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ज्ञानतरंग: "गुरु-शिष्य"
जानकी
<br><br><div class='ui image'><img width='1200px' src='images/89426796-IMG_0118.png'></div><br><br> ज्ञानतरंग के इस भाग में सद्गुरूदेव श्री तरुण प्रधान जी द्वारा विभिन्न सत्संग, प्रवचन और लेखों में "गुरु-शिष्य" के विषय पर व्यक्त कुछ ज्ञानतरंगों को प्रश्तुत किया गया है। यह श्रृखला के रुपमें इससे आगे भी क्रमश: प्रकाशित होता रहेगा। **गुरु-शिष्य** १। गुरु वही है जो शिष्य के भीतर छिपे दिव्यता को पहचान कर उसे प्रकट करे। २। माता-पिता शरीर को जन्म देते हैं और गुरु आत्मन को जन्म देता है। ३। जीव के कल्याण के लिए मौन ही मौन तोड़ता है और गुरु रुपमें प्रकट होता है; नहीं तो जीव मौन तक नहीं पहुँच पाएगा। ४। सारा संघर्ष गुरु तक पहुँचने का है; उसके बाद सभी संघर्ष समाप्त होते हैं। ५। जो आत्मज्ञान देता है वही सत्गुरु है, वही अंतिम गुरु है। ६। आत्मज्ञान के बाद गुरु-शिष्य में भेद नहीं रहेगा; एक हो जाएँगें। ७। गुरु और शास्त्र/शब्द ज्ञान के तरफ़ संकेत करते हैं, मार्ग दिखाते हैं; उस मार्ग पर चलना साधक स्वयं को है। ८। ज्ञानी/दार्शनिक अपना शब्द ख़ुद चुनता है, अपना शब्दकोश ख़ुद बनाता है। ९। ज्ञानी किताब पढ़ता नहीं, किताब लिखता है। १०। जिसका शब्द है वही उसको परिभाषित कर पाएगा। ११। सभी मार्गों में गुरु का महत्व है; क्योंकि गोविंद तक गुरु ही पहुँचा सकता है। १२। जब गुरु के सामने समर्पण शुरु होता है तब प्रगति शुरु होती है। १३। पूज्य वो होता है जिसके जैसा हम बनना चाहते हैं। १४। जो भी मुझे कुछ सिखा दे वह मेरा गुरु है। १५। जिसने आखरी जड़ तक जा कर अनुसंधान किया वही कह सकता है कि- सब अज्ञेय है। १६। ज्ञानी को शब्द समझ में आता है, दूसरों के दिल के बात नहीं; इसलिए सही शब्द चयन आवश्यक है। १७। जिस स्तर की समस्या है उस स्तर पर नहीं सुलझती, उसका समाधान के लिए एक स्तर ऊपर जाना पड़ता है; इसलिए गुरु आवश्यक है। १८। बंधन होने के लिए दोनों तरफ़ से इच्छा होनी चाहिए; गुरु के मन में न आसक्ति है, न बंधन है, केवल करुणा है। १९। प्रेम एक हो जाना है, एक में बंधन नहीं होता; गुरु बंधन तोड़ता है और स्वयं से मिलाता है। २०। जिसको ज्ञान हुआ है उसको गुरु ब्रम्ह दिखेगा; जो अज्ञानी है उसको गुरु व्यक्ति दिखेगा। २१। जिसको गुरु से प्रेम है उसको ज्ञान से भी प्रेम हो जाएगा। २२। गुरु जो बोलते हैं वो संकेत मात्र है; संकेत कहाँ से आ रहा है ये जानना असंभव है। २३। गुरु शिष्य के अज्ञान के अनुसार मिलता है, ज्ञान के अनुसार नहीं; जब ज्ञान बढ़ता जाएगा गुरु बदलता जाएगा। २४। गुरु शिष्य को ऊपर उठाने के लिए अज्ञान का नाश कर देता है, वासना