Wise Words
ध्यान
पुनीत
Like This Article
## ध्यान गुरु गोविंद दोऊ खड़े, काके लागूं पाय। बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय।। _____________________________________________________________ साधकों के गुणों में अत्यधिक महत्वपूर्ण गुण है ध्यान। अब यहाँ पर ध्यान को मैं 3 तरह से परिभाषित करूँगा। 1. ध्यान : अर्थात् एकाग्रता। यह किसी विद्यार्थी कि लिए भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। जैसे की माता-पिता बोलते है **ध्यान** लगा कर पढ़ो, **ध्यान** से काम करो। यहाँ पर ध्यान को अनेक विषयों से भटकने से बचाने कि लिए कहा जा रहा है। यह साधारणतया गृहस्थ जीवन में प्रत्येक व्यक्ति प्रयोग करता है। 2. ध्यान : यह अष्टांग योग (यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, **ध्यान,** समाधि) का 1 अंग है। यहाँ पर चित्त में होने वाले सारे अनुभवों को हटा कर, मात्र एक विषय पर ध्यान लगाया जाता है। ध्यान चेतन मन की एक प्रक्रिया है, जिसमें व्यक्ति अपनी चेतना बाह्य जगत् के किसी चुने हुए दायरे अथवा स्थल एवं स्थान विशेष पर केंद्रित करता है। बहुत से आध्यात्मिक मार्गों में साँसो में ध्यान देने को कहा जाता है जैसे आनापानसती आदि । 3. तंत्र मार्ग में भी ध्यान की व्याख्या है, जिसमे साधक ध्यान को चित्त के विभिन्न अवस्थाओं में ले जाता है। कुंडलिनी मार्ग में चक्रों में ध्यान कराया जाता है। विज्ञान भैरव तंत्र की बहुत सी विधियाँ भी इसी पर आधारित है। बहुत से साधक अपना ध्यान सुषुप्ति में ले जाते है और वही पर रहते है जहाँ उन्हें परम आनंद की प्राप्ति होती है। <br><br><div class='ui image'><img width='800px' src='images/89851368-Trance.webp'></div><br><br> चूँकि हम ज्ञान मार्ग के साधक है, तो हमें योग मार्ग का ध्यान का प्रयोग करना चाइए जो साधक के साक्षी भाव को और भी प्रगाण और अखंड बनाने में सहायक होता है। यदि साधक का ध्यान शक्तिशाली है तो वो गुरु के निर्देशों को अच्छे से अनुसरण करके उसकी प्रगति बहुत तेज़ी से होती है। इस लेख को इतने **ध्यान** से पढ़ने के लिए धन्यवाद