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ज्ञानमार्ग, जीवन और आनंद
जितेन्द्र गिरी
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आज का मनन : आनंद किस प्रकार के जीवन में मिलता है? प्रणाम गुरुक्षेत्र सभी साधकों को प्रणाम आनंद और जीवन का आपस में क्या संबंध है? क्या आनंद किसी विशेष प्रकार का जीवन जीने से मिलता है, या जीवन को देखने और उसके साथ संबंध रखने के तरीके में परिवर्तन ही आनंद है? सामान्यतः हम मानते हैं कि जीवन में सुख की अधिकता होगी, इच्छित परिणाम मिलेंगे और परिस्थितियाँ हमारी अपेक्षाओं के अनुरूप रहेंगी, तो हम आनंद में रहेंगे, किंतु जीवन की प्रकृति को सूक्ष्मता से देखें तो सुख और दुःख दोनों ही इसमें आते-जाते रहते हैं, जिस परिस्थिति में आज सुख का अनुभव होता है, वही परिस्थिति कल दुःख का कारण बन सकती है। उदाहरण के लिए, मीठा खाना हमें अच्छा लगता है, किंतु यदि हमें लगातार, केवल और केवल मीठा ही खाने को मिले, तो धीरे-धीरे उससे अरुचि होने लगेगी, जो पहले सुखद प्रतीत होता था, वही अधिक मात्रा में मिलने पर कष्टदायक हो जाता है। उत्तरजीविता की दृष्टि से भी जीव को विविध प्रकार के पोषक तत्त्वों की आवश्यकता होती है, एक ही प्रकार के भोजन पर निर्भर रहना शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है, लगातार मीठा खाना खाने से कुछ ही वर्षों में आप मधुमेह के शिकार हो जाएंगे। इस उदाहरण से स्पष्ट होता है कि किसी अनुभव का सुखद होना स्थायी नहीं है, अनुभव परिस्थितियों, मात्रा, समय और हमारी मानसिक प्रतिक्रियाओं के अनुसार बदलते रहते हैं, इसलिए माया में किसी अनुभव को पकड़कर स्थायी सुख प्राप्त करने की अपेक्षा पूरी नहीं हो सकती,बजो आया है, वह कभी न कभी जाएगा भी। अब प्रश्न उठता है कि यदि सुख स्थायी नहीं है, तो क्या आनंद का अर्थ जीवन में केवल सुख प्राप्त करना है? नहीं। सुख और आनंद के बीच एक सूक्ष्म अंतर है, सुख किसी अनुकूल परिस्थिति या अनुभव से उत्पन्न होने वाला भाव है, जबकि ज्ञानमार्गीय संदर्भ में आनंद को सुख और दुःख के प्रति पकड़ से मुक्ति के रूप में समझा जा सकता है, इसका अर्थ यह नहीं कि आत्मज्ञान के बाद शरीर और मन में सुख-दुःख की अनुभूतियाँ उत्पन्न होना बंद हो जाती हैं, अनुकूल परिस्थिति में प्रसन्नता और प्रतिकूल परिस्थिति में पीड़ा का अनुभव अभी भी होता, अंतर यह है कि अनुभव के साथ जुड़ी अपेक्षाओं, आग्रहों और मानसिक संघर्षों का स्वरूप बदल जाता है। उदाहरण के लिए, किसी कार्य में इच्छित परिणाम न मिलने पर निराशा का अनुभव होना स्वाभाविक है, किंतु उस अनुभव के साथ यह आग्रह जोड़ लेना कि मेरे साथ ऐसा नहीं होना चाहिए था, परिस्थिति के अतिरिक्त एक और मानसिक संघर्ष उत्पन्न करता है, बुद्धि परिस्थिति को समझकर उचित कर्म कर सकती है, बिना इस आग्रह के कि परिणाम अनिवार्य रूप से हमारी इच्छा के अनुसार ही होना चाहिए। यहाँ एक सावधानी भी आवश्यक है, केवल शांत रहना या अपनी भावनाओं को दबा देना आत्मज्ञान नहीं है, कोई व्यक्ति अपने स्वभाव, अभ्यास या परिस्थितियों के कारण भी शांत रह सकता है, ज्ञानमार्ग का प्रश्न इससे अधिक गहरा है "क्या हमने अपनी उन मान्यताओं को देखा और परखा है, जिनके आधार पर हम अनुभवों को अपना स्वरूप मान लेते हैं और उनसे स्थायी सुख की अपेक्षा करते हैं?" अब मूल प्रश्न पर लौटते हैं "आनंद किस प्रकार के जीवन में मिलता है?" आत्मज्ञान के संदर्भ में सरल, न्यूनतावादी और अहिंसक जीवन सहजता को बढ़ावा दे सकता है, अनावश्यक इच्छाओं, संग्रह और संघर्षों से दूरी जीवन को सरल बना सकती है, किंतु यदि हम यह मान लें कि केवल एक विशेष प्रकार का जीवन जीने से ही आनंद मिलेगा, तो हमने आनंद को फिर किसी परिस्थिति पर निर्भर कर दिया, सरलता भी यदि आनंद प्राप्त करने की अनिवार्य शर्त बन जाए, तो उसके पीछे एक नई अपेक्षा खड़ी हो सकती है, इसलिए प्रश्न केवल यह नहीं है कि हम किस प्रकार का जीवन जी रहे हैं, बल्कि यह भी है कि जीवन के अनुभवों के साथ हमारा संबंध कैसा है? आत्मज्ञान के प्रकाश में सुख और दुःख अपनी स्वाभाविक प्रक्रिया के अनुसार आते-जाते रहते हैं, जीवन की आवश्यकताएँ बनी रहती हैं, परिस्थितियों के अनुसार उचित कर्म भी होते हैं, किंतु अनुभवों को पकड़कर रखने या उनसे बचने की अनिवार्यता का परीक्षण होता है, जो परिस्थिति सामने है, उसके अनुसार कर्म सहज भाव से होता है, बिना इस आग्रह के कि जीवन हमेशा अनुकूल ही बना रहे। अंततः विचार करने योग्य प्रश्न यह है "यदि सुख और दुःख दोनों ही परिवर्तनशील अनुभव हैं और आनंद का अर्थ उनमें से किसी एक को चुनना नहीं है, तो क्या आनंद स्वयं भी कोई विशेष अनुभव है, या आनंद उस स्वतंत्रता का नाम है जिसमें किसी अनुभव के बने रहने की आवश्यकता नहीं रह जाती?" आनंद किसी विशेष परिस्थिति को प्राप्त करने में नहीं, बल्कि जीवन को अपनी अपेक्षाओं के अनुरूप बनाए रखने की अनिवार्यता से मुक्त होने में है, यही मेरा आज का मनन है।