Wise Words
ब्रह्मज्ञान, मौन, ज्ञान का अंत एवं अज्ञेयता।
सत्यम
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### ब्रह्मज्ञान वास्तव में कोई ज्ञान नहीं है। उसको "ब्रह्म का ज्ञान" कह दिया जाता है परंतु ब्रह्म का कोई ज्ञान वहां नहीं होता है। कोई नहीं है वहां जो जान सकता है, न ही वहां कुछ है जिसको जाना ही जा सकता है। तो उसे ज्ञान कहना भी उचित नहीं है। (परंतु जब तक आप नीचे/ज्ञान के निचले स्तरों पर है, तब तक उसे भाषा में लाने के लिए शब्दों का प्रयोग किया जाता है और वही एक शब्द है "ब्रह्मज्ञान") ### ब्रह्मज्ञान अंतिम है। एवं निचला सबकुछ अज्ञान है। जिसे हम ब्रह्मज्ञान कह रहे हैं जोकि कोई ज्ञान नहीं है। वहां तक ले आना ही ज्ञानमार्ग का मूल उद्देश्य है। जब एक बार आप वहां आ जाते हैं। तो क्या आप निचला कुछ भी अपने पास रख पाते हैं? जैसे ही आपने निचला कुछ भी पकड़ने की कोशिश की, आप ब्रह्मज्ञान से नीचे आ जाएंगे। तत्क्षण आप निचले स्तर पर अपने आप को पाएंगे। उदाहरण के लिए: आपने कहा अनुभवकर्ता या तत्व है? आपके यह कहते ही, भेद वृत्ति अपना काम शुरू कर देगी। और अब द्वैत आ गया, उसी क्षण ब्रह्मज्ञान छूट जाता है। क्योंकि अनुभवकर्ता या तत्व भी नहीं है, बस अनुभवक्रिया या अस्तित्व या ब्रह्म ही है। अनुभवकर्ता का ज्ञान/आत्मज्ञान भी ब्रह्मज्ञान की दृष्टि में अज्ञान ही है, क्योंकि अंततः दो नहीं है। इस प्रकार से ब्रह्मज्ञान के स्तर पर, निचले स्तरों का सारा ज्ञान, अज्ञान सिद्ध हो जाता है। ### ज्ञान का वास्तविकता में एक ही स्तर है। इस प्रकार अंततः आपके पास यह निष्कर्ष आता है कि यहां एक ही स्तर है ब्रह्मज्ञान का स्तर। क्योंकि बाकी सभी तो अज्ञान के स्तर सिद्ध हो जाते हैं। और एक स्तर को स्तर नहीं कहते, आपको स्तर नामक धारणा के लिए कम से कम दो की आवश्यकता होती है। इस प्रकार ब्रह्मज्ञान ही एकमात्र एवं शुद्ध ज्ञान है जोकि वास्तव में कोई ज्ञान नहीं है। और इसके अलावा बाकी सबकुछ अज्ञान है। (बेशक गुरु एवं शिक्षक साधकों को माया के स्तर और द्वैत के स्तर के ज्ञान की शिक्षा देतें है क्योंकि ब्रह्मज्ञान तक पहुंचने के लिए ये स्तर और इनका ज्ञान/अज्ञान, सीढ़ी का काम करते हैं। जिसपर चढ़कर वे ब्रह्मज्ञान तक आ सके।) ___ ### ब्रह्मज्ञान संपूर्ण विनाश। मैं फिर से आपका ध्यान ब्रह्मज्ञान पर ले जाना चाहता हूं कि क्या ब्रह्मज्ञान से आप रत्ती भर भी कुछ जान पाए? ब्रह्मज्ञान के स्तर पर न तो "ज्ञान" है, न कोई "जानने या ज्ञान लेने वाला" है और न ही कुछ "ज्ञान का विषय" ही है। ब्रह्मज्ञान के स्तर पर ये तीनों ही अज्ञान रूपी मान्यताएं सिद्ध हो जाते हैं। ब्रह्मज्ञान कोई अज्ञान नहीं छोड़ता। परंतु आप पाते हैं कि ब्रह्मज्ञान किसी भी प्रकार का कोई ज्ञान भी नहीं छोड़ता है और न ही कोई ज्ञान देता ही है। ### ब्रह्मज्ञान एवं मौन क्या आपको किसी भी प्रकार का ज्ञान तब होता है, जिसको आप ब्रह्मज्ञान के नाम से धारण कर सकते हो? इसीलिए ब्रह्मज्ञान के स्तर पर मौन को एकमात्र विकल्प के रूप में चुना जाता है। कोई नहीं बताता कि ब्रह्मज्ञान क्या है। गुरु कहता है कि "मैं तुम्हे दिखा सकता हूं जो मैं जनता हूं, पर बता नहीं सकता।" इसीलिए मैने कहा कि न ज्ञान, न अज्ञान, न सत्य, न असत्य, न तत्व, न नामरूप, न तो "होना" और न ही "न होना"। ब्रह्मज्ञान के स्तर पर ये सभी केवल शब्द मात्र है और अज्ञान ही दिखाते हैं। यही स्थिति अज्ञेयता है। इस प्रकार अद्वैत दर्शन या ज्ञानमार्ग साधक को अज्ञेयता प्रदान करता है। ब्रह्मज्ञान के स्तर पर कौन जान रहा है, कि "होना है" या "होना भी नहीं" है? इसीलिए मौन अंतिम विकल्प बचता है। ब्रह्मज्ञानी कभी नहीं कहता कि "होना है" गुरु कहते हैं कि "होना है" क्योंकि गुरु को मार्गदर्शन के लिए शिष्य को कुछ बताना पड़ता है। "होना है, होना है, होना है" इसकी रट कोई नहीं लगाए फिरता। क्योंकि "कोई" तो कब का मिथ्या सिद्ध हो गया जोकि केवल अनुभव में एक घटना मात्र है। और ब्रह्मज्ञान में तो सब विलय हो गया। अब न तत्व है न नामरूप है, न सत्य है न असत्य है, न अनुभवकर्ता है और न ही अनुभव है। क्या है, वह न बोलने में ही उस ज्ञान की शुद्धता बनाई रखी जा सकती है। ___ ### निष्कर्ष: ब्रह्मज्ञान द्वारा सम्पूर्ण ज्ञान और अज्ञान का नाश करना ही ज्ञानमार्ग का उद्देश्य है जोकि अज्ञेयता प्रकट करता है। उसके लिए विभिन्न धारणाओं, अवधारणाओं का प्रयोग करना पड़ता है जोकि अज्ञेयता के लिए सीढ़ी का काम करते हैं। परंतु छत पर पहुंचने के बाद सीढ़ी का कोई काम नहीं होता। परंतु तब भी अपनी करुणा के कारण वह साधक जिसका अपना कोई निजी व्यक्तित्व नहीं बचा है वह गुरु रूप में नीचे उतरता है एवं दूसरों को भी उनकी उच्चतम अवस्था प्राप्त करने में सहायता करता है। ___ गुरुदेव को नमन गुरुक्षेत्र को नमन धन्यवाद।