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एक अभिव्यक्ति
शालिनी पंडित
*गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुः गुरुर्देवो महेश्वरः। गुरुः साक्षात् परं ब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः॥* "मैं", अनुभवकर्ता, एक अज्ञेयता, शून्यता और अनंतता तक इस शून्यता का विस्तार। इस शून्यता में दिखती और परिवर्तित होती आभासित आकर्तियाँ, जो समय में जीवित होने का भ्रम देती हैं। यह अनंत आभासित आकृतियां अज्ञात से आती ही है और अज्ञात में ही खो जाती हैं, लेकिन, "मैं" निरंतर बना रहता हूँ। कभी यह सभी आभासित आकर्तियां विचारों के रूप में गति करती दिखती हैं और कभी विभिन्न वस्तुओं और प्राणियों के रूप में । "मैं" ही इन विचारों के रूप, वस्तुओं के रूप में या विभिन्न प्राणियों के रूप में इन आकर्तियों को निर्मित भी करता हूँ। यह विचार भी इन आकर्तियों की तरह विलुप्त ही हो जाते हैं और शून्यता ही शाश्वत है यह कहने वाला और जानने वाला "मैं" ही नित्य रहता हूँ । अंतत बस "मैं" ही हूँ - व्यक्त - अव्यक्त, प्रकट -अप्रकट , अनुभव - अनुभवकर्ता !!
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