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ईश्वर हि ईश्वर -- यत्र तत्र सर्वत्र
निशिगंधा क्षीरसागर
ईश्वर हि ईश्वर है सर्वत्र ईश्वर का वास चर अचर सर्वत्र ईश्वर मानो या ना मानो हर मान्यता में वह बसें पुजो उसे या ना भजो हर प्रार्थना में वह गूंजे श्रद्धा अश्रद्धा भक्त अभक्त में सब में वही हर पल सजे ईश्वर का वास कणकण में द्रष्टा होकर सदा सब देखें देखने उसको सारे भक्त तरसे उस को पाने की अमित आस प्रेम से प्रेम की बुझाने प्यास भक्त का वह श्वास बने उस का होकर भी मात्र आभास अभक्त को होवे केवल भ्रम भास अहंकार अश्रद्धा का मिथ्या वास जीव में है विकार वासना उस में कोई विकार नहीं अज्ञानी हो -- या हो ज्ञानी ज्ञान अज्ञान उसे के अंदर निर्गुण होकर गुणो का प्रकाश गुणो का अपार सागर दुर्गुण सद्गुण उसके अंदर ईशत्व तत्व अस्तित्व सान्त अनादी अनंत जराजन्म विहीन अंत चेतन का होकर जड सें मिलन मुश्किल हुवा अब अनन्य शोधन भ्रम को हटाकर ज्ञान से जानो मानो उस को या ना मानो फर्क उसे कोई पड़ता नही खबर रखता वह सब की लेकिन पाप पुण्य उसमें नहीं सब में होकर भी वह कहीं नहीं ईश्वर नामक तत्व ईशन् यही सुख दुःख की उसे खबर नहीं परदा रूपी द्रष्टा लेकिन चक्षु नहीं आते जाते नित्य अनुभव देखें नित्य सदा सें सर्वत्र वही पाच महाभूत उस सें बने सब में होकर भी वह दिखता नहीं वह किसी एक में नहीं आना जाना उस में नहीं सब को देखता रहता यहीं सदा सर्वत्र सब में वही ईश्वर हि ईश्वर बोलो बोलो कहा नही ? हर तुम्हारे करम में वहीं... सीमा पर लडते जवान में.... कभी खेती करते किसान में... सेवा करते नौकर नर्स वैद्य में... कभी सिखाते हुवे पाठशाला में... सदा खाना पकाती अन्नपूर्णा में.... सभी कर्म उस में हि घटते हर कर्म और कर्ता में रहता वही कर्म कर्ता क्रियापद उसी से फिर भी अलिप्त सब सें होकर वही सदा बनकर अकर्ता अभोक्ता अविनाशी हमेशा भूत भविष्य वतमान सदासर्वकाली लेकिन कोई कर्म वह करता नहीं सब में होकर भी कही नहीं गुणो में होकर भी निर्गुण सही तुझंमें मुझमें सब में वही सब में होकर भी कही नहीं बोलो बोलो वह कहा नहीं ?? कर्म स्थान काल से परे सारे आकारो में होकर निराकार सभी रुपो में अरूप बनें साक्षी बनकर अस्तित्व का तत्व उस का अव्यक्त अदृश्य सत्त्यत्व सत्य असत्य सब में होकर भी कही नहीं बोलो बोलो उस कीं सत्ता कहा नहीं ?? जानो उस को या ना जानो हर मान्यता में उस का हि होना नित्य होकर भी उसका न होना केवल छाया उसकी दिखे काया अद्भुत है न ईश्वर की माया !! जड देह में मिलाफ चेतन मन का आत्मन् बनकर सब में छिप गया यहाँ वहा ढुंढकर मनुष्य फसता वही सब में रचा बसा ईश्वर मानो या ना मानो मुझ में तुझं में यहाँ वहा अंदर बाहर रात और दिन सब में होकर भी वह ना दिखा प्रकाशक केवल सारे दृष्यो का प्रकाशित कर वह अव्यक्त सदा लगता ज्ञान से जानें उसको मनुष्य के बस कीं नहीं बात जहाँ जाओ वही मिलता मिलकर भी स्थान सें परे दिखता ज्ञान सें अज्ञान को दे सदमा ज्ञान अज्ञान उस में हि बसता ज्ञान की नहीं कोई सीमा जितना जाना कम हि पाया अद्भुत है ईश्वर की माया माया हि केवल है ज्ञेयता माया सें परे वह अज्ञेयता द्रष्टा ईश्वर आत्मा परमात्मा अनेक नामो में वही एकता अद्भुत है ईश्वर की माया माया है केवल दृष्य ज्ञेयता माया सें परे वह अज्ञेयता माया सें परे वह अज्ञेयता ईश्वर मानो या ना मानो हर मान्यता में वही बसता सर्वत्र सदा है ईश्वर कीं सत्ता .... @..... ..... @..... गुरूंक्षेत्र को समर्पित
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