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व्यक्ति की मिथ्या और अनुभवकर्ता
शैल
अनुभवकर्ता को व्यक्ति के बिना अनुभव नहीं हो सकते। अनुभवकर्ता कोई व्यक्ति नहीं, कोई पहचान नहीं है किन्तु अस्तित्व स्वयं ही है। सभी अनुभवों की पृष्ठभूमि भी वही है और व्यक्ति स्वयं एक अनुभव है,और उसका अनुभव भी अनुभवकर्ता मैं को ही होता है। व्यक्ति जो एक सीमित अनुभवों के रूप में अभिव्यक्त है, एक भौतिक मनोशरीर यंत्र जो स्मृति से आया है। और यह यंत्र इंद्रियों का स्थान और उन्हें पोषित करने वाला यंत्र है। इंद्रियां नाद को सीमित करती हैं और तनमात्राओं के जोड़ के रूप मैं अनुभवों को निर्मित करती है। अनुभव सदा से हैं किन्तु वे अनुभव में नहीं आते क्योंकि नाद सीमित नहीं है। तन्मात्राओं के अर्थपूर्ण जोड़ से अनुभव प्रक्षेपित होते हैं। व्यक्ति उसका माध्यम मात्र है। व्यक्ति स्वयं अनुभव के रूप में उसी भौतिक यंत्र के माध्यम से व्यक्त है, किन्तु सभी अनुभव अनुभवकती को ही होते हैं। अनुभवों का होना और अनुभव में आना अलग अलग घटनाएँ हैं। अनुभव संभावनाओं के रूप में व्यक्त है किन्तु वे निर्मित तभी होंगी, जब वे इंद्रियों के माध्यम से अर्थपूर्ण रूप से संयोजित हों।अनुभवों का होना और उनका आभाव दोनों अस्तित्व में ही है। इस प्रकार अनुभवों के आभाव को भी वही अस्तित्व अर्थात अनुभवकर्ता अनुभव कर रहा है, अनुभक्रिया की तरह।(कर्ता की तरह नहीं ) नाद अव्यक्त अस्तित्व में गति से उत्पन्न होती है, और अनुभवों के रूप में व्यक्त होते है। स्थूल इंद्रियाँ स्थूल अनुभव निर्मित करती है। भावेन्द्रियाँ भाव एवं विचारों को निर्मित करती हैं। भावेंद्रियों का स्थान अथवा उनका केन्द्र भी शरीर ही है। और भावनाएँ सूक्ष्म तरंगों के रूप में होती हैं जो विचार और फिर कर्म का रूप ले लेती हैं। इस प्रकार व्यक्ति स्वयं अनुभव है और अनुभवकर्ता का अनुभव नहीं होता। व्यक्ति को अनुभव नहीं होते। व्यक्ति का अनुभव होता है, जो जीव के रूप में समय और स्थान में व्यक्त है। समय और स्थान भी अनुभव हैं, प्रतीति मात्र हैं।
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