ज्ञानाक्षर
असत्य, विसत्य और परमसत्य
जितेन्द्र गिरी
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सत्य को एक ही स्तर पर नहीं देखा जा सकता, वास्तविकता या सत्य के तीन स्तर माने जा सकते हैं; असत्य, विसत्य (विज्ञान का सत्य/माया का सत्य) और परमसत्य। असत्य वह है जिसका कभी भी अस्तित्व नहीं होता, जैसे आकाशकुसुम (आकाश में फूल), खरगोश के सींग या बाँझ स्त्री का पुत्र, इनकी केवल कल्पना की जा सकती है, लेकिन ये कभी अनुभव या वास्तविकता में नहीं होते। इसके विपरीत संसार, शरीर, मन, विचार, सुख-दुःख आदि अनुभव में आते हैं तो इन्हें झूठ नहीं कहा जा सकता, क्योंकि इनका व्यवहारिक अस्तित्व है। भूख लगती है, आग जलाती है, गुरुत्वाकर्षण काम करता है, इसलिए ज्ञानमार्ग इन्हें व्यवहारिक सत्य (विसत्य) मानता है परंतु क्योंकि ये सब परिवर्तनशील हैं, इसलिए इन्हें अंतिम सत्य नहीं माना जाता, ध्यान दें कि ये सबके लिए एक समान रूप से तब तक सत्य हैं, जब तक हम अज्ञान या संसार की अवस्था में हैं। यहीं पर "मिथ्या" शब्द आता है, मिथ्या का अर्थ झूठ नहीं है, मिथ्या का अर्थ है, जो कुछ भी अनुभव में प्रतीत होता है वो वैसा नहीं है, जो न पूर्णतः सत् है (ब्रह्म), न पूर्णतः असत् (खरगोश के सींग), जैसे स्वप्न जागने तक वास्तविक लगता है या रज्जु सर्प भ्रम (अंधेरे में रस्सी में साँप का भ्रम दिखाई देता है, साँप का अनुभव होता है और उससे वास्तविक डर भी लगता है, किंतु है वो मिथ्या) इसे प्रातिभाषिक सत्य भी कहते हैं, यह केवल उस व्यक्ति के लिए सत्य होता है जो भ्रम में है या सो रहा है, जागने पर स्वप्न और प्रकाश होने पर सर्प तुरंत नष्ट हो जाता है। जब बोला जाता है "ब्रह्म सत्यं, जगन्मिथ्या" तो इसका अर्थ यह नहीं है कि संसार झूठ है, इसका अर्थ है कि ब्रह्म ही एकमात्र स्वतंत्र और अंतिम सत्य है; जगत अनुभव में तो है, लेकिन जैसा वो अनुभव/प्रतीत होता है, वैसा है नहीं (मिथ्या है) अब आते हैं परमसत्य पर, जोकि अस्तित्व का "**तत्व**" है, इसे ही ब्रह्म बोला गया है, ज्ञानमार्ग में हम इसे अनुभवकर्ता बोला जाता है, वह न उत्पन्न होता है, न नष्ट होता है, न बदलता है, वही प्रत्येक अनुभव का आधार है, शरीर बदलता है, मन बदलता है, विचार बदलते हैं, यहाँ तक कि जाग्रत, स्वप्न और सुषुप्ति जैसी अवस्थाएँ भी बदलती रहती हैं, लेकिन इन सभी का साक्षी चैतन्य नहीं बदलता, वही आत्मा है, वही ब्रह्म है, और वही परमसत्य है। ध्यान दें कि प्रातिभासिक सत्य तो अवस्था परिवर्तन (जागना/लाइट जलना) से मिट जाता है, जबकि व्यावहारिक सत्य "तत्त्वज्ञान/आत्मज्ञान" (ब्रह्म-बोध) से मिटता है, किंतु फिर भी वह दिखना नहीं छोड़ता, बस उसकी सत्यता (Reality status) मिट जाती है।" इस प्रकार ज्ञानमार्ग में असत्य वह है जिसका कभी अस्तित्व नहीं, विसत्य वह है जो सत्य जैसा दिखाई देता है, किंतु वैसा है नहीं, और परमसत्य वह है जो सदैव है, नित्य है, स्वयं में है और स्वयं के कारण ही विद्यमान है, स्वयंम्भू है।