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समावेश का मार्ग नेति नेति से अधिक पूर्ण क्यों प्रतीत होता है
कणिका
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<br><br><div class='ui image'><img width='1200px' src='images/71179157-ChatGPT Image May 10, 2026, 03_55_05 PM.png'></div><br><br> # समावेश का मार्ग नेति नेति से अधिक पूर्ण क्यों प्रतीत होता है अद्वैत वेदांत में नेति नेति का मार्ग अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। यह साधक को शरीर, मन, विचार, भावनाओं और संसार से तादात्म्य हटाने में सहायता करता है। साधक कहता है: > मैं यह नहीं हूँ। > मैं यह भी नहीं हूँ। इस प्रक्रिया से धीरे-धीरे अनुभवकर्ता और अनुभव में भेद स्पष्ट होने लगता है। यह एक महान आध्यात्मिक कदम है। किन्तु प्रश्न यह है: > क्या यात्रा यहीं समाप्त हो जाती है? --- # नेति नेति की सीमा नेति नेति का मार्ग साधक को वस्तुओं से अलग करता है, किन्तु कभी-कभी यह सूक्ष्म अलगाव उत्पन्न कर सकता है। साधक अनुभव करने लगता है: * मैं अलग हूँ * संसार अलग है * मैं साक्षी हूँ * बाकी सब दृश्य है यह अवस्था शांति दे सकती है, किन्तु इसमें सूक्ष्म द्वैत शेष रह सकता है। --- # समावेश की गहन दृष्टि समावेश का मार्ग कहता है: > संसार अनुभवकर्ता से बाहर नहीं है। विचार, भावनाएँ, शरीर, प्रकृति, संबंध, यहाँ तक कि अहंकार भी सब अनुभवकर्ता में ही प्रकट हो रहे हैं। फिर अगला बोध उत्पन्न होता है: > जो अनुभवकर्ता में प्रकट हो रहा है, > वह उससे अलग कैसे हो सकता है? जैसे: * लहर समुद्र से अलग नहीं * चलचित्र पर्दे से अलग नहीं * स्वप्न मन से अलग नहीं वैसे ही अनुभव अनुभवकर्ता से अलग नहीं हैं। --- # समावेश अधिक पूर्ण क्यों प्रतीत होता है ## १. यह जीवन का विरोध नहीं करता समावेश संसार से भागता नहीं। यह कहता है: > सब उसी एक सत्ता की अभिव्यक्ति है। --- ## २. इसमें विभाजन कम है नेति नेति कभी-कभी: * साक्षी बनाम संसार * आत्मा बनाम शरीर जैसा सूक्ष्म विभाजन बना सकता है। समावेश उस विभाजन को भी विलीन कर देता है। --- ## ३. यह करुणा और प्रेम को स्वाभाविक बनाता है यदि सब उसी अनुभवकर्ता का रूप हैं, तो दूसरों से अलगाव कम हो जाता है। करुणा प्रयास नहीं रहती, स्वाभाविक हो जाती है। --- ## ४. यह अनुभवों से संघर्ष नहीं करता क्रोध आए, भय आए, दुःख आए समावेश कहता है: > यह भी उसी अनुभवकर्ता में उठती हुई तरंग है। इसलिए दमन की आवश्यकता नहीं रहती। --- # क्या नेति नेति गलत है? नहीं। नेति नेति अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह झूठी पहचान को तोड़ता है। किन्तु समावेश उस प्रक्रिया को पूर्ण करता है। पहले: > मैं यह नहीं हूँ। फिर: > सब कुछ मुझमें प्रकट हो रहा है। और अंततः: > जो कुछ है, वही मैं हूँ। --- # अंतिम बोध शायद अंतिम अद्वैत केवल नेति नेति में नहीं, पूर्ण समावेश में प्रकट होता है। जहाँ: * अनुभवकर्ता और अनुभव अलग नहीं रहते * संसार बाहर नहीं रहता * जीवन विरोधी नहीं रहता और केवल एक अखंड उपस्थिति शेष रहती है, जिसमें सब कुछ उत्पन्न होकर विलीन हो रहा है।