पूर्ति नहीं कर देता; इसलिए लोग गुरु के पास जाने से डरते हैं। २५। जो फल पका है वही तोड़ने योग्य है, जो शिष्य तैयार है वही गुरु के झोली में गिरेगा। २६। ज्ञान देने के लिए गुरु शिष्य की स्तर तक आता है, शिष्य की मान्याता को ही उपाय बना लेता है; ये उसकी कला और करुणा है। २७। तांत्रिक दूसरों के द्वारा बनाए गए मुर्ति का पूजा नहीं करता, तांत्रिक अपनी शक्ति बढ़ाता है; दूसरी शक्ति के सामने सिर नहीं झुकाता। २८। यदि कोई गुरु किसी के बुलाने से स्वप्न में प्रकट हो सकता है तो वो बहुत बड़ा तांत्रिक होगा। २९। जो स्वयं का मूर्ति बनाकर पूजा कर सकता है वह तांत्रिक है। ३०। महापुरुष वो नहीं है जो चमत्कार करता है; महापुरुष वो है जो जानता है कि कोई चमत्कार नहीं है। ३१। गुरु गुरुदक्षिणा इसलिए लेता है क्योंकि वह आप को आसक्ति से मुक्त करना चाहता है; गुरु आप का सारे संघर्ष का बोझा उतार देता है। ३२। गुरु माँगता है ताकि आप छोड़ दें; गुरु छिनता है ताकि आप ऊपर उड़ पाओ। ३३। गुरु के सामने सबकुछ प्रकट करना चाहिए; जो छुपाता है उसकी प्रगति नहीं होती। ३४। गुरु को बड़ा समझकर डर जाते हैं; लेकिन जो सबसे बड़ा है वही सबसे सरल है। ३५। गुरुका कार्य जो भी गड़बड़ है, जो भी अशुद्धियाँ है वह दिखाना है। ३६। सबकुछ प्रकट करना ही शुद्धिकरण है; गुरु अंदर का मैल दिखा दिखाके प्रकट करवाता है; यही गुरु का प्रेम है। ३७। या तो कोई इच्छा मेरी नहीं है या सभी इच्छा मेरी ही है; इसलिए गुरु सभी के इच्छा पुरी करता है। ३८। शिष्य को समझाने के लिए गुरु हर युक्ति का प्रयोग करते हैं, इसलिए गुरु के हर बात को ज्ञान के स्तर और संदर्भों के अनुसार समझना चाहिए। ३९। शास्त्रों/पुस्तकों में ज्ञान नहीं सूचना होता है, शास्त्र अनुभव दिलाते नहीं; आप को मान्यताओं से भर देते हैं। ४०। ज्ञान शब्दों से परे है; शब्दों के परे जाना गुरु के माध्यम से ही संभव है। ४१। ज्ञानी ज्ञान के पिछे है; शास्त्र के पिछे नहीं। ४२। जो जानने योग्य है अनुभव से जाना जाएगा; शब्दों से नहीं। ४३। ज्ञान की इच्छा कृपा से जागृत होती है। ४४। सभी में ज्ञान का श्रोत एक ही है। ४५। ज्ञान शुद्ध, मुक्त और स्वछंद है; निशुल्क है, किसी की सम्पत्ति नहीं। ४६। यदि ज्ञान बीज उर्वर ज़मीन पर पड़ा है तो अंकुरित होकर रहेगा। ४७। सबसे बड़ा दान ज्ञानदान है। ४८। प्रश्न और अशांति अज्ञान के कारण आते हैं। ४९। ज्ञान ही वो धन है जो बाँटने से बढ़ता है। ५०। अज्ञानी के लिए शास्त्र बेकार हैं, वो कुछ नहीं जान पाता; ज्ञानी के लिए शास्त्र बेकार हैं, वो सबकुछ पहले ही जानता है। ५१। ज्ञान सदा से है, इसकी रक्षा भी नहीं करनी पड़ती, स्वयं रक्षित है; अज्ञान माया है, आता जाता है। ५२। ज्ञानपिपासु को