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साक्षीभाव: ज्ञान,अशुद्धि, उपाय एवं कुछ महत्वपूर्ण बिन्दु।
सत्यम
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साक्षीभाव क्या है? साक्षीभाव किसे कहा गया है? साक्षीभाव चित्त में सबसे ऊँची वृत्ति है। इसे चित्त की अवस्था भी कह सकते हैं क्योंकि यह वृत्ति स्थाई हो सकती है। इसको स्थाई करने में समय एवं साधना लगती है। इसीलिए ज्ञानमार्ग में साक्षीभाव साधना के लिए विशेष रूप से समय दिया जाता है। साक्षीभाव की साधना ज्ञान को स्थिरता प्रदान करती है। साक्षीभाव वृत्ति या अवस्था, अनुभवकर्ता नहीं हैं। "साक्षी, अनुभवकर्ता है", "मैं अनुभवकर्ता इस निरंतर परिवर्तनशील अनुभव का दृष्टा हूँ" यह "ज्ञान" साक्षीभाव है। ० साक्षीभाव ज्ञान का याद आना है। ० साक्षीभाव ज्ञान याद आना एवं याद रहना (स्थाई होना) है। ० साक्षीभाव सत्य में स्थिर रहना है। ज्ञान का विचार, कि "मैं साक्षी हूँ", साधक (एक काल्पनिक धारणा, समझने के लिए प्रयोग किया गया है।) को आता है क्योंकि ज्ञान साधक को हुआ है। साधक के पास बुद्धि है स्मृति है और अनुभव है और गुरु की शिक्षाएं है जिसके फलस्वरूप साधक को आत्मज्ञान होता है, जोकि एक नकारात्मक ज्ञान है। और क्योंकि ज्ञान हुआ है इसीलिए उस ज्ञान का विचार चित्त में आना स्वाभाविक है। और क्योंकि साधक के लिए आत्मज्ञान एक महत्वपूर्ण बात है इसीलिए उसके चित्त में आत्मज्ञान का विचार बार बार आता है कि "मैं वो हूँ जो अनुभवों का साक्षी है जो कोई भी अनुभव नहीं है।" इसीलिए कहा गया है कि- साक्षीभाव बस एक विचार मात्र है। "मैं अनुभवकर्ता हूँ" इस विचार का चित्त में आना ही साक्षीभाव है। और जब इस विचार के आने पर आप "साक्षी हो जाते हैं"। तब इसे द्वैत के स्तर पर समझना चाहिए। अब साक्षीभाव नहीं है। अब केवल अनुभव है और उसको अनुभव करने वाला है। या दृश्य है और उसका दृष्टा है। अब दो ही है: "मैं अनुभवकर्ता और सामने यह निरंतर परिवर्तनशील अनुभव।" और यदि उसमें ब्रह्मज्ञान मिला दिया जाए, जोकि ज्ञान को संपूर्ण बनाता है। तो साक्षीभाव यहां पहुंच जाएगा: "मैं साक्षी अपने ही परिवर्तनशील एवं प्रतीत होते रूपों का दृष्टा हूँ।" यहाँ ज्ञान की पूर्णता है। यहाँ साक्षीभाव की पूर्णता है। ___ साक्षीभाव में अशुद्धियाँ (ज्ञानदीक्षा कार्यक्रम): (i) स्वयं को न जानना / आत्मज्ञान का अभाव होना। (ii) कभी-कभी जान लिया जाता है और फिर भुला दिया जाता है। हृदय से ज्ञान को स्वीकार न करना। हृदय में ज्ञान न उतरने देना। अपनी मान्यताओं की रक्षा करना एवं उनको छुपाए रखना। (iii) बार-बार नामरूपों से पहचान करना / होना। स्वयं को कोई वस्तु, व्यक्ति, शरीर, मन या कोई