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आत्मन ही कृष्ण है
स्वप्रकाश
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इस कविता के माध्यम से मैंने श्री कृष्ण के मर्म का वर्णन करने का प्रयास किया है. श्री कृष्ण जो कि तत्वज्ञानी हैं और जिन्होंने अपनी इच्छा से योगमाया की शक्ति द्वारा इस सम्पूर्ण सृष्टि एवं जीवों की रचना की है. वे स्वयं ही इस मृत्युलोक में तत्वबोध कराने हेतु अवतरित होते हैं और इस जगत में गीता के रूप में ज्ञान का प्रसार करते है. उनके सत्य स्वरूप एवं गीता के मर्म को मैंने परम श्रद्धेय गुरुदेव एवं गुरुक्षेत्र की असीम कृपा से आत्मज्ञान प्राप्त कर के जाना है. यह हम सभी साधकों पर परम श्रद्धेय गुरुदेव एवं गुरुक्षेत्र की असीम करुणा से सम्भव हो सका है। कृपया इसका आनंद लें............ कृष्ण को मैंने कभी जाना ही नहीं। वे क्या हैं उनके सत्य स्वरूप को पहचाना ही नहीं।। मैंने उन्हें केवल एक देव के रूप में पूजा है। उनके गीताज्ञान के मर्म को कभी जाना ही नही।। मैं तो केवल उनके मोहिनी, मुरलीधर स्वरूप को ही पूजता रहा। उनके आत्मन स्वरूप को मैंने कभी पहचाना ही नही।। *कृष्ण को मैंने कभी जाना ही नहीं। वे क्या हैं उनके सत्य स्वरूप को पहचाना ही नहीं।।* जिस गीता को केवल एक धर्म ग्रन्थ समझकर मैं पूजता रहा। वह तो अद्वैत बोध का अप्रतिम, शाश्वत स्रोत है।। गीता के मन्त्रों को केवल धर्म शास्त्र समझकर मैं रटता रहा। बिना गुरु के अज्ञान की गलियों में व्यर्थ ही भटकता रहा।। *कृष्ण को मैंने कभी जाना ही नहीं। वे क्या हैं उनके सत्य स्वरूप को पहचाना ही नहीं।।* कृष्ण तो बचपन से योवन तक, माया में लीला करते रहे। स्वयं की योगमाया से उत्पन्न, इस मायावी जगत में तत्वज्ञानी बने रहे।। वास्तव में इस माया के सिनेमा में, किरदार कैसे निभाया जाता है। इस लीला में कृष्ण से बेहतर, कोई अभिनेता मैंने पाया ही नहीं।। जो कुरुक्षेत्र में स्थितप्रज्ञ होकर सत्य का संवाद कर सके, ऐसा कोई और हुआ ही नहीं। अर्जुन के विषाद एवं अज्ञान को, गीता ज्ञान से मिटा सके ऐसा कोई योगी नहीं।। *कृष्ण को मैंने कभी जाना ही नहीं। वे क्या हैं उनके सत्य स्वरूप को पहचाना ही नहीं।।* हर गुरु श्री कृष्ण और हर साधक अर्जुन रूप में। माया के कुरुक्षेत्र में तत्वज्ञान की प्रक्रिया दोहराते हैं।। स्वयं ब्रह्म ही गुरु के रूप में इस मायावी जगत में आते हैं। साधक पर कृपा करके, अज्ञान नाश का दायित्व उठाते है।। सभी में कृष्ण ही आत्मन स्वरूप में मन के पार बैठा है। कृष्ण की ही रचना यह मनोशरीर यंत्र, तत्वज्ञान हेतु योगमाया में उत्पन्न होता है।। हे गुरुदेव है आपको मेरा सत सत नमन। आपने करा दिया मेरे कृष्ण रूपी तत्व का दर्शन।। *कृष्ण को मैंने कभी जाना ही नहीं। वे क्या हैं उनके सत्य स्वरूप को पहचाना ही नहीं।।* <font color="green">**सभी सुखी हों, सभी समृद्ध हों, सभी ज्ञानवान हों, सभी सत्य जानें ........**</font> <font color="blue">**श्री गुरुवे नमः ....ॐ शांति शांति शांति .....**</font> <font color="blue">**आभार: मैं परम श्रद्धेय गुरुदेव श्री तरुण प्रधान जी एवं गुरुक्षेत्र का उनकी शिक्षाओं एवं मार्गदर्शन के लिए आभारी हूँ।**</font> **संपर्क सूत्र..** साधक की कलम से : स्वप्रकाश....... ईमेल: swaprakash.gyan@gmail.com