वह प्रकाश सही स्थान पर पड़ना चाहिए। इसलिए आध्यात्मिक जीवन जीना चाहिए। १५। अध्यात्म व्यक्तिगत विषय है, सबके लिए अलग-अलग है। १६। जैसे मछली के लिए तैरना कठिन नहीं है, वैसे मनुष्य को अध्यात्म कठिन नहीं है, यह केवल रुचि की बात है। १७। निश्छल भोग नक़ली आध्यात्मिकता से अच्छा है। १८। अध्यात्म में सांसारिक बुद्धि का प्रयोग विफल होता है। १९। विकास आध्यात्मिकता पर समाप्त नहीं होता, असली विकास यहीं से शुरू होता है। २०। आध्यात्मिक यात्रा कोई भेड़ चाल नहीं है, बल्कि यह निजी यात्रा है। २१। आध्यात्मिक प्रगति के लिए ज्ञान और गुरु ही कुंजी है। २२। अध्यात्म और दर्शन आम जनता के लिए नहीं है। २३। आध्यात्मिक उपलब्धि जन्मों का साधना है। चलना, बोलना सिखने जैसे सामान्य सांसारिक कार्य नहीं। २४। संसार ही निर्वाण है, संसार ही अध्यात्म है। २५। ज्ञानमार्ग में आध्यात्मिक खोज पहले दिन ही समाप्त हो जाता है, क्योंकि जिस का खोज है वो हमेशा यही है। २६। सत्संग अध्यात्म में आने का द्वार है। २७। संसार से पलायन वैराग्य नहीं। संसार की मिथ्या को जानते हुए, संसार से अप्रभावित रहना वैराग्य है। २८। आध्यात्मिक मार्ग और परंपरा वो व्यवस्था है जिससे आध्यात्मिक लक्ष्य मिलता है। २९। आध्यात्मिकता में आध्यात्मिक ज्ञान और व्यवहारिकता में व्यवहारिक ज्ञान उपयोगी है; दोनों को मिलाना नहीं चाहिए। ३०। अध्यात्म इस ब्रम्हाण्ड की सबसे बड़ी और महत्वपूर्ण और स्थायी व्यवस्था है। ३१। अध्यात्म में Stop बटन नहीं है Pause बटन है; जहाँ रोका था अगले जन्म में वहीं से शुरु होता है। ३२। आध्यात्मिक मार्गपर चलने के लिए गुरु धुरी है; जिसके आसपास सारा अध्यात्म घूमता है। ३३। ज्ञानमार्गी के लिए भीड़ भी एकान्त ही है। ३४। संसार से पलायन वैराग्य नहीं। संसार की मिथ्या को जानते हुए, संसार से अप्रभावित रहना वैराग्य है। ३५। ज्ञान का अर्थ मनुष्यता को त्यागना या और कुछ हो जाना नहीं है, मनुष्यता के परे हो जाना ही अध्यात्म है। ३६। जिस दिशा में नदी बह रही है उसी दिशा में नाव चलना है नहीं तो नाव डूब जाएगी। ३७। सुख, आनंद, मुक्ति, सेवा, ज्ञान, विकास, सिद्धि आदि जो भी संसार से छुट्टी दिलाता है वो आध्यात्मिक लक्ष्य है। ३८। अध्यात्म में चामत्कारिक प्रभाव कुछ भी आता है लेकिन प्रभाव लक्ष्य नहीं है; साधक का लक्ष्य आध्यात्मिक प्रभाव है जो संसार में नहीं दिखेगा। ३९। मनोशरीर का नियंत्रण अपने हात में लेना ही सबसे बडा चमत्कार है। मन को बाँधकर हमेशा एक ही स्थिति में रखना चमत्कार नहीं है। ४०। अध्यात्म घर जाने का रास्ता है। जो अध्यात्म में आ गया उसका विकास तेज हो जाता है, अहम के सीमाएं टुटने लगते हैं, सिद्धियाँ जो भूला दिए थे वापस मिलने लगते हैं। ४१। ज्ञानमार्ग प्रगतिशील मार्ग नहीं है, या तो प्रगति होगा या तो नहीं होगा। ये अपनी परम अवस्था तक पहुँचने का सीधा मार्ग है। यहाँ ज्ञान और अध्यात्म का अंत है। ४२। ज्ञानी जो बोलता है वह कोई नहीं समझता और अज्ञानी जो बोलते हैं वह अर्थहीन होता है इसलिए अध्यात्म और संसार असंगत है। ४३। ज्ञान के बाद भी जो प्रयास कर रहा है वह मार्गहीन है और जो आराम कर रहा, शांति और आनंद में है वही सही मार्ग पर है। ४४। अहम अंधकार में सुरक्षित महसूश करता है और प्रकाश में जाने में अनेक बहाना पैदा करता है। संसार अंधकार में रहना है और अध्यात्म प्रकाश की ओर जाना है। ४५। आध्यात्मिक प्रगति से संकल्प शक्ति बढ़ती है। संकल्प भी चित्त के नियम के अनुकूल होना चाहिए, नहीं तो संकल्प काम नहीं कर सकता। ४६। संदर्भों के अनुसार सत्य के विभिन्न स्तर होते हैं। अध्यात्म के लिए सभी स्तरों का सत्य जानना आवश्यक है। जिस स्तर पर बात होती है, उस स्तर पर वही सत्य होता है। व्यक्ति अपनी बुद्धि के स्तर अनुसार ही सत्य को समझता है। ४७। अध्यात्म की शुरुआत आध्यात्मिक लक्ष्य से होता है और लक्ष्य वो अंतिम अवस्था है जिसे पाने के लिए मनुष्य जन्म हुआ है। ४८। सांसारिक लोग अपनी आधारभूत आवश्यकता की पूर्ति होने पर एक जगह पर पहुँचते हैं उनको एक विशाल शून्य, खालीपन, और अर्थहीनता मिलती है। उनको किसी चीज़ की कमी का आभास होता है और उस कमी को उन्ही सांसारिक वस्तुओं में खोजने का प्रयत्न करते हैं। ४९। अस्तित्व न नैतिक है न अनैतिक है। नैतिकता और अनैतिकता, सुंदरता और कुरूपता मनुष्यद्वारा अस्तित्व के ऊपर आरोपित गुण है। ज्ञान और आध्यात्मिक प्रगति के लिए ये आवरणों को हटाकर देखना चाहिए। ५०। अध्यात्म में विरोधाभास बहुत मिलता है। विरोधाभास का अर्थ एक सही एक ग़लत नहीं है। विरोधाभास को समझने के लिए शुद्ध, परिष्कृत, आध्यात्मिक बुद्धि चाहिए, बहुस्तरीय ज्ञान चाहिए। ज्ञान के स्तर अनुसार अपना-अपना सत्य मिलता है। क्रमश:
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