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ज्ञानतरंग: "ज्ञान, अज्ञान - भाग ४"
जानकी
**ज्ञान, अज्ञान - भाग ४** प्रश्तुत लेख सद्गुरूदेव श्री तरुण प्रधान जी द्वारा विभिन्न सत्संग, प्रवचन और लेखों में "ज्ञान, अज्ञान" के विषय में व्यक्त कुछ मुख्य बिंदुओं का संकलन है। इस विषय पर इससे पहले के भागों में क्रम संख्या १ से लेकर ९५ तक उल्लेख है। यह भाग ९६ से २०० तक है। यह लेख श्रृखला के रुपमें इससे आगे भी क्रमश: प्रकाशित होता रहेगा। <br><br><div class='ui image'><img width='1200px' src='images/89426796-knowledge-power-concept-wooded-table-dark-green-background-light-coming-above-97746106.webp'></div><br><br> ९६। जीवन अज्ञान से रचा गया सपना है। ९७। केवल अनुभवकर्ता ख़ाली है; बाक़ी सब अज्ञान से भरा है। ९८। ज्ञान संचित नहीं हो सकता, जो संचित है वह अज्ञान है, यानी माया का ज्ञान है। ९९। अर्धज्ञान अज्ञान से भी ख़तरनाक होता है। १००। अज्ञान का आदि अंत नहीं है; क्योंकि माया अनंत है। १०१। ब्रम्ह को जाने बिना "मैं ब्रम्ह हूँ" कहना या स्विकार/अस्विकार भाव होना भी अर्थहीन है, अज्ञान है। १०२। अज्ञान का अर्थ न जानना नहीं है; अप्रमाणित मान्यताएँ बना लेना, काल्पनिक चीजों को सत्य मान लेना अज्ञान है। १०३। रचना रचनाकार को नहीं जान सकता। १०४। अज्ञान रोग है और उसका इलाज जिज्ञासा/प्रश्न का उत्तर है; दवाई कड़वी होती है। १०५। अज्ञान काँटा है, ज्ञान दूसरा काँटा है; काँटे को निकालने के लिए काँटा का ही उपयोग करना पड़ता है, काँटे निकालने के बाद दोनों काँटों को फेंक दिया जाता है; ऐसे ही अज्ञान निकालने के लिए ज्ञान का उपयोग है, ज्ञान होने के बाद दोनों को फेंक देना चाहिए। १०६। बचपन में ही हर चिज की बीज पड़ती है; जहाँ पर मान्यताओं का जंगल नहीं बना है वहाँ पर ज्ञान का बीज जल्दी बढ़ता है। १०७। ज्ञान होने के लिए संदेह मिटना ज़रूरी है; उत्तर से संतुष्टि नहीं मिली तो शंका और अज्ञान बचेगा। १०८। शब्दों का हेराफेरी ज्ञान के लिए ख़तरनाक होता है; अर्थ का अनर्थ कर देता है। १०९। बुद्धि की अशांति अज्ञान दिखाती है; जब सारे प्रश्न के उत्तर आ जाते हैं तब बुद्धि शांत होती है। ११०। दो तरह के लोगों को कोई प्रश्न नहीं आते, एक वह जिसको सम्पूर्ण अज्ञान है और समझता है कि "मैं सबकुछ जनता हूँ या मैं निकम्मा हूँ कुछ नहीं जान सकता" और एक वह जिसको सम्पूर्ण ज्ञान है। १११। प्रश्न सही या गलत नहीं होते; उन प्रश्नों के पिछे जो मान्यता छिपी है वह सही या ग़लत हो सकती है। ११२। अनुभवकर्ता के अनेक नाम हैं, जिस प्रकार का अज्ञान आता है अनुभवकर्ता को उस प्रकार का नाम देकर उस मान्यता को तोड़ दिया जाता है। ११३। अस्तित्व या अनुभवकर्ता का हर नाम एक न एक अज्ञान हटाता है। ११४। सभी