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गुरुतत्त्व: मौन, शांति और आनंद
सुविद्या
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हे गुरुदेव, हे गुरुक्षेत्र, हे गुरुतत्त्व! कोटि-कोटि नमन , कोटि-कोटि वंदन । अश्रु बनकर बहता प्रेम, मौन होकर झुकता मन। हे गुरुदेव! मैं रोती हूँ, मैं संकल्पित होती हूँ, मैं स्वयं में ही विलीन होती हूँ। आपसे प्रेम है असीम, आपकी कृपा अनंत। आपने ही तो दिखाया मुझे, मेरा वास्तविक स्वरूप, मेरा सत्य, मेरा अस्तित्व। अंतरतम से उठती यह कृतज्ञता, शब्दों में कैसे समाए? अभिव्यक्ति भी छोटी पड़ जाए, मौन भी इसे कह न पाए। आपने जो किया मेरे लिए, आपने जो सत्य मुझे दिखाया, वह न कर्ता के बंधन में बँधा, न दृश्य बना, न दृष्टि में आया। आज जान पाई हूँ, हे गुरुदेव, क्या है गुरु, क्या है गुरु-प्रेम, क्या है वह पावन गुरुतत्त्व, जो मिटा दे भेद के सारे भ्रम। मैं नमन करूँ, बारंबार करूँ, हर श्वास में प्रणाम करूँ। प्रेम मेरा असीम, असीमित, कैसे इसे किसी सीमा में बाँधूँ? हृदय आनंद से भर जाता है, अश्रुधारा अनायास बह जाती है। यह कैसा निष्काम, निस्वार्थ प्रेम, जिसमें स्वयं की सुध भी खो जाती है? आज जान पाई हूँ-- जिस प्रेम को खोज रही थी, जिस सत्य को देख रही थी, वह मुझसे अलग कहाँ था? वह प्रेम भी मैं, वह मौन भी मैं, वह अस्तित्व भी मैं। न कोई दूरी, न कोई भेद, न पाने की चाह, न खोने का खेद। केवल होना, केवल मौन, केवल अस्तित्व का सहज बोध। हे गुरुदेव! कोटि-कोटि नमन, गुरुक्षेत्र को कोटि-कोटि वंदन, गुरुतत्त्व को अनंत प्रणाम। शांति शांति शांति