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ज्ञानतरंग: "अनुभव-माया-नाद"- भाग २
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प्रश्तुत लेख सद्गुरूदेव श्री तरुण प्रधान जी द्वारा विभिन्न सत्संग, प्रवचन और लेखों में "अनुभव-माया-नाद" के विषय में व्यक्त कुछ मुख्य बिंदुओं का दूसरा भाग है। पहले भाग में बूँदा नं १ से ४० तक है और यह भाग बूँदा नं ४१ से आगे है। यह लेख श्रृखला के रुपमें इससे आगे भी क्रमश: प्रकाशित होता रहेगा। <br><br><div class='ui image'><img width='1200px' src='images/89426796-uni.jpg'></div><br><br> **ज्ञानतरंग: "अनुभव-माया-नाद"** ४१। अनुभव मूलभूत है; अस्तित्व का प्रकट रुप है। ४२। जो प्रकट होता है वह पूरी तरह से मिथ्या है। ४३। अनुभव स्वयं सिद्ध है; "अनुभव नहीं है" यही वाक्य अनुभव होने का प्रमाण है; अनुभव न होने की कल्पना तो कर सकते हैं लेकिन वह कल्पना भी तो अनुभव ही है। ४४। माया स्वयंभू है, स्वरचित है। ४५। सभी अनुभव परिवर्तनशील भ्रम हैं, स्वप्न के तरह है; इसलिए माया है। ४६। हमेशा होने से मिथ्या सत्य नहीं हो सकता, मिथ्या ही हमेशा है, परिवर्तन भी निरन्तर है। ४७। मिथ्या मिथ्या को ही प्रभावित करती है, सत्य को नहीं। ४८। जो था ही नहीं वह कहीं नहीं जाता। ४९। नाद का स्वभाव है कभी रुकता नहीं; परिवर्तन का स्वभाव है कभी ठहरता नहीं। ५०। नाद में जो चक्रीय परिवर्तन है वह समान है; लेकिन उससे जो रचना हुई है वह भिन्न है। ५१। मिथ्या का प्रमाण परिवर्तनशीलता है। ५२। जो परिवर्तनशील है, जो है नहीं लेकिन प्रतीत होता है वो मिथ्या है। ५३। परिवर्तन है इसलिए कुछ भी अनुभव एक जैसा मिलता नहीं; भिन्न ही होता है। ५४। माया अनंत हैं कुछ भी प्रकट हो जाएगा। ५५। सम्पूर्ण माया एक साथ प्रकट हो जाए तो वही विराट रूप है; लेकिन एक साथ देखना संभव नहीं है; थोड़ा-थोड़ा ही प्रकट होता है। ५६। संभावना ही नामरुप में प्रतीत होती है, माया द्वैत में है। ५७। माया वह नहीं जो दिखती है। ५८। माया में एक संभावना या शक्ति है कि कोई भी नामरुप ले सकती है और अस्तित्व प्रकट हो सकता है। ५९। शून्य और संभावना का अर्थ कुछ भी न होना नहीं है; कोई वास्तविकता न होना, पदार्थ न होना, सत्य न होना फिर भी प्रकट होना ही संभावना है। ६०। जब कोई चिज में कुछ भी बनने की संभावना रहती है तो वह वस्तु वही नहीं रहती कुछ भी हो सकती है। ६१। अस्तित्व में जो संभावना है वही जब व्यक्त होती है तब प्रकृति कहलाती है। ६२। अस्तित्व शून्य है, अनंत संभावना है यह इसलिए कहा जाता है कि कुछ प्रकट है; यही प्रकट अस्तित्व के कारण मान जाता है कि संभावना है; तभी तो कुछ प्रकट हो रहा है। ६३। अपरोक्ष अनुभव से अनुभव बनने की प्रक्रिया नहीं मिलती; यही पता चलता है कि परिवर्तन, स्मृति आदि भी मिथ्या है। ६४। जब तक नाद संयोजन नहीं होता और परतीय रचनाओं में नहीं बदलता तब तक चित्त या स्मृति नहीं कहलाता। ६५। अनंत में से कुछ ही सीमित होता है और स्मृति में छप जाता है, तभी अनुभव होता है। ६६। यदि माया चाहे तो अपने आपको पूरी तरह से छुपा सकती है। ६७। आवरण और विक्षेप ही माया का कार्य है। ६८। सबकुछ अनित्य है लेकिन सभी वृत्त में चलता है, दोहराता रहता