ज्ञानाक्षर
अनुभवकर्ता हूँ मैं
स्वप्रकाश
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*मेरा मुझ में कुछ नहीं, जो कुछ है सो तेरा। तेरा तुझकौं सौंपता, क्या लागै है मेरा॥* **कबीर दास जी** सभी साधकों को प्रणाम। मैंने यहाँ अनुभवकर्ता को एक कविता के माध्यम से व्यक्त करने का प्रयास किया है। **अनुभवकर्ता हूँ मैं..** अनुभवकर्ता हूँ मैं, इस जगत का, इस जीव का, इस सम्पूर्ण अस्तित्व का । मैं इस जगत को बदलते देखता हूँ, मैं इसका अनुभव करता हूँ ।। अनुभवकर्ता हूँ मैं........ मैंने इस देह को रूप-रंग बदलते देखा है । मैंने इसे हर उम्र में नया श्रृंगार करते देखा है ।। मैंने इच्छाओं को पल-पल परिवर्तित देखा है । मैंने ही भावनाओं और वृत्तियों को देह पर राज करते देखा है ।। अनुभवकर्ता हूँ मैं...... मैंने ही इस जीव (मनोशरीर) को राग द्वेष करते देखा है । मैंने ही इसे देव और दानव बनते देखा है ।। मैंने ही इस मन-बुद्धि को बालक से प्रोढ़ होते देखा है ।। मैंने ही स्मृति को संचित होते देखा है ।। अनुभवकर्ता हूँ मैं....... मैंने इस जीव को समाज एवं देह के बंधनों में सुख-दुख भोगते देखा है । मैंने ही इसे अज्ञानी समाज की कठपुतली बने देखा है ।। मैंने ही समाज में रिश्तों को नित रूप बदलते देखा है । मैंने इस जीव को काम, क्रोध, लोभ, मोह की वृत्तियों में रस लेते हुए देखा है ।। अनुभवकर्ता हूँ मैं..... माया मेरे ही पटल पर अनुभवों, घटनाओं के रूप में घटित होती है । मैं सदा दृष्टा बने माया का खेल होते देखता हूँ ।। लोक बनते नष्ट होते हैं, विषय-वस्तुएँ आती जाती हैं । मैं इनका साक्षी सदा उपस्थित रहता हूँ ।। अनुभवकर्ता हूँ मैं...... मुझ में ही सारे पदार्थ उभरते, किन्तु मेरा कोई पदार्थ नहीं है । मुझ में ही सारे नाम-रूप उभरते, किन्तु मेरा कोई नाम-रूप नहीं है ।। मुझ में ही सारे रंग उभरते, किन्तु मेरा कोई रंग नहीं है । मुझ में ही सारे रस उभरते, किन्तु मेरा कोई रस नहीं है ।। अनुभवकर्ता हूँ मैं...... वो मैं ही हूँ जो जागृत, स्वप्न एवं सुषुप्ति का साक्षी है । मैं ही हूँ जो तीनों गुणों (सतो गुण, रजो गुण, तमो गुण) का साक्षी है ।। मैंने ही माया और सृष्टि रची है । मुझ से ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश की वृत्ति उपजी है ।। अनुभवकर्ता हूँ मैं...... न मेरा कोई आदि-अंत; अजन्मा, अजर, अमर, नित्य हूँ मैं । न मेरा कोई रूप-रंग, न मेरा कोई आकार-प्रकार; निर्गुण, निराकार हूँ मैं ।। न मेरा कोई ओर छोर, न मेरा कोई गाँव देश; अनंत, सर्वव्यापी हूँ मैं । न मेरी कोई प्रक्रिया, न कारण; अकारण, स्वयंसिद्ध हूँ मैं ।। अनुभवकर्ता हूँ मैं...... द्वैत भी मुझ से प्रकाशित, अद्वैत, स्वप्रकाशित हूँ मैं । मैं एकता, मैं पूर्णता, सम्पूर्ण अस्तित्व हूँ मैं । मैं ब्रह्म हूँ, मैं शिव हूँ, मैं आत्मन हूँ, पूर्णानंद हूँ मैं ।। अनुभवकर्ता हूँ मैं...... मैं सभी का तत्व हूँ, सत्य हूँ मैं । मैं पदार्थ हीन हूँ, शुन्यता हूँ, अज्ञेय हूँ मैं ।। ज्ञान से मुझे नहीं जाना जाता, अनुभवकर्ता होकर जाना जाता हूँ मैं । मुझ को मुझ होकर जाना जाता है बस इतना सरल हूँ मैं ।। अनुभवकर्ता हूँ मैं..... अज्ञान के अंधकार ने मुझे आभासी बंधक बना दिया । गुरुदेव ने आत्मबोध से मुझे देह से दृष्टा बना दिया ।। आभारी हूँ गुरुदेव का, जिन्होंने करुणा दिखायी । मुझे साक्षीभाव प्रदान कर कृपा दृष्टि बरसायी ।। अनुभवकर्ता हूँ मैं...... साक्षी भाव की साधना जीवन भर दोहराना है । साक्षी के प्रकाश में अहम को अनुभवकर्ता हो जाना है ।। अनुभवकर्ता हूँ मैं. अनुभव करता हूँ मैं........ **आभार:** मैं परम श्रद्धेय गुरुदेव श्री तरुण प्रधान जी एवं गुरुक्षेत्र का उनकी शिक्षाओं एवं मार्गदर्शन के लिए आभारी हूँ। संपर्क सूत्र.. साधक: स्वप्रकाश....... ईमेल:swaprakash.gyan@gmail.com