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ज्ञानतरंग- सत्य/असत्य
जानकी
<br><br><div class='ui image'><img width='1200px' src='images/89426796-Tarun Taranga.png'></div><br><br> "ज्ञानतरंग" श्रृखला में सद्गुरूदेव श्री तरुण प्रधान जी द्वारा विभिन्न सत्संग, प्रवचन और लेखों में व्यक्त किए गए विचारों में से कुछ प्रमुख ज्ञानतरंगों को महावाणी के रूप में इकट्ठा करके प्रकाशित करने का प्रयास कर रही हूँ। इस लेख में सत्य-असत्य से संबंधित कुछ ज्ञानतरंगों को प्रश्तुत किया गया है। यह श्रृखला के रुपमें विभिन्न विषयों पर इससे आगे भी क्रमश: प्रकाशित होता रहेगा। **सत्य-असत्य के बारेमें सभी संदर्भों में उपयोगी सामान्य ज्ञान** १। संदर्भों के अनुसार सत्य के विभिन्न स्तर होते हैं। जिस स्तर पर बात हो रही है, उस स्तर पर वही सत्य होता है। इसलिए अध्यात्म में सभी स्तरों का सत्य जानना आवश्यक है। २। व्यवहारिक सत्य व्यक्तिनिष्ठ और सापेक्षिक है, जब व्यक्ति और दर्शन बदल जाता है तब सत्य भी बदल जाता है, इसीलिए सन्दर्भों के अनुसार सत्य का यथार्थ को समझना चाहिए। ३। सत्य व्यक्तिनिष्ठ और मनमाना वर्गीकरण है। सत्य का कोई यथार्थ नहीं है, कोई आधार नहीं है। ४। ज्ञानमार्ग में सत्य का उपयोग बौद्धिक और तार्किक उपकरण के रूप में ही किया गया है। मार्ग, परंपरा परिस्थिति संदर्भ स्तर आदि के आधार में सत्य बदल जाता है। ५। अस्तित्व में जो भी हुआ है वो अपने आप हुआ है। मनुष्य ने अपने आवश्यकता/उपयोगिता के अनुसार सत्य/असत्य, विकास/सुधार/विनाश, असल/ख़राब, नैतिक/अनैतिक आदि का ठप्पा लगा देता है। सब कुछ अनित्य है, जब हमारे अनुसार कोई चीज़ बदलता है तो हम उसको सुधार कहते हैं और प्रतिकूल बदलता है तो उसको विकार करते हैं। जो कुछ भी हुआ है वो अपने आप हुआ है। ६। सत्य परम अवस्था तक पहुँचने की सिंढी मात्र है। परम अवस्था में पहुँचकर दोनों अवस्था को छोड़ दिया जाता है। सत्य वो काँटा है जिसके सहारे झूठ के काँटे को निकाला जाता है और दोनों काँटे को फेंक दिया जाता है। ७। मिथ्याकरण से जिसको सत्य मान लिया था उससे मुक्ति हो जाती है। अज्ञेयता रह जाता है; वो अज्ञेयता मैं स्वयं हूँ। यहाँ पर बुद्धि संतुष्ट हो जाती है। मिथ्या साबित हो गया तो छोड़ दिया जाएगा नहीं तो सत्य का तलाश जारी रहेगा। ८। सत्य कडवा ज़रूर होता है लेकिन कठोर नहीं होता; सरल होता है। परम सत्यका मानदंड कठोर होता है। ९। सत्य जानने के लिए उत्तरजीवीता के परे जाना पड़ता है। जो उत्तरजीविता तक सीमित है उनको सत्य जानने का ख़याल भी नहीं आएगा। १०। व्यक्ति अपनी बुद्धि के स्तर अनुसार ही सत्य को समझता है और परिभाषित करता है। इसीलिए परम सत्य को जानने के लिए ज्ञान के बहुस्तरीय चरण अनुसार गुजरना पड़ता है। **अद्वैत के स्तर पर सत्य** १। अद्वैत में सत्य असत्य दोनों