ही ज्ञानामृत पिलायें, सबको नहीं, भैंस को घास खिलाते हैं, वेद/पुराण नहीं; जो मागता नहीं है उसको भिख नहीं देना है। ५३। ज्ञान तो हर लोक में है लेकिन ज्ञानार्जन के लिए सबसे अच्छा लोक मृत्यु लोक है, क्योंकि यहाँ जन्म और मृत्यु है; मृत्यु से डर है और जिज्ञासा है, गुरु और शास्त्र भी यहीं है। ५४। ज्ञान छोटा सा है, प्रश्न भी छोटे उत्तर भी छोटे ही होते हैं, वो भी ख़ाली करने के लिए; बाक़ी सब चित्त वृत्ति है। ५५। सच्ची शिक्षा बाह्य साधनों से भरा नहीं जा सकता, सच्ची शिक्षा तो वह है जो भीतर निहित अनंत ज्ञान भंडार को ऊपर ला सके। ५६। साधक जानना चाहता है; लेकिन ये नहीं जानता कि कैसे जानना है। ५७। गुरु मिलना आसान है लेकिन योग्य शिष्य मिलना कठिन है। ५८। ज्ञानमार्गी के लिए भीड़ भी एकान्त ही है। ५९। ज्ञान का प्रभाव साधक का स्वभाव पर निर्भर होता है। ६०। अहंकार से पतन होगा, समर्पण से प्रगति होगी। ६१। अज्ञानी जो सोचता है वो कहता है, ज्ञानी जो देखता है वो कहता है। ६२। किसी एक की प्रगति पूरी अस्तित्व की प्रगति है। ६३। एक गुरु में सभी गुरु होते हैं। ६४। असल संगत में अच्छे संस्कार अपने आप विकसित होता है। ६५। किसी एक व्यक्ति का ज्ञान दूसरा व्यक्ति सिद्ध नहीं कर सकता; जहाँ से सुना है उसका उत्तर वहीं खोजना चाहिए। ६६। साधक का दिनचर्या उस मर्ग के नियम एवं गुरु का निर्देशन पर निर्भर करता है; ज्ञानमार्गी अपना दिनचर्या स्वयं तय करता है। ६७। किसी को क्या निर्णय लेना होगा यह दूसरा नहीं बता सकता; गुरु भी सुझाव ही दे सकता है। ६८। सिखते समय गलतीयाँ होंगे, जितनी ग़लतियाँ होंगे उतनी अज्ञान प्रकट होंगे; बुद्धि में समस्या दिख पड़ेगी और अगली बार गलतीयां नहीं होंगे। ६९। अध्यात्म सरल नहीं, कोई जादु या चमत्कार नहीं, हर कोई अध्यात्म में नहीं आ सकता। ७०। साधक वो करता है जो कोई नहीं कर सकता। ७१। शिष्य को ज्ञान हुआ है या नहीं, वो अज्ञेयता के स्थिति में पहुँचा है या नहीं; ये उसके प्रश्नों से पता चलता है। ७२। साधक में अति जिज्ञासा होनी चाहिए, ज्ञान ही जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य होना चाहिए; यही मुमुक्षत्व है। ७३। अज्ञानी झगड़ते हैं, अर्धज्ञानी वादविवाद करते हैं, ज्ञानेच्छुक प्रश्नोत्तर करते हैं और ज्ञानी मौन रहतें हैं। ७४। जब तक अज्ञान है तब तक साधक का खोज जारी रहता है, पूर्ण ज्ञान के बाद भी खोज जारी है तो बौद्धिक अशुद्धि बाकीं है। ७५। शिष्य में एक गुण होता है कि वो जब तक वो वहाँ नहीं पहुँचता तब तक गुरु को रोक लेता है, प्रश्न करता है। ७६। कृपा भेदभाव नहीं करती; सबमें समान रुप से बरसती है, कितना इकठ्ठा हो सकेगा यह पात्र पर निर्भर है। ७७। ज्ञान होने के बाद व्यक्ति