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१ **ज्ञानोपरान्त जीवन** २ **मैं द्रष्टा**
जानकी
<br><br> <div class="ui image"> <img width="500px" src="https://th.bing.com/th/id/OIP.V76oqsn-xB9Lt4fES201fQHaE8?w=261&h=180&c=7&r=0&o=5&pid=1.7" alt="Any Width"> </div> <br><br> १ **ज्ञानोपरान्त जीवन** अंदर तत्व सार बाहर चमत्कार। मिथ्या प्रकट सचित्र सत्य निराकार॥ कर्म निष्काम तन, मन पवित्र। शुद्ध, सरल मेरा भाव माया विचित्र॥ साक्षी निरंतर अनुभव के पार। धराशायी मान्यता झूठा निराधार॥ न आसक्ति, भोग, दुःख, मोह, लोभ। न प्राप्ति में उमंग, चिंता, कुण्ठा, क्षोभ॥ शुद्ध होगा भाव सौम्य होगा राग। चेतना से मिटेगा अशुद्धि का दाग़॥ व्यर्थ छूटेगा अर्थ जुटेगा। प्रेम सागर फूटेगा बन्धन टूटेगा॥ वाणी सुमधुर दिव्य होगा नूर। तृप्ति होगा पूरापूर अहंकार चूर॥ न लेनादेना मिथ्या खेल में। न स्वार्थ न सरोकार जाल झेल में॥ सभी मेरा रुप सबका उन्नति। सबका कल्याण मेरा है ख़ुशी प्रगति॥ ज्योति ज्ञान का जैसे जलेगा। शांति, सुख, आनन्द में जीवन चलेगा॥ *** २ **मैं द्रष्टा** मैं दृष्टि, मैं सृष्टि मैं ही एक द्रष्टा। मैं पालक, विनाशक मैं ही तो हूँ स्रष्टा॥ सभी से अछूता स्वयं देखता हूँ। मेरा ही पहेली मैं किस को बताऊँ?? मैं बस देखता हूँ बिना लक्ष्य पक्ष। कभी न रुकावट सीधा न कटाक्ष॥ न इच्छा न ताक़त मैं किस को मनाऊँ? ये लीला है मुझमें मैं कैसे जनाऊँ?? किसी को न पकड़ूँ न छोड़ूँ अकेला। न देखूँ मनोरम न देखना है मेला॥ न रुठूँ किसी से मैं किस को सताऊँ? न मेरा मनोभाव मैं कैसे जताऊँ?? न चाहत न आदत न घृणा उपेक्षा। न कर्षण किसी में न कोई अपेक्षा॥ ये माया है मुझमें मैं किस को दिखाऊँ? ये रचना भी मेरा मैं किस को लिखाऊँ?? न जोड़ूँ स्वयं में न तोड़ूँ अलग से। तमाम में न तृप्ति न नाखुश झलक से॥ मैं नर्तक मैं नृत्य किस को नचाऊँ? न कोई है दूजा मैं किस को बताऊँ?? न कोई है दूजा मैं किस को बताऊँ?? ***
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