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घर वापसी
शालिनी पंडित
मन, तू कहाँ भटक रहा है, क्यों यूँ भटकता जाता है, घर का पता मिल गया, फिर भी परदेसी बन जाता है। क्यों अनजानों से नाता जोड़ा, खुद से रिश्ता भूला, घर की चौखट पर सच्चा संबंध फिर से मिला। अब जान गया है, लौट चल, उस ओर जहाँ तेरा असली घर है, वहीं ठहर चल। इन गलियों में बस कुछ पल का रैन बसेरा था, अनुभवों की गठरी बाँध, कुछ सीखने का सफ़र था। दिल में उलझनें रख, खुद ही फँसता गया, अब समझ गया है, लौट चल, यही सच्चा रास्ता है। जितना भटका, उतना ही अकेला हुआ, घर का पता भूल, हर सहारा छूटा रहा। अब वहाँ से संदेश आया, मिट्टी की खुशबू, रौशनी की किरण ने रास्ता दिखाया। चलते चल, न रुकना अब कहीं, घर की राह में है सुकून की छाँव कहीं। राहों की धूल मिटा, चल अपने घर की ओर, जहाँ हर मोड़ पर है तेरा अपना कोई दौर। बस, चलता चल उस ओर, जहाँ पहुँचने पर जो खो गया था, वो फिर से मिल जाएगा, वहीं तेरा असली पता होगा, वहीं तेरा सच्चा घर होगा!
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