बड़ा नहीं छोटा हो जाता है, दंभ का नाश होकर विनयशीलता आती है। ७८। अज्ञानी दंभी होता है; माया ने आवरण और विक्षेप डालकर बड़ा को छोटा और छोटे को बड़ा कर देती है। ७९। ज्ञानी की पहचान उसका नाम, शिक्षा, गुरु, पदवी नहीं, उसकी बातें भी नहीं, ज्ञानी की पहचान उसका जीवन और कर्म हैं। ८०। यदि साधक सांसारिक लोगों के बातों से प्रभावित होता है तो उसमें अभी भी आसक्ति बची है। ८१। प्रश्न न होने का अर्थ या तो संपूर्ण ज्ञान है या तो पूरा अज्ञान है। ८२। ज्ञानमार्गी आश्रम को घर नहीं बनाता है, घर को आश्रम बनाता है। ८३। ज्ञानमार्ग पर अंधश्रद्धा, अंधविश्वास मना है, ज्ञान प्रमाणिक होता है। ८४। किताब प्रश्नों का उत्तर नहीं दे सकता; विध्न या दोष दूर नहीं कर सकता। ८५। ज्ञानमार्ग में प्रश्नों का उत्तर नहीं मिलता; प्रश्नों का ही विनाश हो जाता है। ८६। समर्पण किया नहीं जाता; हो जाता है। ८७। ज्ञानमार्ग में कोई भक्ति नहीं है; ज्ञान के प्रति समर्पण है। ८८। उलझन वाले प्रश्न से व्यक्ति का ज्ञान/अज्ञान क्या है वो बाहर निकल आता है। ८९। ज्ञान सत्यापित होना ज़रूरी है; सत्य स्वयं खोजना होगा। ९०। हर कला, योग्यता नष्ट हो सकता है; लेकिन अध्यात्मिक ज्ञान, गुरु और साधना नष्ट नहीं होता; जहाँ छुटा है अगले जन्म में वहीं से शुरु होगा। ९१। उन्नति का मार्ग संघर्ष से भरा है, उसमें एक ही प्रार्थना काम आएगी- वो है धन्यभाव; इससे श्रेष्ठ कोई प्रार्थना नहीं है। ९२। मामूली सांसारिक कार्य सिखने के लिए तो सालों लग जाता है; जन्मों लगने वाला आध्यात्मिक साधाना का फल तुरंत चाहते हैं! ये संभव नहीं। ९३। संस्कृत श्लोक या बड़े शब्द सुन लेने से ज्ञान का भ्रम हो जाएगा, अहंकार और दंभ बढेगा; गुरु के संकेत बिना ज्ञान नहीं होगा। ९४। जहाँ अज्ञान है वहाँ मनन ज़रूरी है, अपरोक्ष अनुभव और तर्क से उत्तर मिलल जाता है; न मिले तो गुरु से पुछना चाहिए। ९५। शंका का समाधान प्रमाण से होगा, किसी के कहने से या पुस्तक पढ़ने से नहीं। ९६। जहाँ आग जली है उसके ताप और धुवाँ का प्रभाव आस-पास में भी पड़ता है; जहाँ प्रकाश है आस-पास का वातावरण भी प्रकाशित होता है। ९७। अज्ञान नष्ट हो गया तो इसके कारण होने वाले वृत्तियाँ समाप्त हो जाते हैं; इसलिए ज्ञान होने के बाद शांति और प्रश्नहीनता आता है। ९८। सभी सिद्धियों की संभावना सभी में है; जैसे सिद्धियाँ आ सकती है वैसे जा भी सकती है। ९९। सिद्धियाँ आ जाए तो साधक में दम्भ, घमण्ड आ सकता है; यह पतन का कारण है; इसलिए सिद्धियों को बाधा समझा गया है। १००। ज्ञान से बड़ा कोई सेवा नहीं है; एक व्यक्ति को आत्मज्ञान होता है तो सारे जगत का कल्याण होता है। क्रमश:
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