पराभौतिक वस्तु मान लेना। (iv) इंद्रिय अनुभवों से मोह, आसक्ति होना। उनको मेरा मान लेना या उनको भी सत्य मान लेना। (v) द्वैत तक का ज्ञान होना। इससे अस्तित्व के ज्ञान में अलगाव का अज्ञान बना रहता है। (vi) व्यक्ति का भ्रम बचे रहना। व्यक्ति को सत्य मानना। (vii) तरह-तरह के बौद्धिक तर्कों-वितर्कों में उलझे रहना। (viii) शंकाओं का समाधान न होना। ___ उपाय(ज्ञानदीक्षा कार्यक्रम): (i) ज्ञान को स्थापित करना। (ii) सभी शंकाओं, प्रश्नों आदि के उत्तर खोजना। मूलज्ञान को ठोस प्रमाणित कर लेना। (iii) गुरु को सुनना। जिससे आप ज्ञान को कभी भूलें नहीं। (iv) ज्ञान में लीन रहना। जिससे साक्षीभाव बढ़ता रहे एवं ज्ञान के संस्कार चित्त पर गहरे बनते रहे। (v) समाज के मतारोपण को मूल सहित त्याग देना। केवल ज्ञान को ही हृदय से धारण करना। (vi) अज्ञानियों की संगति को छोड़ देना, बुद्धिमानों एवं साधकों की संगति में रहना, सत्संग सुनना, ज्ञान को बार-बार याद दिलाता है। जिससे ज्ञान के संस्कार गहरे बनते जाते हैं। और आपको ज्ञान बार बार याद आता है। (vii) अनावश्यक कर्मों, साधनाओं, प्रथाओं का त्याग करना जोकि आपको "शरीर या व्यक्ति मैं हूँ" ऐसी मान्यता देती हैं। (viii) अद्वैत का ज्ञान साक्षीभाव को और घर्षण रहित बनाता है: मैं न केवल अनुभवकर्ता हूँ बल्कि अनुभव और अनुभवकर्ता एक ही हैं। इस ज्ञान से सभी प्रश्नों का अंत होता है। अनुभव एवं अनुभवकर्ता के बीच की काल्पनिक रेखा रूपी अज्ञान का भी अंत होता है। इससे बुद्धि शांत होती है। ज्ञान स्थिर रहता है। ___ साक्षीभाव से संबंधित कुछ ध्यान देने योग्य बातें:- प्रवाह : (1) साक्षीभाव का आधार (2) अभ्यास कैसे करें (3) साधना में बाधाएँ (4) साधना को स्थिर कैसे रखें (5) दैनिक अनुशासन (6) उन्नत मार्गदर्शन (7) ज्ञान प्रसार। --- साक्षीभाव से संबंधित कुछ ध्यान देने योग्य बातें: भाग 1 : साक्षीभाव का आधार 1. साक्षीभाव दिन के प्रत्येक क्षण में एवं धरती या अस्तित्व में हर स्थान पर संभव है। 2. आत्मज्ञान के बिना साक्षीभाव असंभव है। ब्रह्मज्ञान ज्ञान को संपूर्ण बनाता है। जिससे साक्षीभाव भी शंका रहित एवं घर्षणरहित चलता है। 3. अनुभवकर्ता को ही "मैं" रूप में धारण करें। शंका आने पर मनन करें। जीवभाव को त्याग दें, जीव (काल्पनिक धारणा) तो जीव ही रहेगा। 4. साक्षीभाव का लक्ष्य क्या है? यह लक्ष्यहीन साधना है। साक्षीभाव में होना अर्थात अपने स्वरूप में होना। क्या आप जो वास्तव में हैं, वह हो जाने पर आपको कुछ मिलना चाहिए? हाँ, आपके गुण आपके अनुभव में आएँगे मुक्ति, निर्लिप्तता, आनंद, शांति, संतुष्टि आदि। --- भाग 2 : साक्षीभाव का अभ्यास 5. जैसे साक्षीभाव की साधना के दौरान यह धीरे-धीरे बढ़ता है, वैसे ही यदि इसको प्राथमिकता न दी गई तो यह धीरे-धीरे घटता भी है। 