ज्ञानाक्षर
संयम
शैल
लेख पसंद करें
मनुष्य को मनस से नियंत्रित प्राणी कहा गया है, अर्थात जो भौतिक रचना मन से नियंत्रित होती हो। सामान्यतया मनुष्य चित्तवृत्तियों के अधीन स्वनियंत्रित होता है, जिसके प्रति वह जागरूक भी नहीं रहता। चित्त में छपी स्मृतियों से निर्मित संस्कारों के अनुरूप ही उसका व्यवहार होता है। अध्यात्म में चित्त वृत्तियों पर नियंत्रण के पतंजलि योग सूत्र में आठ सूत्र दिए गए हैं, जिनमे प्रथम स्थान पर यम तत्पश्चात नियम आते हैं। यम निवृत्ति की ओर ले जाने के उपाय हैं, जो निषेधात्मक हैं और इनकी संख्या पांच बताई गई है। नियम की प्रकृति वृत्तियों से विमुख कर उन्हें सकारात्मक दिशा प्रदान करना है, जो निवृत्ति की ओर ले जाने में सहायक होती है। मुख्य रूप से शुद्धि, जिसे शौच अथवा शुचिता भी कहा गया है, और समर्पण शामिल है। संयम दो शब्दों के खंड से निर्मित है, सम एवम यम अर्थात निषेध में अनासक्त रूप से सम रहकर प्राप्त किया जा सकता है। अन्यथा जिस वृत्ति के निषेध के लिए नियम पालन किए जाने हैं, उसके विपरीत वृत्ति के प्रति आसक्ति हो जायेगी, और उद्देश्य नहीं पूर्ण हो पाएगा। इसलिए संयम पूर्वक ही यम और नियम के पालन किए जा सकते हैं। समर्पण और शुद्धि से सभी निषेधों को साधा जा सकता है, जो संयम अथवा धैर्य से ही आएगा। अतः इनके मूल में संयम ही प्रमुख है, जिससे स्वभाव के विपरीत अज्ञान रूपी संस्कारों से निवृत्ति पाई जा सकती है। धीरे धीरे रे मना धीरे सब कुछ होय माली सींचे सौ घड़ा ऋतु आए फल होय।। जब उस निर्मल ज्योति की एक झलक मिल गई हो तो कब मेरे दीपक में वो प्रकाश उतरेगा, इसकी चिंता छोड़कर प्रतिपल अपनी तैयारी में शिष्य लग जाता है। ज्योति जब आनी हो आयेगी, न आनी हो न आए। शबरी की भांति प्रति दिन पंथ बुहारना और फूल सजाकर रखना उसके संयम का ही परिचायक है। शिला रूप में अहिल्या का संयम और राम के प्रति समर्पण ही उसकी मुक्ति का मार्ग बन गया।