मान्यता नष्ट करने के बाद सरलता बचती है; जटिलता धूल जाती है। ११५। तर्क का प्रयोग मान्यताओं का खण्डन करके अज्ञान हटाने में सहायक है। ११६। अहंकार को अपना नाश होने का बड़ा डर लगता है; इसलिए वहाँ जाना नहीं चाहता जहाँ अहम के लिए ख़तरा है। ११७। अज्ञान का नाश महत्वपूर्ण है; अहम नाश नहीं हो सकता। ११८। ज्ञान नकारात्मक होता है; अज्ञान का नाश ज्ञान है। ११९। अज्ञान का नाश एक ही वाक्य से संभव है, क्योंकि अज्ञान ताश के पत्तों का घर के समान है। १२०। मनुष्य बहुत नाज़ुक प्राणी है; जरा सा धक्का से ज्ञान चला जाता है और अज्ञान वापस आ सकता है। १२१। अज्ञान के नाश के बाद जब जानने के लिए कुछ नहीं बचता; वही अंतिम है। १२२। ज्ञान से स्वर्ग की प्राप्ति नहीं होगी; त्याग होगा। १२३। अनावश्यक क्षेत्र में बुद्धि को चलाना बुद्धि का दुरुपयोग है। १२४। ज्ञान से भाषा शुद्ध होगी और भाषा से ज्ञान शुद्ध होगा। १२५। एकता का ज्ञान तब होता है जब द्वैत की मिथ्या देखी जाती है। १२६। आत्मज्ञान अहम की मिथ्या का ज्ञान करवाएगा; ब्रम्हज्ञान अहम् के सर्वव्यापकता का ज्ञान करवाएगा। १२७। आत्मज्ञान आधा ज्ञान है और ब्रम्हज्ञान पूरा ज्ञान है; शून्य से शुरू होकर शून्य में समाप्त। १२८। आत्मज्ञान के बाद जगत और जागृति भी स्वप्न के तरह लगता है। १२९। आत्मज्ञान न उच्च अवस्था है न नीच; सबसे सरल अवस्था है। १३०। प्रगति तभी तक होती है जब तक अज्ञान है; आत्मज्ञान अंतिम है। १३१। आत्मज्ञान खोजना चाहिए आत्मज्ञानी नहीं; आत्मज्ञानी कोई नहीं मिलेगा। १३२। ब्रम्हज्ञान सम्पूर्णता से शून्य और शून्य से सम्पूर्णता की यात्रा है। १३३। अनुभव होना और ज्ञान होना बहुत फर्क है। १३४। अस्तित्व को अनंत अनुभव ही हो रहा है, परंतु अनंत ज्ञान नहीं हो रहा। १३५। अनंत ज्ञान नहीं हो सकता क्योंकि उसके लिए अनंत स्मृति होनी चाहिए जो जीव में संभव नहीं। १३६। सीमित करने के बाद ही अनुभव का अर्थ होता है, उसी को ज्ञान कहेंगे, सीमित करने का माध्यम इंद्रिय है। १३७। अपरोक्ष अनुभव को तर्क के तराज़ू में तौलकर ज्ञान प्रमाणित किया जाता है। १३८। ज्ञान शाब्दिक नहीं होता, अनुभव से होता है; उस अनुभव को कोई भी नाम दिया जा सकता है। १३९। शास्त्रों से ज्ञान नहीं होता, शास्त्रों में ज्ञान होता है जो आपके अनुभव की ओर संकेत करता है, अनुभव दिलाता नहीं। १४०। शब्द तार्किक न लगे, अपने अनुभव में सही न लगे तो अर्थ गलत है; जहाँ से शब्द आया है वहीं अर्थ खोजना चाहिए। १४१। ज्ञान के लिए अपरोक्ष अनुभव और तर्क का प्रयोग ही मूल मंत्र है। १४२। ज्ञान के लिए शरीर आवश्यक है; इंद्रियों से जो अनुभव मिलता है उसी से ज्ञान होता है। १४३। जब तक प्रमाण नहीं मिलता तब तक प्रश्न आते रहेगें; प्रमाण मिलने पर प्रश्न समाप्त होते हैं; प्रमाण स्वयं लेना