ज्ञानाक्षर
साक्षी और आभास
निशिगंधा क्षीरसागर
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मै कौन प्रश्न उठा ? उत्तर खोजने मै चला जीवन क्या है -- क्यू है ? जगत क्या है -- क्यू है ? और मै यहाँ क्यू हू ? सवालो कीं टोकरी लिये था सिरपर बोझा ढोये मै चला उत्तर खोजने जिज्ञासा कीं झोली गले वैराग्य का कटोरा लिये धोखा दुःखो कीं चोट खाये धुंडता रहा मार्ग अनेक ब्रह्म कीं जिज्ञासा सखी हारे का सहारा बनी निश्चय कीं ठोस दंडी घुमाकर गोल गली गली अंतिम राह शिखर कीं चोटी ज्ञानमार्ग कीं मंजिल मिली.....!! ब्रह्म जानने निकला था सर्वप्रथम अहं को जाना मिथ्या अहं अभिमान मेरा जिसके कारण था द्वैत सारा मिथ्या मै का मिथ्या भ्रम जानकर पाया सत्य आधा माया मोह अहं सारा जीवन संसार मिथ्या जाना आधा ज्ञान अभी बाकी जो दिखता होता नही आधार जिसका मै हू वही ज्ञान कीं दृष्टी देख तो सही....!!! प्रतिती अनुभव दिख रहा द्रष्टा बनकर मै हि खडा प्रतिती का आधार कौन? प्रश्न करते हि सत्य दिखा नित्य शुद्ध सत्य अहं अज्ञान का अधिष्ठान बना धुवा जैसे अग्नी घेरता अज्ञानने चारोऔर मुझेहि ढका सीमित अज्ञानी जीव बना मिथ्या अहंसे मैपना कर्तापना कर्तापना भोक्तापना बंधन पडा जो कभी बंधा नहीं जो नित्य मुक्त मुझमें जन्मादी का बंधन पडा कबसे पडा?? अनादि कालसे अनंत जनमो इसीमें फसा बंधन खोलने कीं हुई इच्छा जन्म मरणसे छूटने कीं कामना जिसने मुझे मुमुक्षु बनाया साधक बनकर ब्रह्म जिज्ञासा खुदको खोजने जो निकला गुरुक्षेत्र कीं हुई कृपा गुरु और मार्ग मिला गुरुदेव ने आखे खोली ज्ञान कीं दृष्टी दे डाली....!! जानने कीं थी जिज्ञासा जो भी जाना सारा माया माया मिथ्या मात्र प्रतिती बुद्धी कीं परत चंचल वृत्ती हर पल कुछ जानना चाहती जानेबिना जिसे स्वस्थता नहीं ब्रह्म पर दृष्टी जाती नहीं सबकुछ दिखता पर होता नही जो भी जाना बुद्धी का भ्रम जानकर भ्रम मिथ्या शून्य अब बुद्धी शांत अपनी जगह काटा हि काटे को काटे जहर काटे जहर को मिथ्या कीं मिथ्या जानकर बुद्धी शांतीसे लौटी अपने घर जिसे ढुंडा गली गली वह आधार चेतना मिली वह खुद स्वयंमें मिली स्वयं कीं हि खोज थी संसारमें हो रही थी संसार कीं मिथ्या जान ली सारा अधिष्ठान मै अहं स्वयं जिसके कारण संसार भ्रम....!!! जो दिखे सारी मिथ्या प्रतिती मेरे होनेसे हो रही सब का आधार मै स्वयं सारा प्रतिबिंब आभास भ्रम जगत अज्ञान का परिणाम अज्ञानसे घिरा मै ब्रह्म मै बिंब अज्ञानी ब्रह्म फसा पडा था मोहवश मोह विकार किचड माया जिसमें मेरा ज्ञान कमल खिला मै सबका साक्षी द्रष्टा जिसके सामने आभास दिखता दिखता मात्र होता नहीं द्वैत भेद होता नहीं संसार स्वप्न जीवन भ्रम जिसको देखता मै असंग मै कुटस्थ साक्षी द्रष्टा जिससे संसार का होनापना मै हि सब में छाया छाया मेरी जो सारी माया माया प्रतिती और सत्य सिक्के के दो पहलू दोनो हि मुझ में साथ साथ दो दिखते अद्वैत पृष्ठभूमी एक आभास एक साक्षी मै अधिष्ठान ब्रह्म असंग मै हि मै सबऔर मै हि मै चारोऔर मै शुद्ध नित्य सत्य मै ज्ञान अनंत ब्रह्म...!!! सत्यम् ज्ञानम् अनंतम् ब्रह्म...!!!