है। ६९। जो आता-जाता है वह सत्य कैसे हो सकता है? आने-जाने अनेक रुपों में कौन सा रुप सत्य होगा? ७०। निराकार को जानने के लिए साकार का साहारा लेना पड़ेगा। ७१। मिथ्या का अर्थ यह नहीं है कि कुछ भी नहीं है, मिथ्या का अर्थ यह है कि जैसा दिख रहा है वैसा नहीं है, उसका असली रूप नहीं है। ७२। सभी अनुभव एक ही पर्दे पर प्रकट चित्र हैं; विविधता का भ्रम अज्ञान के कारण है। ७३। जो निर्माण है वही निर्माता है, जो रचना है वही रचयिता भी है। ७४। जो सत्य नहीं है, तत्व नहीं है वह सब माया है। ७५। हर नादरचना का मूल नाद है। ७६। नाद का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं है। ७७। नाद में स्थायित्व की क्या प्रक्रिया चल रही है उसके अनुसार उस नादरचना का सृजन और विलय होगा। ७८। लय-प्रलय नाद का परिणाम है, यह सभी अनुभवकर्ता के पृष्ठभूमि में होता है। ७९। केवल अनुभव होने के कारण से ही सृजन और विलय नहीं होगा। ८०। अनियमित अनुभव या घटना पर कोई ध्यान नहीं देता; इसलिए वह असत्य लगता है। ८१। नाद का अर्थ ही गति है, पदार्थ को गति देने के लिए ऊर्जा की जरुरत नहीं; पदार्थ जड़ है। ८२। नाद दोहरी मिथ्या है, क्योंकि वह प्रकट भी नहीं होता; फिर भी सभी अनुभव नाद आधारित है। ८३। जो प्रतीत भी नहीं होती और जो माया के ऊपर आरोपित है उसी को दोहरी माया कहते हैं। ८४। अनुभवकर्ता के बिना कोई नादका अनुभव नहीं होता; इसिलिए अनुभव असत्य है। ८५। नाद वृत्त में ही चलता है। ८६। जो चीज़ प्रत्यक्ष और ठोस नहीं होता उसका प्रमाण उसका प्रभाव होता है; जैसे अनुभव ही नाद का प्रमाण है। ८७। सभी अनुभव एक साथ प्रकट होना शून्यता की तरह दिखेगा। ८८। जो शुरु ही नहीं हुआ वह बंद भी नहीं हो सकता। ८९। जो खाली है उसी में कुछ भरा जा सकता है। ९०। सारे अनुभव स्वप्न के तरह है, स्वप्न तो कुछ भी हो सकता है; प्रमाण स्वयं लेना चाहिए। ९१। जो है ही नहीं उसको जाना भी नहीं जा सकता। ९२। जहाँ प्रमाण ही मिथ्या है वह ज्ञान भी सत्य नहीं हो सकता। ९३। अस्तित्व को अनंत अनुभव ही हो रहा है; परंतु अनंत ज्ञान नहीं हो रहा। ९४। अनुभव होने और ज्ञान होने में बहुत भिन्नता है। ९५। अस्तित्व शून्य है और अस्तित्व में उठनेवाले हर अनुभव भी शून्य है; क्योंकि इसका धरातल शून्य है। ९६। शून्यता का अर्थ कुछ भी न होना नहीं है, शून्यता में ही कुछ भी प्रकट हो सकता है। ९७। अस्तित्व निष्कृय शून्य नहीं है; गतिशील है। ९८। अनुभव कोई भौतिक घटना नहीं है। ९९। विभाजन करके ही ज्ञान होता है; इसलिए अद्वैत को द्वैत में विभाजन करना पड़ता है। १००। आत्मज्ञान अनुभव का त्याग नहीं है; आत्मज्ञान में तत्व को जानने के लिए अनुभव को हटाया जा रहा है। १०१। माया में जो हो रहा है वह न प्रगति है, न पतन है, केवल माया का खेल है। १०२ अनुभव असिमित है, सीमा उपकरण की है, माया की नहीं; क्योंकि मनोशरीर यंत्र सीमित है; इसलिए उसको सीमित अनुभव होता है। १०३ अनुभवकर्ता को सीमित हुए बिना ही एक साथ अनुभव हो रहा है। १०४। माया में कुछ भी नया नहीं है, थोड़ी-थोड़ी भिन्नता लिए वही-वही प्रकट होता रहता है; जिसने भूलचुका है उसके लिए नया लगता है। १०५। कोई भी अनुभव साधारण या विशेष नहीं है, सभी अनुभव मूलभूत हैं और एक ही