6. ज्ञान/साक्षीभाव का विचार आते ही सबसे पहले उसको प्राथमिकता दें। साक्षीभाव का विचार आते ही अथवा याद आते ही "साक्षी हो जाएँ", फिर वह कार्य जारी रखें जो भी आप तब कर रहे थे। इस प्रक्रिया में मुश्किल से 2 सेकंड ही लगेंगे। और क्योंकि साक्षीभाव में बुद्धि एवं शरीर नियंत्रित एवं कुशल रूप से कार्य करते हैं, इसलिए आपको उससे लाभ ही होगा। कई बार बुद्धि यह कहकर साक्षीभाव के विचार को टाल देती है कि "अभी आवश्यक कार्य चल रहा है।" 7. बस इतना ध्यान रखें कि वर्तमान क्षण में आप साक्षीभाव में हों। जब भी याद आए, उसी क्षण साक्षीभाव में आ जाएँ। इससे क्या अंतर पड़ता है कि आप पिछले समय से कितनी देर साक्षीभाव में थे। या कितनी देर साक्षीभाव में नहीं थे। वर्तमान क्षण ही एकमात्र समय है। सदा अभी ही साक्षी रहिए। यदि आप अभी साक्षी है तो आपकी साधना अच्छी चल रही है। --- भाग 3 : साधना में आने वाली बाधाएँ 8. अशुद्धियाँ साक्षीभाव में बाधा लाती हैं। ज्ञानदीक्षा का चरण शुद्धिकरण एक कृपा है। गुरुजी द्वारा शुद्धिकरण का चरण दिए जाने के पीछे एक कारण है वह तभी समझ आएगा जब आप शुद्धिकरण कर रहे होंगे। उसका लाभ अवश्य लें। 9. ज्ञान का अहंकार, दंभ, ज्ञानी बनना, दूसरों को नीचा देखनाअज्ञान हैं। अज्ञान ज्ञान को ढँक लेता है। यह साक्षीभाव के अभाव का संकेत है। एवं ज्ञान में अशुद्धि है। 10. कुछ समय लेकर अपनी सभी शंकाओं, प्रश्नों एवं मान्यताओं को एक स्थान पर लिखें। कुछ प्रश्नों, शंकाओं एवं मान्यताओं को अहंकार छुपाए रखता है। उन पर प्रकाश डालिए। उन्हें ज्ञान की दृष्टि में लाइए। अपने अनुभव से प्राप्त मौलिक ज्ञान द्वारा उस अज्ञान को भी प्रकाशित कीजिए जिससे वह स्वयं ही समाप्त हो जाए। अब वास्तविक समर्पण होता है। --- भाग 4 : साधना को स्थिर कैसे रखें 11. जीव की विभिन्न परतों एवं वृत्तियों की अशुद्धियों को हटाएँ।(विशेष रूप से साक्षीभाव की अशुद्धियों को) इससे आपका जीवन सुखी, सुगम, शांत एवं संतुष्ट होगा। साक्षीभाव की साधना अच्छी चलेगी। 12. साक्षीभाव की सिद्धि पर ध्यान मत दीजिए कि एक समय पर इसको सिद्ध करके फिर छोड़ दूँगा/दूँगी। यह साक्षीभाव साधना में अरुचि पैदा करता है। जोकि साधना में अशुद्धि है। 13. साक्षीभाव साधना और शुद्धिकरण को जल्दी समाप्त करने का विचार न लाएँ। यह कोई जबरदस्ती किया गया कार्य नहीं है। इसे एक आनंदमय जीवनपर्यंत यात्रा की तरह देखिए। बस करते जाइए और देखते जाइए कि इसके क्या-क्या प्रभाव आते-जाते हैं। जितना करेंगे उतनी ही शांति एवं संतुष्टि बढ़ती जाएगी। उतने ही ० जीव के पुराने संस्कार क्षीण होंगे। ० नए संस्कार नहीं बनेंगे। ० मुक्त अनुभव होगा। 