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जीवन एक यात्रा
निशिगंधा क्षीरसागर
जीवन सागर अनादी अपार अशांत चंचल है बारंम्बार अनिश्चित अस्थिर है यह जीवन तू सब का साक्षी शांत स्थिर निश्चल तटस्थ दुःख विपदा तपता सूरज क्रोध से तपकर पहुचा गगन शांत होकर शीतल पवन बरसे जल बरखा बनबन जीवन पानी पानी जीवन चक्राकार चलता जीवन पानी चक्राकार जीव की गती..... दूर से खुद को देख शांत होकर स्थिर चित्त खुद का मिथ्या स्वरूप जीवन रंग रूप आकार खुदको खुदमें हि झाक खुदकी मिथ्या अहं मन्यता देख बनकर साक्षी द्रष्टा तटस्थ होकर देखता जा जीवन की मिथ्या असारता दुःख अग्नी झुलसता रहता कडी धूप के बाद शीतलता सुखकी छाव में उछलता वहभी बदले यहभी बदले सुख दुःख दोनो सदा न रहते जीवन जहाँ शाश्वत नहीं सुखदुःख कैसे शाश्वत होंगे? जीवन को सत्य मानता जीव अज्ञान भ्रान्ती से असत को सत्य मानता इसी भूल से फसता और जनम जनम भटकता...... जीवन सागर अनादी अपार अशांत चंचल आभास आकार लेहरो पे लेहरे सारी आती जाती उठती मिटती सुख भी और दुःख भी दोनो यहाँ शाश्वतं नहीं सत्य सनातन सदा सर्वकाल एक परदा सदा सर्वदा जिसपर जीवन चित्र उभरे सारे अनुभव माया मोहजाल दुःख की गहरी खाई ठेस लगकर ठोकर खाई जो खुदसे खुदको संभलता वो दुःखो से उपर उठता दृष्टी बदली दृश्य बदले अस्तित्व पर प्रश्न करता जीवन की मिथ्या जानता जीवन भ्रान्ती मुझ पे भारी ठेस खाकर जागृती पायी यह जागृती मुझे समझती लेकिन बुद्धी स्वीकृत न करती कश्मकश द्विधा में साधक अटका विश्व मिथ्या विश्वास होवेना अज्ञान से ज्ञान दृढ होवेना अभ्यास बारंबार यही उपाय श्रद्धा सबुरी समाधान आर्तता श्रुती बतलाती यही साधन...... भ्रान्ती सृष्टीकी कैसे पचावू जिसको समझा मै खुदसे उसे कैसे आसनीसे छोडू इस मन को कैसे रिझाऊ मन को कैसे सहलाऊ जानकर मन की मिथ्या संसार छुटतेही ब्रह्म प्राप्त यही उपाय है प्यारे मात्र ठोकर खाकर पायी जागृती जो मुझे लगे कठीनाई धीरे धीरे संस्कार मिटता संस्कार से संसार मिटता धीरे धीरे अज्ञान हॅटता ज्ञान के पवित्र कवाड खुलता खुले ना कैसे खुलने लगेंगे गुरुकृपा से शुद्धी होगी जैसे जैसे...... जीवन मिथ्या मान लेना अपूर्वाई आश्चर्य जीवन की सार्थकता जनमो जनमो की कृतकृत्यता जीवन भ्रमाकार यही सत्य भ्रान्ती जानी समझी फिर भी दृढता ज्ञान की होवेना हिल गया मै--- जग गया मेरे अस्तित्वपर उठे सवाल मै कौन? तीक्ष्ण बाण दु:ख शाश्वतरूप से मिटाने खोज में लग गयी साधक की सारी जान .... प्रकृती माता अब सहलाती ममताकी चादर कृपा बरसाती ठोस अनुभव ठोस सीख कारण प्रभाव दुःख का कारण दुःखसे सीखकर दुःख हटा दुःख हटा तो सुखभी हटा उन्मुख हुवा मै आत्मकाम अब है केवल आनंद राम ही राम आत्माराम शब्दातीत जो इंद्रिय अगम्य कैसे करू उसे बयान वो शब्द कहा से लाऊ? जो उसका करे बखान उस गुणातीत शब्दातीत को कैसे मै शब्दो में बांधू? ..... जो मेराहि खोया स्वरूप माया हटतेहि दिख गया निर्झर मौन स्वाभाविक प्रवाह स्वाभाविक भाषा निसर्ग गान ऐसा बहाव ऐसा प्रवाह जीवन संगीत सरिता प्रवाह सागर जिसका आश्रय स्थान हर मोडपर दो किनारे लौकिक पारलौकिक एक सहारे मै चलता खुद की साथ खुदको देखता देह साथ बाह्यदृष्टी अंत:दृष्टी बाह्यसाधन अंत:साधन सच्चा मै झूठा मै मै ही मेरा द्रष्टा द्रष्टा होकर देख संसार देखते देखते एक हो जाये प्रतिबिंब बिंब में समा जाये द्रष्टा दृश्य सारा द्वैत अद्वैत घटे अभी इसी क्षण मेरा स्वरूप नित्य शांती जागकर देखा भ्रम तूटा अशांती हो गयी विलीन जैसे लहर सागर में लीन मेरा अस्तित्व एक बुदबुदा मिथ्या इच्छा कामना वासना क्षणमात्र का उनका दिखना सत्यसा प्रतीत हो रहा था अज्ञान मेरा मुझे दिखा संस्कार समझ जिसे अपनाया चित्तमें डेरा डाले था बैठा अज्ञान माया संसार पसारा प्रकाशित हो दिखा सारा जो है मात्र कचरा कुडा..... इसी किचड में ज्ञान कमल देखता रहता संसार मल सुख अब मुझे लुभाये ना मोह माया मुझे भुलावे ना शुकराना मै कैसे मनाऊ गुरुका ऋण कैसे मिटाऊ कुछ ऋण कभी नहीं उतरते ऋण में रहना आहोभाग मेरा स्वरूप मुझे प्राप्त मै की खोज हुई समाप्त यात्रा सुफल हुई सम्पन्न जीवन सार्थक सफल हुवा जहाँ यात्रीभी नहि रहा ... @.... निशिगंधा 28 में 2026
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