Wise Words
Home
Read
Write
Publish
Profile
Logout
निष्काम कर्म मार्ग
दीपक गुर्जर
( यह लेख उन साधकों के लिए है जो आत्मबोध या भ्रम-भेदन के पश्चात् जीवन को अर्थहीन अनुभव कर रहे हैं। जब साधना गहराई में पहुँचती है और माया का आवरण हटने लगता है,तब जगत, कर्म और प्रयोजन सब व्यर्थ प्रतीत होने लगते हैं। यह अवस्था किसी पतन की नहीं, बल्कि एक गहन संक्रमण की होती है जहाँ साधक को यह समझने की आवश्यकता होती है कि अर्थहीनता के पार भी एक अर्थ है। यह लेख उसी मार्ग का संकेत है कि किस प्रकार ज्ञानी, इस जगत की नश्वरता को जानते हुए भी, निष्काम भाव से कर्म करता है। यह लेख किसी दर्शन को सिद्ध करने हेतु नहीं,बल्कि उस अनुभव को दिशा देने हेतु लिखा गया है जो जागृति के बाद उत्पन्न शून्यता में साधक को भटकाता है। ) # **निष्काम कर्म मार्ग ** भगवद् गीता के अध्याय 3 (कर्मयोग) न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन। नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥(3.22) यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतन्द्रितः। मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥ (3.23) कृष्ण ने कहा : हे अर्जुन! तीनों लोकों में मेरे लिए कोई कर्म नहीं है जो करने योग्य हो । ऐसा कुछ भी नहीं है जो प्राप्त करने योग्य हो और मैंने अभी तक प्राप्त न किया हो फिर भी मैं कर्म करता हूँ। मैं इसलिए कर्म करता हूँ ताकि संसार के लोग यह सीखें कि निष्काम भाव से कर्म करना संभव और आवश्यक है। यदि मैं कर्म करना छोड़ दूँ, तो लोग भी कर्म का त्याग कर देंगे और सृष्टि-क्रम बिगड़ जाएगा। इस जगत में हम चाहे जो भी कर्म करें सब अर्थहीन है। चाहे कर्ता कोई अवतार हो, युगपुरुष हो, महामानव हो, या विश्व-विजेता ही क्यों न हो सभी के कर्म नश्वर हैं, इस सतत परिवर्तनशील जगत में पाप-पुण्य, अच्छा-बुरा सब विलीन हो जाता है। नश्वरता की इस अनवरत धारा में कुछ भी शाश्वत नहीं टिकता। इस परिवर्तनशील जगत का मूल तत्व ही शून्य है। जो कुछ भी यहाँ प्रकट प्रतीत होता है, वह उसी शून्य में माया का प्रतिबिम्ब मात्र है। क्या यह आपका भी अनुभव नहीं कि जो भी कर्म हम करते हैं, उनका प्रभाव टिकता नहीं? क्षण भर को लगता है कि उसका प्रभाव हुआ है जैसे सिकंदर का विश्व-विजय अभियान मानो संसार को हिला गया हो, पर बताइए, आज कहाँ है वह प्रभाव? क्या कोई निशान बचा उस विजयोन्माद का? हमें लगता है कि महात्मा गाँधी के अहिंसात्मक कर्मों ने मानवता को नया मार्ग दिया, पर आज कितने लोग हैं जो उस कर्म से प्रभावित होकर अहिंसा के मार्ग पर चल रहे हैं? निस्संदेह, महापुरुषों के निष्काम कर्म कुछ शताब्दियों तक याद किए जा सकते हैं, पर युग बदलता है, काल खंड परिवर्तित होता है, और स्मृतियाँ धूल में मिल जाती हैं। जो कल था, आज नहीं है; जो आज है, कल नहीं रहेगा। अस्तित्व अखंड है निरंतर, शाश्वत, अपरिवर्तनशील। पर जो इसमें प्रकट होता है, वह नश्वर है, क्षणभंगुर है, परिवर्तनशील है। इस नश्वरता की नदी में कुछ भी ऐसा नहीं जो सदैव टिक सके। फिर प्रश्न उठता है जब सब अर्थहीन है तो क्यों कुछ किया जाए? क्यों न सब कुछ त्यागकर हिमालय की किसी गुफा में जा बैठा जाए? सही है ऐसा किया गया है, अनेकों महात्माओं ने ऐसा किया है, आप भी कर सकते हैं। पर वहाँ भी कर्म से मुक्ति कहाँ? वहाँ भी कुछ करना होगा चाहे वह तपस्या ही क्यों न हो। और दुर्भाग्य यह है कि वह तपस्या और उसका फल दोनों नश्वर हैं, दोनों अर्थहीन हैं। तो क्या आत्महत्या कर ली जाए? क्या इससे कर्मचक्र से मुक्ति मिल जाएगी? नहीं यह भी अज्ञान है। क्योंकि आत्महत्या शरीर का नाश है, जीव तो फिर भी कर्मचक्र में बँधा रहेगा। और मुक्ति? जो सदा से मुक्त है, उसकी मुक्ति कैसी? इसलिए यह सब भी अर्थहीन है। इस कर्म-संकट से निकलने का मार्ग है निष्काम कर्म। अस्तित्व अपरिवर्तनशील है, जो कुछ प्रकट है, वह भ्रम है, माया है। क्योंकि परिवर्तन का अनुभव उसी में संभव है जहाँ नश्वरता हो। परिवर्तन का यह भ्रम ही जगत की जड़ में है। जो इसे जान लेता है, वह माया के भीतर भी यथार्थ को देखता है। जो नहीं जानता, वह भ्रम को ही सत्य मानता है। जब ज्ञानमार्गी इस यथार्थ को जान लेता है, तब उसे जगत का प्रत्येक कर्म अर्थहीन और निर्थक प्रतीत होता है। तब तीनों लोकों में उसके लिए कोई कर्म नहीं बचता जो करने योग्य हो, कोई प्राप्ति नहीं रह जाती जो अप्राप्त हो। फिर भी ज्ञानी कर्म करता है क्योंकि वह जानता है, यही आवश्यक है। वह स्मरण रखता है सब कुछ अर्थहीन है, नश्वर है, समाप्त हो जाएगा। फिर भी जो करना है, वही करता है, कुशलता और सजगता से। ज्ञानी जानता है जीव के रूप में करने और न करने के विकल्प सीमित हैं, कर्म से मुक्ति संभव नहीं। इसलिए वह अनावश्यक का त्याग कर, केवल आवश्यक कर्म करता है। वही है निष्काम कर्म मार्ग। और उसी पर एक सच्चा ज्ञानी चलता है मुक्त होकर, फिर भी कर्म करता हुआ।
Share This Article
Like This Article
© Gyanmarg 2024
V 1.2
Privacy Policy
Cookie Policy
Disclaimer
Terms & Conditions