14. अपने मस्तिष्क पर साक्षीभाव को बोझ न बनाएँ। यह न सोचें कि इसे जीवनभर करना है। भूतकाल में छूट गया, भविष्य में करना हैइन बातों पर ध्यान न दें। यदि साक्षीभाव छूट गया था तो कोई बात नहीं। शुरुआत में ऐसा होना स्वाभाविक है। यह एक कला की तरह धीरे-धीरे बढ़ता है। 15. साक्षीभाव थोड़ा स्थिर होने पर आलस्य न दिखाएँ कि अब तो यह अपने आप ही आ रहा है। इसमें सदा रमे रहें। इसे अपना जीवन बना लीजिए। यही ज्ञानमय जीवन है। यही ज्ञानमार्ग के साधक की साधना है। 16. साक्षीभाव शांति लाता है। इसको आलस्य का रूप न लेने दें। सभी कर्मों को साक्षीभाव में करने का प्रयास करें। सभी आवश्यक कर्मों को करने से जीवन घर्षणरहित होगा। --- भाग 5 : दैनिक अनुशासन 17. बुद्धि का प्रयोग करके उन विचारों, संबंधों एवं कर्मों का त्याग करें जो आपके अनमोल समय के योग्य नहीं हैं। सभी आवश्यक कर्मों को पूरी निष्ठा एवं समय पर पूरा करें। इससे जीवन घर्षणरहित होगा। साधना अच्छी चलेगी। 18. प्रत्येक दिन कम से कम एक घंटा ज्ञानमार्ग के लिए समर्पित करें। ० गुरुजी के वीडियो सुनें। एक बार नहीं, दो बार सुनिए। ० नए बिंदुओं को लिखिए। ० प्रतिदिन मनन कीजिए। ० शंकाएँ एवं प्रश्न, सत्संगों या गुरुसंवाद में रखिए। बोधि वार्ता चैनल उससे कहीं अधिक है जितना हमारा अनुमान है। --- भाग 6 : ज्ञान प्रसार 19. ज्ञान प्रसार करते समय ध्यान रखें कि यह आपकी साधना एवं प्रगति को बाधित न करे। जितना भी आपसे बन पड़े करें। परंतु उसके लिए स्वयं की साधना को कभी भी दूसरे स्थान पर न रखें। ज्ञान प्रसार भी साधना के साथ-साथ चलता रहे और आपकी प्रगति भी किसी भी प्रकार से बाधित न हो। यही सही विकल्प है। अन्यथा अभी के लिए ज्ञान प्रसार छोड़ दीजिए। --- समझो अभ्यास करो बाधाएँ पहचानो निरंतरता बनाए रखो जीवन में उतारो फिर ज्ञान प्रसार करो। ___ साक्षीभाव वृत्ति के शुद्धिकरण के परिणाम (ज्ञानदीक्षा कार्यक्रम):- कैसे जानें कि साक्षीभाव की परत में शुद्धि हो रही है? / अशुद्धियाँ कम हो रही हैं? या साक्षीभाव की साधना अच्छी चल रही है? यदि आपकी साक्षीभाव की साधना अच्छी चल रही है तो आपको यह सभी लक्षण देखने को मिलेंगे: - शांति एवं मौन - आनंद - सरल जीवन - स्थिरता एवं सुख - निर्भयता - बुद्धि एवं विवेक में वृद्धि - संकल्प शक्ति में वृद्धि - तर्क शक्ति - स्वतंत्रता - निचली वृत्तियों की प्राकृतिक शुद्धि - साक्षीभाव में जीवन का लक्ष्य स्पष्ट होता है। जो अज्ञान के अंधकार में कहीं खो गया था, उसको साधक वापस पाता है। ___ अंततः एक साधक के लिए, साक्षीभाव : * आवश्यकता है। * आनंद है। * कृपा है। धन्यवाद। गुरु एवं गुरुक्षेत्र कृपा करें।