होगा। १४४। शब्द के काल्पनिक अर्थ बनाना मार्ग से भटकना है। १४५। शंका का समाधान होना और हार मान कर शंका को हटा देना अलग-अलग बात है। १४६। ज्ञान भी मिथ्या है और जो ज्ञान को सँभाल कर रखना चाहता है वह भी मिथ्या है। १४७। ज्ञान होता नहीं; लीला होता है। १४८। जब जागेंगे, आँख खुलेंगे तब सब छूटेगा। १४९। जानना न जानना, ज्ञान/अज्ञान मनुष्य निर्मित धारणा है। १५०। मंदिर निर्माण का लक्ष्य ज्ञान देना है इसलिए मंदिरों में ज्ञान के विभिन्न प्रतीक और चिन्ह मिलते हैं। १५१। ज्ञान मंदिर ही आपका मंदिर है। १५२। सपना को जान लेना ही सपने से जागना है। १५३। ज्ञान के बाद जो हो रहा है वह प्रकाशित होता है; कुछ जादू या चमत्कार नहीं होगा। १५४। ब्रम्ह स्वयं को भूलने का खेल खेल रहा है तो हमें भी उसका मज़ा लेना चाहिए। १५५। आध्यात्मिक ज्ञान संसार से निर्वाण के लिए है; संसार में इसका कोई उपयोग नहीं। १५६। जिसको ख़ाली होने का साहस है उसी को ज्ञान हो सकता है, जो ख़ाली होने से डर गया उसको ज्ञान नहीं होता। १५७। जो लोग शब्दों का पहाड़ इकट्ठा कर रहे हैं वे शब्दकोष बन जाएँगे; ज्ञानी नहीं। १५८। जो ज्ञात है वह अभी जाना जा सकता है। १५९। कोई घटना भूल गए तो वह घटना हुआ था या नहीं इसका ज्ञान भी नहीं होगा; क्योंकि भूलावा इतना गहरा है कि भूलने का ज्ञान भी नहीं है। १६०। ज्ञान और मार्ग तो नौका के तरह है, किनारे पहुँच गए तो छोड़ देना है, पकड़के नहीं घुमना चाहिए। १६१। जैसे पुरुष को पुरुष होने में और स्त्री को स्त्री होने में कोई प्रयास नहीं लगता वैसे ही मुझे द्रष्टा होने में कोई प्रयास नहीं लगता। १६२। ज्ञान के लिए सबसे बड़ी बाधा अहम् है, क्योंकि ज्ञान होने के बाद अहम् गिर जाता है; अपना पतन कोई नहीं चाहता। १६३। अनुभवकर्ता का ज्ञान प्रयास से नहीं होता; देखने (दृष्टि) से होता है। १६४। जो है वह हो जाना ज्ञान है। १६५। ज्ञान के लिए कहीं जाना नहीं है, कुछ करना नहीं है; ख़ाली होना है। १६६। ज्ञान अपरोक्ष होना चाहिए, काल्पनिक ज्ञान से साधक का पतन होता है; प्रगति नहीं। १६७। मूलज्ञान के बिना कोई ज्ञान होना संभव नहीं। १६८। ज्ञान होने के बाद आसक्तिभाव मैत्री और प्रेम में बदल जाएगा। १६९। जानने के लिए अर्थ ढूँढना ज़रूरी है और उसको अपरोक्ष रुपसे जीना ज़रूरी है। १७०। ज्ञान के लिए शब्दों के परे जाना होता है; जिसको ज्ञान है वह नि:शब्द है। १७१। ज्ञान का ख़रीद बिक्री नहीं होता, ना ही ज्ञान किसी के नियन्त्रण में है। १७२। बच्चों के तुलना में बड़ों को ज्ञान देना कठिन कार्य है; बड़े सुखी हुईं लकड़ी के तरह हैं, टूट सकते हैं लेकिन मुड़ नहीं सकते। १७३। बच्चों पर मतारोपण नहीं करना चाहिए; झूठ और ग़लत नहीं सिखाना है; जिज्ञासु बनाए रखना चाहिए। १७४। जो भी होता है कुछ न कुछ सिख देकर