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नियति
योगेश सोनी
-:नियति:- यह सुनते ही अचानक कमल कुछ सोचते हुए अपने अतीत की गहराइयों में चला जाता है । एक आश्रम में जहाँ उसके गुरु सूखि हुई बेलों को बुनकर टोकरीयाँ बना रहे थे और बाल कमल वहाँ आकर आश्रम की सफ़ाई करने लगता है और साथ ही अपने गुरु को कहता है:- - आख़िर मैं ही क्यू ? आप हर बार मुझे ही कार्य सौंपते हो । अनिरुध को देखिए वो पूरे दिन खेलता रहता है उसे नही कहते कुछ । और करण उसे तो कहानियों की पुस्तक पढ़ने से ही फ़ुरसत नही है । हाँ श्रवण को शहर भेज देते हो इन टोकरियों को बेचने के लिए, मुझे नही, ये कैसा पक्षपात ?आप तो बस मुझसे बर्तन धुलवाते हो, सफ़ाई करवाते हो या आग जलाने के लिए जंगल से लकड़ियाँ लाने का कह देते हो । - (गुरुजी मन ही मन में मुस्कुरा रहे थे और साथ अपनी टोकरी बुन रहे थे पर इतने गम्भीर प्रश्नों के उत्तर देना भी ज़रूरी...फिर वे कमल की ओर देखकर बोले ) तुम सब को तुम्हारे उत्कृष्टतम व्यक्तित्व तक ले जाना मेरा दायित्व है । (कमल को सर खुजलाते देख गुरुजी समझ गये की उनके ये शब्द शायद गणित के सवाल की तरह कमल के सर के ऊपर से गुज़र गये) - (हालाँकि अभी भी कमल सफ़ाई करता हुआ अपने गुरु को सुन रहा था ) - (अब बारी थी उस सवाल की व्याख्या की ) तुम मना ही क्यू नही कर देते या अनसुना कर दो, मेरा वादा रहा मैं वापस तुम्हें कभी नही पुकारूँगा जैसे की इन्हें नही पुकारा। लेकिन मैं जानता हूँ की तुम ऐसा नही करोगे । तुमहारी नियति इन सबसे अलग है। जैसे अनिरुध को ही ले लो उसके गुणों से प्रतीत होता है की वो एक अच्छा योद्धा बन सकता है - (अब अपने गुरु की एसी बातें सुन बाल कमल की आँखो में एक अलग और अनदेखी सी उमंग थी) - (गुरु जी की व्याख्या जारी थी) और करण, मैं यक़ीन से कहता हूँ उसके तेज़ मस्तिष्क की बदोलत वह जीवन में एक बड़ी उपलब्धि हासिल करेगा बड़े बड़े और महान राजा इससे सलाह लेने दुर दुर से आएँगे और रहा श्रवण उसमें एक बड़े व्यापारी बनेने के गुण जिस राह पर वो अब चल ही रहा है - (कमल उत्साहित होकर अपना काम वहीं छोड फुर्ती से अपने गुरु के पास जाता है और कुछ उम्मीद से पूछता है ) गुरुजी मैं भी तो इस आश्रम में हु , मेरा भी तो बताइए मैं क्या बनूँगा - बाल कमल के चेहरे की खुशी देख गुरुजी ने उसके सिर पर अपना हाथ रखकर उसकी और देखते है और मुसकुराते हुए कहते है ) ........... तुम.... एकाएक कमल को अपने शरीर में कुछ हलचल महसूस हुई जिससे वो अतीत की गहराइयों से वापस अपने वर्तमान में पहुँच जाता है सामने देखता है तो एक बच्चा था जो उसके हाथ को पकड़ कर हिला रहा था - कहाँ खो गये आप गुरुजी ? आपने बताया नहीं, मैं ही क्यू ? हर बार आप मुझे ही कार्य क्यों सौंपते हो ( कमल ने गर्व से नम हो चुकी आँखो के साथ आकाश की ओर देखा और उसके मुख से निकल पड़ा) .....तुम सब को तुम्हारे उत्कृष्टतम व्यक्तित्व तक ले जाना मेरा दायित्व है । मेरे पूज्य गुरु श्री तरुण प्रधान को समर्पित।
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