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शिला
शैल
तस्मै श्री गुरुवे नमः मैं शिला जीवंत शिला बाहर से हवाएं गुजर जाती हैं छूकर, सदा जो होती स्वयं अनछुई! और तोड़ जाती है इसे हजार हजार कणों में जल की धाराएं बहती हैं मुझसे होकर कोमल! शीतल! चंचल! और मेरा एक नन्हा सा हिस्सा चल पड़ता है उनके पीछे पीछे रेत कण बनकर तब भी उन कणों में शिला ही होती है भीतर! मेरे ऊपर बहती जलधाराओं ने उकेरी हैं लकीरें किसी चित्रकार की कलाकृति जैसी और हवाओं ने कुरेदी हैं हजारों हजार परतें जिनसे उन्होंने झांका है मेरे भीतर और पाया है जीवंत कोमल हृदय को जो सूर्य की तपिश पाकर पिघलता है प्रति क्षण बहता है मुझमें शिलाजीत होकर! और फिर भी मैं पाषाण हूं कहलाती हृदय हीन दृष्टि विहीन! तब भी, जीती और देखती उन्हें हूं जिन्हें तुम नहीं देख पाते जीवित होकर भी इन चक्षुओं से क्योंकि चक्षु देखते ही नहीं! न ही दिखाते हैं!! दृष्टि तो भीतर है होती, जो गुरु के सिवा कोई नहीं है दे सकता! शत शत नमन उन्हें, जिन्होंने खोली हैं हजारों हजार बंद आँखें इस शिला की!!!
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