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मूलज्ञान: अंतिम ज्ञान
सत्यम
मूल का अर्थ है आधार। जिस पर सब कुछ टिका हुआ होता है। या जो तत्व है उसे मूल कहते हैं। इस प्रकार मूल ज्ञान से तात्पर्य है तत्व ज्ञान। वह ज्ञान जो सभी प्रकार के ज्ञान और विज्ञान का आधार है उसे यहां मूल ज्ञान कहा गया है। जिस ज्ञान को ग्रहण करने के पश्चात कुछ और जानने की आवश्यकता नहीं रहती और जो ज्ञान को संपूर्ण करता है वह ज्ञान मूलज्ञान है। मूलज्ञान सभी प्रकार की शंकाओं एवं प्रश्नों का निवारण करता है। इसीलिए इसको अंतिम ज्ञान भी कह दिया जाता है। मूल ज्ञान उस बुद्धि की शुद्धि करता है। जो विभिन्न प्रकार की मान्यताओं, अवधारणाओं, अंधविश्वास और मत आरोपण से मलिन हो गई है। यह ज्ञान दृष्टि देता है जिससे वह दिखता है "जो है"। "जो है" से यहां तात्पर्य है यथार्थ या वास्तविकता है। मूल ज्ञान के पश्चात जो जैसा है वह वैसा ही दिखता है। अज्ञान या गलत ज्ञान ने व्यक्ति के लिए विभिन्न प्रकार के बंधनों और दुखों का भ्रम पैदा कर दिया है। मूलज्ञान उस अज्ञान को प्रकट कर उसका समूल विनाश करता है। इस प्रकार मूल ज्ञान सभी प्रकार के बंधनों एवं दुखों का अंत करता है। खुशखबरी यह है कि मूल ज्ञान बहुत ज्यादा कठिन नहीं है। यह ज्ञान बिल्कुल ही साधारण और प्राकृतिक है। इस ज्ञान की सरलता ही इसका सौंदर्य है। परन्तु क्योंकि यह ज्ञान बहुत ज्यादा सरल है इसीलिए इस पर कभी ध्यान नहीं जाता और समाज में फैला अज्ञान असंख्य लोगों को जीवन भर भरमाए रहता है। **मूल ज्ञान क्या है?** मूल ज्ञान अस्तित्व का ज्ञान है। जो कुछ भी है वह अस्तित्व है। अस्तित्व ही दृश्य रूप में प्रकट है और अस्तित्व ही स्वयं के प्रकट रूप का अप्रकट दृष्टा भी है। अस्तित्व ही साक्ष्य है अस्तित्व ही साक्षी है। अस्तित्व ही अनुभव है और अस्तित्व ही अनुभवकर्ता भी है। जो दिख रहा है और जो उसको देख रहा है वह दोनों एक ही है। सरल भाषा में कहें तो: "दो नहीं है" यही मूल ज्ञान है। यही अद्वैत का ज्ञान है। यही अंतिम ज्ञान है। धन्यवाद।
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