जाता है। १७५। शब्दों का अर्थ होता नहीं; अर्थ दिया जाता है। १७६। जब उलझन होता है तो विषय को सटीक बनाना आवश्यक है। १७७। कुछ ना बचना (शुद्धता) ही ज्ञान है। १७८। एकता का ज्ञान स्वप्रमाणित है, इसको प्रमाणित करने के लिए यहाँ दूसरा कोई नहीं है। १७९। ज्ञान में याद रखने का कुछ नहीं है, समझने का है, देखने का है। १८०। अज्ञात को ज्ञात में बदलने का तरीका प्रयोग है। १८१। उपमा केवल सम्झाने के लिए है; द्रष्टा को नहीं देख पाएंगे; इसलिए जिस को हम देख पाते हैं उसका सहारा लेकर बुद्धि को शांत करने के लिए उपमाओं का प्रयोग किया जाता है। १८२। जब तक घटित न हो जाए या प्रयोग न किया जाए तब तक माया का ज्ञान नहीं हो सकता; सत्य का ज्ञान अभी होता है, उसके लिए कोई विशेष घटना होना ज़रूरी नहीं है। १८३। "मैं" शब्द ज्ञान के पहले अहम के तरफ़ और ज्ञान के बाद अनुभवकर्ता के तरफ़ संकेत करता है। १८४। ज्ञान के बाद उसी अनुसार अपने सोच विचार को आगे ले जाना चाहिए। १८५। परम ज्ञान अज्ञान का अभाव मात्र है; ज्ञान होने का अर्थ कुछ नया नहीं मिलता; जो जाना था वह असत्य जान लिया जाएगा। १८६। जैसे अज्ञान मिथ्या है वैसे ज्ञान भी मिथ्या है; इसलिए आता-जाता है; जो सत्य है वह आता-जाता नहीं, नित्य है। १८७। जब सत्य का ज्ञान होता है तभी कल्पना का कोई अर्थ है, नहीं तो काल्पनिक ज्ञान हानिकारक है। १८८। ज्ञानमार्ग में मूलज्ञान को ३ भागों में बताया जाता है; आत्मज्ञान (मैं क्या हूँ) मायाज्ञान (मैं क्या नहीं हूँ) और ब्रम्हज्ञान (एकता/सम्पूर्णता का ज्ञान) होता है, ये तीनों मेरे ओर संकेत करते हैं। १८९। तथ्य अक्सर सकारात्मक होता है और बदल सकता है लेकिन ज्ञान नकारात्मक है; नहीं बदलता। १९०। अनुभवकर्ता होने में और अनुभवकर्ता का ज्ञान होने में बहुत भिन्नता है। १९१। ज्ञान के लिए जागृत अवस्था जरुरी है। १९२। संभावना का अनुभव और ज्ञान नहीं हो सकता; ये अस्तित्व स्वयं है। १९३। अज्ञान नाश होने के बाद जो बच जाता है वो ज्ञान है इसलिए ज्ञान नकारात्मक है। १९४। माया का ज्ञान अनंत है और भ्रामक है। १९५। मायावी जगत में जीने के लिए मायावी ज्ञान ही काम आता है। १९६। जब जीव में मैं का जन्म होता है तब वह योग से, सत्य से दूर हो जाता है; अज्ञान में पड़ जाता है। १९७। माया का अध्ययन करने का शास्त्र विज्ञान है; माया का अध्ययन करने के लिए वैज्ञानिक बुद्धि, अपरोक्ष अनुभव और तर्क आवश्यक है। १९८। ज्ञान या अज्ञान का कोई श्रोत नहीं है; या फिर सभी का श्रोत मैं स्वयं हूँ। १९९। बुद्धि तब मौन हो जाती है जब अधिकतर प्रश्न का उत्तर मिल जाता है। २००। दीया बस जलना पड़ता है प्रकाश अपने आप फैलता है; वैसे ही ज्ञान केवल धारण करना पड़ता है और वह फैलता रहता है। क्रमशः
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