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अध्यात्म: एक संक्षिप्त परिचय
सत्यम
(शुरुआती साधकों के लिए अध्यात्म का एक संक्षिप्त परिचय। इस लेख के लिए बोधि वार्ता पर प्रकाशित "ज्ञानसूत्र श्रृंखला, वीडियो १ अध्यात्म क्या है?" से मार्गदर्शन लिया गया है। वह वीडियो अवश्य देखें।) मूल रूप में अध्यात्म स्वयं का ज्ञान है। मैं कौन हूँ, मैं क्या हूँ, मेरा तत्व क्या है, मेरा वास्तविक स्वरूप क्या है यह जानना अध्यात्म है। यह जीव क्या है, यह जगत क्या है, क्या इस जगत में कुछ सत्य है, क्या यह जगत माया है यह ज्ञान भी अध्यात्म के अंतर्गत ही आता है। अस्तित्व क्या है, अस्तित्व में क्या सत्य है और क्या असत्य है, अस्तित्व का तत्व क्या है, मुझमें और अस्तित्व में क्या संबंध है। यह ज्ञान मूल ज्ञान कहलाता है जोकि अध्यात्म की नींव है। इसके अतिरिक्त अध्यात्म एक जीवनशैली है। मूल ज्ञान होने के पश्चात उस ज्ञान के प्रकाश में जीवन जीना। उस ज्ञान को कभी भुलाना नहीं, जो जाना गया है वही होकर जीवन व्यतीत करना। उस ज्ञान को जीवन में उतारना सही अर्थों में आध्यात्मिकता है। इसके अलावा अध्यात्म जीव की प्रगति का विषय है। यह जन्म और मृत्यु के चक्र से मुक्ति का विषय है। यह अज्ञान और अंधकार का पूर्णतया नाश है। यह उन सभी दुखों और बंधनों का अंत है जो अज्ञान और भ्रम के कारण उत्पन्न हुए हैं। अध्यात्म सीमित का असीमित में विलय है। अध्यात्म सभी सीमाओं का, सभी विभाजनों का अंत है। जिसका परिणाम है आनंद और शांति। जोकि आपका स्वरूप ही है। **अध्यात्म की ओर** अध्यात्म के बारे में ओर बात करें तो यह एक बहुत ही उन्नत विषय है जिसकी ओर व्यक्ति तभी अग्रसर होता है जब उसका ध्यान निचली वृत्तियों से हटकर ऊपरी वृत्तियों (बुद्धि , विवेक, चेतना आदि) तक जाने लगता है। तभी एक व्यक्ति साधक बनता है। एक साधक सबसे पहले अपने आध्यात्मिक लक्ष्य का चुनाव करता है। जिस लक्ष्य ने आपको अध्यात्म में आने की प्रेरणा दी है वह लक्ष्य आध्यात्मिक लक्ष्य कहलाता है। आध्यात्मिक लक्ष्य को निर्धारित करने के पश्चात साधक अपने लक्ष्य के अनुकूल मार्ग एवं गुरु का चयन करता है। और चयनित मार्ग की शिक्षाएं एवं गुरु का अनुभव साधक को उसके लक्ष्य तक पहुंचाने में सहायता करते हैं। हम बहुत ही भाग्यशाली हैं कि हमारे पास उपयुक्त आध्यात्मिक मार्ग को चुनने के लिए विभिन्न विकल्प उपलब्ध है। जिनमें मुख्य वर्ग है ज्ञानमार्ग, योगमार्ग, शक्तिमार्ग, कर्ममार्ग, भक्तिमार्ग और तंत्रमार्ग। फिर भी सदा एक समय पर एक मार्ग और एक ही गुरु से सीखना चाहिए। अन्यथा कहीं भी प्रगति नहीं होती है। सभी मार्गों की शिक्षाएं उस मार्ग के लक्ष्य की प्राप्ति में सहायक होती है। और क्योंकि मार्गों के लक्ष्य भिन्न है इसीलिए उनकी शिक्षाएं भी भिन्न होती है। कभी भी दो मार्गों की शिक्षाओं को नहीं मिलाना चाहिए और न ही उनमें तुलना करनी चाहिए। विभिन्न ऋषियों, मुनियों और ज्ञानी महात्माओं ने अपने अनुभव, बुद्धि, विवेक, साधना एवं ज्ञान द्वारा इन शिक्षाओं को विकसित किया, अपने जीवन में अपनाया एवं मानव कल्याण के लिए ज्ञान अधिकारियों को सिखाया। और इस प्रकार गुरु शिष्य-परंपरा द्वारा आगे बढ़ते-बढ़ते यह ज्ञान, आज हमारे लिए उपलब्ध हुआ है। इस कृपा का लाभ सभी को अवश्य लेना चाहिए। अध्यात्म क्या है इसके साथ साथ यह जानना भी अति महत्वपूर्ण है कि: **अध्यात्म क्या नहीं है।