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मैं अनुभव --- मैं ब्रह्म परिपूर्ण
निशिगंधा क्षीरसागर
मेरा जीवन और मैं.... सारा बना अनुभव अनुभव हि जीवन.... जीवन एक अनुभव सुखं दुःख आनेजाने....जीवन का एक बहाव कर्म बीज अंकुरित हुवा.... खेल है कारण प्रभाव स्मृती के विस्मरण में.... अर्थहीन सा जीवन प्रभाव अज्ञान के कारण... अंधियारी धुंदली हवा नीरस था अंधियारा... सुरस प्रकाशमय हुवा अनुभव के रज्जू पे... जीवनसर्प का बनाव अनुभव केवल भ्रम....मैं नहीं अनुभव अज्ञान में फसा जीव.... जीवन नाट्य का बनाव मोह ममता माया का... गहरा प्रखर खिचाव गहरि नींद में... ठोकर चोट करे प्रभाव दुःख दर्द परेशानी... कृपावश आते बवाल अज्ञान किचड सें.....उठ खुद को संभाल कृपावश कोई जागृत... कोsहं करे सवाल स्मृती संस्कार चित्त मेंरा... विस्मृती का नाट्य जीवन सारा मिथ्या... अर्थहीन जैसा स्वप्न अज्ञानवश हुवी भूल.... संसार सें लागी लगन ज्ञानखडग के प्रहार सें.... आहत मिथ्या जीवन अज्ञान को त्याग.... स्वीकार ज्ञान का संसार को त्याग... परम तत्व का शान्ति आनंद समाधी का .... ज्ञानी करे चुनाव मधुर गोधन दुग्धपान.... गुरुमुख गोंवाणी गुरूंक्षेत्र गोकर्ण श्रवणरूपी अमृत का पान... श्रवण महिमा दो कर्ण मंथन मन में....मनन विधी सें रुचिपूर्ण ज्ञानदोहन नेती विधी सें, .... हटा दूर अज्ञान नित्य ज्ञान अध्यसन सें ... अब चला निदिध्यासन कौन श्रेष्ठ कौन कनिष्ठ.... अब कैसी उच्चनीच दृश्य द्रष्टा और दर्शन.... रही न सीमा बीच स्वाहाकार अहं का घटा .....शंखनाद माँगल्यता पूर्ण माया अज्ञान द्वैत हुवे ... अब सारे चूर्ण चूर्ण मिट गये सारे भेद..... धर्म न जाती वर्ण सारे रूप अब है मेरे... सब मुझी में पूर्ण सर्वत्र सदा होकर भी... कही नहीं मैं संपूर्ण जन्ममरण सुखंदुःख सारी.....सुलझी गुत्थी परिपूर्ण अनुभव मिथ्या संभावना.....स्वप्नदृश्य केवल प्रतितीपूर्ण अनुभव मिथ्या, मैं साक्षी.... मैं शून्य सम्पूर्ण इतिश्री अज्ञानी जीवन कीं .... मिट गया कष्टपूर्ण कामना इच्छा वासना सें....अब मैं नहीं अपूर्ण अपूर्ण नहीं मैं.. मुझ में हि मैं नित्य परीपूर्ण अर्थहीन जीवन को.... बनाये ज्ञान अर्थपूर्ण सहजभाव सें साक्षी बन... मैं हि मैं सम्पूर्ण सहजभाव सें सहज समाधी.... में ब्रह्म परीपूर्ण
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