तरह के हैं; साधारण या विशेष अनुभव व्यक्ति का चित्त निर्मित धारणा है। १०६। जीव स्वयं एक अनुभव है। १०७। जीव को अनुभव का ज्ञान सीमित करने के बाद ही होगा। १०८। अनुभव होना और अनुभव का ज्ञान होना अलग बात है। १०९। विश्वचित्त में हर अनुभव की संभावना पहले से ही है। ११०। दृष्टि-सृष्टि का अर्थ होता है कि जो भी अनुभव हो रहा है, उसका वहीं के वहीं उसको गढ़ा गया है। १११। दृष्टि-सृष्टि का अर्थ दृष्टि पड़ते ही कोई सृष्टि होना नहीं है; जो प्रतीत होता है, जो छाया है, मिथ्या प्रक्षेपण है, उसकी रचना हुई है, वस्तु की नहीं; वस्तु छाया मात्र है। ११२। दृष्टि-सृष्टि के नियम कहता है कि जो वस्तुएँ हैं वह नाद से तब गढ़ी जाती है जब उनका अनुभव होता है। ११३। दृष्टि-सृष्टि का उपयोग अपने इच्छा से स्वप्न या सूक्ष्म लोक में रचना करने में है; जो भी इच्छा है वह प्रकट होती है। ११४। जब तक अनुभवकर्ता के सामने नहीं आता तब तक कुछ अनुभव नहीं है। ११५। तत्व एक ही है और वही एक तत्व में अनेक नामरूप प्रकट हो सकते हैं। ११६। अनुभव असीमित ही है; स्मृति में संग्रहित होकर सीमित ज्ञान होता है। ११७। सत्य सामने है, उसमें मिथ्या का पर्दा पड़ा है, ज्ञान सामने हैं, उसमें मान्यता का पर्दा पड़ा है। ११८। माया में हर घटना चमत्कार है, माया ही सबसे बड़ा चमत्कार है। ११९। माया का ज्ञान संभव नहीं है, क्योंकि वहाँ जानने के लिए कुछ नहीं है। १२०।जब माया में कुछ अनुभव और कुछ नियम दिखाई पड़ते हैं तब यह लगता है कि चित्त का विकासक्रम हो रहा है। १२१। स्वयं संगठन से रचना इतनी जटिल हो जाती कि वह जीव का रूप धारण कर लेती और फिर विलय शुरू हो जाता है। १२२। विश्व चित्त की जो ऊर्जा है वही सृष्टि बनाए रखने की ऊर्जा है। १२३। अनुभव तो अस्तित्व का प्रकट भाग है, मौलिक ही है, इसमें ज्ञान और अज्ञान का ठप्पा बाद में लगा दिया जाता है। १२४। अस्तित्व में कुछ भी अच्छा बुरा नहीं है, जिसने असत्य को सत्य मान कर अच्छा बुरा मान लिया वह उसका अज्ञान है। १२५। मिथ्या मिथ्या को ही प्रभावित करती है सत्य को नहीं। १२६। मिट्टी से जब तक मूर्ति नहीं बनती तब तक वह मिट्टी ही है। १२७। पिनहोल क्यामेरा के तरह इंद्रियाँ अनुभव को सीमित करें तो ही दृश्य दिखता है। १२८। अनुभव जीतना सीमित होता है उतना ही ठोस और सत्य लगने लगेगा। १२९। एक साथ सभी अनुभव आने लगे तो कुछ भी ज्ञान नहीं होगा। १३०। वस्तुओं का अनुभव ही वस्तु है। १३१। वस्तुओं के अनुभव तंमात्राओं का अनुभव है, रंग रूप आकार ध्वनि स्पर्श आदि जो इंद्रियों से मिला है उसी को अनुभव कहेंगे। १३२। सभी अनुभव मूलरूप से एक है, मानसिक घटनाएँ हैं, सब कुछ चित्त है। १३३। जगत, शरीर, मन, चित्त निर्मित अनुभव हैं; तंमात्रएं हैं। १३४। अनुभव ही माया है; जो भी प्रकट है वह माया है। १३५। अनंत सपना है और स्वप्न द्रष्टा है। १३६। माया के सहायता के बिना माया को नहीं जाना जा सकता। १३७। जो काल्पनिक है वह किसी का कारण या प्रभाव नहीं हो सकता। १३८। कुछ भी होता रहे, कोई भी नामरुप हो पहले से शून्य है। १३९। माया अकारण है; कारण-प्रभाव मनुष्य के सीमित बुद्धि के कारण प्रतीत होते हैं, १४०। स्मृति काल्पनिक है, क्योंकि उसका आधार नाद ही परिकल्पना है। क्रमश: