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डोली मेरी निकल पडी रे.....
निशिगंधा क्षीरसागर
पिहरवा संग मिलन को डोली मेरी निकल पडी रे.... शुभं दिन शुभं घडी आज डोली मेरी निकल पडी रे..... डोली मेरी लकडी कीं नही पांच तत्व सें बनी है सुखदुःख भोई संग चले रे डोली मेरी निकल पडी रे पिहरवा संग मिलन को डोली मेरी निकल पडी रे.... राम कृष्ण हरि नाम सें काटे भी फूल बन गये पिहरवा संग मिलन को डोली मेरी निकल पडी रे...... लंबी राह छोटी बन गयी गुरुकृपा छाव मिल गयी सुहाना सफर बना रे ज्ञान कें पुष्प खिले रे.... पिहरवा संग मिलन को डोली मेरी निकल पडी रे..... ऐसा गजब ढायो रे !! ऐसा गजब ढायो रे !! मैं हि नही - मेरी डोली में डोली में राम दिख्यो रे पिहरवा संग मिलन को डोली मेरी निकल पडी रे सब में राम भरा है रामरस जग छायो रे रोम रोम राम बसा है कठपुतली का खेल रच्यो रे डोर उसी कें हाथ में हम समझे मैं नाचू रे कैसा यह भ्रम पालू रे पिहरवा संग मिलन को डोली मेरी निकल पडी रे..... निर्गुण वहि गुण में छायो है अरुपता रूप भासे है खेल उसी का रचा है देखा जाय अलग दृष्टी में तों फिर यहाँ कुछ भी नही है व्यर्थ देह व्यर्थ अभिमान व्यर्थ मन बुद्धी चित्त है स्थूल सारा जड सारा है असत भ्रम असार पसारा इसी असार पसारे में सारं तत्व विवेकी खोजते दृश्य कें पीछे है छिपा अदृश्य वही तत्व है सार यही तत्व सब का और वही तू हि तू है पिहरवा संग मिलन को डोली मेरी निकल पडी रे..... मुझ में हि राम बसा है रोम रोम राम बसा है और सीता भी मुझी में जहाँ सें मैं निकल पडा वही पर खुद को पाया है सफर तों बस्स इतना सा... सफर कें बाद समझा है जिसे ढुंढा गाव गाव में उसे अब घरमें पाया है पिहरवा संग मिलन को डोली मेरी निकल पडी रे..... डोली निकलकर सब घूमकर अब कें बार घर आयी है पिया मेरा मुझ में पाया है पिहरवा संग मिलन को डोली मेरी पहूंच गयी रे..... II
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