है, दोनों नहीं है, विलीन है। २। अस्तित्व में न कुछ सत्य है, न कुछ असत्य है; जो है सो है। द्वैत में ज्ञान और कर्म के लिए सत्य/असत्य का विभाजन किया जाता है। ३। अस्तित्व में कुछ भी अच्छा बुरा नहीं है, जिसने असत्य को सत्य मान कर अच्छा बुरा मान लिया वह उसका अज्ञान है। **द्वैत के स्तर पर सत्य** १। शब्दों के पीछे कोई सत्य नहीं है और सत्य के पीछे कोई शब्द नहीं है। २। जो बिना शब्द के कहा गया है वो सत्य है, मौन सत्य हैं। ३। हर उत्तर मौन तक पहुँचने का साधन है। ४। सत्य द्वैत के स्तर पर ही परिभाषित है। इसलिए सत्य कहें या परम सत्य कहें द्वैत में ही है। ५। जो परिवर्तन नहीं होता है वही सत्य है, परम सत्य के स्तर पर केवल इतना ही ज्ञान होता है। ६। परम सत्य एक ही है, जिसको केवल अपरिवर्तनशीलता के मानदंड पर परखा जाता है। ७। सत्य अटल है, नित्य है, किसी पर निर्भर नहीं है। सत्य का आधार स्वयं सत्य ही है। ८। सत्य के धरातल में ही असत्य उभरता है। ९। सत्य को अनुभव द्वारा नहीं जाना जाता सत्य हुआ जाता है। १०। जब तक सत्य का ज्ञान नहीं होता तब तक जागृति नहीं होती। ११। सत्य बहुत सरल है, लेकिन उस स्तर तक पहुँचने के लिए अज्ञान का पहाड़ खोदना कठिन है। १२। जो अपना सत्य स्वरूप को जान गया है वह अपने मिथ्या स्वरूप को भी जान जाएगा। १३। अवधारणा वो होती है जो असत्य सिद्ध हो जाए। **व्यवहारिक स्तर पर सत्य** १। व्यवहारिकता में सत्य अवस्थाओं और संदर्भों के साथ बदलता है, इसको हम विसत्य कहते हैं। २। सत्य को उपयोगीता के आधार पर वर्गीकृत किया जाता है और व्यक्तिनिष्ठ मानदंड बना लिया जाता है। ३। जीवन सत्य/असत्य पर निर्भर नहीं है, चलता रहता है। ४। व्यवहारिक सत्य मनगढ़ंत है, सत्य/असत्य का कोई नियम नहीं है। सत्य केवल अनुभवों का वर्गीकरण है, इसलिए ज्ञानी सत्य/असत्य को लेकर कोई वादविवाद नहीं करता। ५। ज्ञान में सत्य/असत्य नहीं होता, ज्ञान केवल ज्ञान होता है। सत्य का भी ज्ञान होता है और असत्य का भी ज्ञान होता है। यदि हम माया का ज्ञान को सत्य मानते हैं या ज्ञान में कोई त्रुटि आ गया तो वो अज्ञान है। ६। अज्ञान भी ज्ञान के तरह संयोजित होता है। संयोजित होने का अर्थ सत्य होना नहीं है। ७। सत्य बोलना चाहिए लेकिन अप्रिय सत्य नहीं बोलना चाहिए। अप्रिय सत्य को हास्य या अन्य कोई उपाय से मीठा करके बोलना चाहिए। ८। सत्य को याद नहीं करना पड़ता, आँखों के सामने होता है लेकिन झूठ याद रखना पड़ता है। एक झूठ सिद्ध करने के लिए सौ झूठ बोलना पड़ता है। ९। इच्छाएँ सत्य को विकृत कर देती है। १०। सत्य विश्वास का विषय नहीं, प्रमाण सत्य है, स्वयं का अनुभव सत्य है। ११। झूट हर जगह है और सत्य ढूँढने से नहीं मिलता। १२। सत्य को अनुभव के रूप में देखने का चाह मनुष्य का स्वभाव है। क्रमश:
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