** शुरुआती साधकों के मन में अक्सर यह मान्यता होती है कि जितने ज्यादा मुझे विचित्र और विशेष अनुभव होंगे उतना ही ज्यादा मैं आध्यात्मिक हो जाऊंगा। परन्तु ऐसा कुछ भी नहीं है। अभी जो आपका अनुभव है, संपूर्ण ज्ञान होने के लिए वही पर्याप्त है। क्योंकि यहीं पर सत्य है यहीं पर माया है। जो पहले से ही विचित्र है। आपको किसी भी प्रकार के विचित्र अनुभव की कोई आवश्यकता नहीं है। कुछ लोग विभिन्न प्रकार की सांसारिक वासनाओं की पूर्ति हेतु अध्यात्म में आ जाते हैं जैसे नौकरी मिल जाएगी, मेरे सम्बन्ध अच्छे हो जाएंगे, बच्चे हो जाएंगे, मुझे कोई बड़ा पद मिल जाएगा आदि आदि। परन्तु ध्यान रखना चाहिए जो इच्छाएं संसार में पूर्ण हो सकती है उनके लिए अध्यात्म बिल्कुल भी सही विकल्प नहीं है। क्योंकि अध्यात्म ज्ञान के विषय में है और ज्ञान कहता है कि कोई भी इच्छा मेरी नहीं है। सिद्धियों एवं पराभौतिक शक्तियों के लालच में कुछ लोग अध्यात्म में आ जाते हैं। मुझे शक्तियां और सिद्धियां मिल जाएंगी तो मैं दूसरे लोगों से बड़ा बन जाऊंगा। परन्तु यह बस अहम की संतुष्टि का एक प्रयास है जोकि संसार में नहीं हो पाया, वह अब अध्यात्म में करना चाहते हैं। बहुत से लोग मानते हैं कि धार्मिक पुस्तकें, शास्त्र, ग्रंथ आदि पढ़ने मैं आध्यात्मिक बन जाऊंगा। जितनी अधिक पुस्तकें जिसने पढ़ी है वह उतना ही अधिक आध्यात्मिक हो गया है। परन्तु अध्यात्म अनुभव का विषय है किताबी ज्ञान का नहीं। विशेष प्रकार के वस्त्र धारण करना, जटाएं रखना, मालाएं पहनना, तिलक लगाने से कोई आध्यात्मिक नहीं हो जाता है। कुछ परंपराओं में यह आवश्यक होता है परन्तु सामान्यतः आध्यात्मिक व्यक्ति आपकी और मेरी तरह ही सामान्य कपड़े पहनते है और साधारण जीवन व्यतीत करते हैं। कुछ मनुष्य शारीरिक रूप से, अपने संबंधियों से, नौकरी न होने के कारण, पैसे न होने के कारण आदि बड़े दुख में होते हैं। समाज में कोई उनका आदर नहीं करता। इसीलिए वे सब छोड़कर आध्यात्मिक होने का प्रयास करते हैं। यह अध्यात्म नहीं, पलायन है, परिस्थितियों से भागना है। यह विरक्ति नहीं कायरता है। क्योंकि आध्यात्मिक व्यक्ति के लिए न तो सुख ही है और न दुख ही है। वह सदा एक स्थिति में रहता है। आध्यात्मिक व्यक्ति का संसार छूट जाता है जोकि ज्ञान का परिणाम है, वह छोड़ने का प्रयास नहीं करता। कुछ लोग अपने अंदर की नकारात्मकता से परेशान होते हैं। मुझमें दूसरों के लिए ईर्ष्या है, लालच है, मुझे क्रोध बहुत आता है, मुझमें काम वासना बहुत है, मुझमें बहुत से बुरे व्यसन आदि हैं। और आध्यात्मिक व्यक्तिओं को देखो, कितने संतुलित रहते हैं। इसीलिए मुझे भी आध्यात्मिक हो जाना चाहिए जिससे ये वृत्तियां समाप्त हो जाएं। परन्तु अध्यात्म का लक्ष्य "ज्ञान है", उसके परिणाम स्वरूप वृत्तियों पर नियंत्रण आता है और शुद्धिकरण होता है। इन वृत्तियों का अंत नहीं होता, क्योंकि जो भी आवश्यक है वह सब ज्ञान के पश्चात भी होता रहता है। रक्षण के समय क्रोध, प्रजनन के समय काम वासना का आना प्राकृतिक है। यह सब मनुष्य होने का ही एक भाग है। और यह उतना ही आवश्यक है जितना भोजन करना है, सांस लेना है। आशा है आप समझ पाए होंगे कि अध्यात्म क्या है, और क्या नहीं है। इस पर अवश्य विचार करें। एवं जानने का प्रयास करें कि क्या वास्तव में अध्यात्म अभी आपके लिए है? धन्यवाद।
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