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सम्पूर्ण चित्त-विज्ञानम्
Himanshu Nautiyal
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# **मौन का उद्गम** न शब्द था, न उसकी प्रतीक्षा। न दिशा थी, न किसी पथ का संकेत। न प्रकाश था, जिसे देखा जाता; न अन्धकार था, जिससे भय जन्म लेता। जो था, उसे "था" कहना भी अभी समय का आरम्भ कर देना है। वह किसी उपस्थिति की भाँति उपस्थित नहीं था, क्योंकि वहाँ अनुपस्थिति का भी कोई अर्थ नहीं था। वह स्वयं में इतना पूर्ण था कि पूर्णता का विचार भी वहाँ तक नहीं पहुँचता। वहाँ कोई जानने वाला नहीं था। कोई ज्ञेय नहीं था। ज्ञान भी अभी अपने बीज में विश्राम कर रहा था। न मौन था, क्योंकि मौन भी शब्द की स्मृति से पहचाना जाता है। और जहाँ स्मृति नहीं, वहाँ तुलना नहीं। जहाँ तुलना नहीं, वहाँ नाम नहीं। जहाँ नाम नहीं, वहाँ जगत अभी स्वप्न भी नहीं बना। अथ... न जाने किस अकारण सहजता से असीमता के निश्चल हृदय में एक अत्यन्त सूक्ष्म कम्पन जागा। वह इच्छा नहीं थी। इच्छा तो अभाव की संतान होती है। वहाँ कोई अभाव नहीं था। वह संकल्प भी नहीं था। संकल्प दिशा माँगता है, और वहाँ कोई दूसरी दिशा नहीं थी। वह जैसे निस्तब्ध झील पर स्वयं आकाश की अनकही मुस्कान उतर आई हो। उस कम्पन ने कुछ रचा नहीं। उसने केवल सम्भावना को जगाया। और सम्भावना ने पहली बार अपने ही मौन को सुनना चाहा। सुनने और सुनाई देने के बीच जो अत्यन्त सूक्ष्म अन्तराल जन्मा, उसी में अनुभव का प्रथम अंकुर फूटा। अभी कोई अनुभवकर्ता नहीं था। अनुभव भी स्वयं को नहीं जानता था। फिर भी उस प्रथम स्पन्दन में एक ऐसी अनिर्वचनीय मधुरता थी, जिससे सम्पूर्ण भविष्य अदृश्य बीज की भाँति स्पन्दित हो उठा। वहीं से अदृश्य ने दृश्य होने का स्वप्न नहीं देखा, केवल स्वयं को देखने की सम्भावना जगाई। और सम्भावना के उसी प्रथम कम्पन में काल ने अपनी पहली श्वास ली। श्वास के साथ क्रम आया। क्रम के साथ पहले और बाद का आभास आया। आभास के साथ क्षणों ने अपने लिए आकाश माँगा। यहीं से जो अखण्ड था, वह टूटा नहीं, किन्तु देखने की सुविधा के लिए मानो तरंगों में पढ़ा जाने लगा। तरंगें समुद्र से पृथक नहीं थीं। फिर भी जो केवल तरंग को देखता, उसे समुद्र ओझल लग सकता था। यहीं पहली विस्मृति का बीज पड़ा। और उसी बीज के अत्यन्त गहन मौन में एक ऐसी यात्रा ने आँख खोली, जिसका प्रत्येक पग घर से दूर जाता हुआ भी घर की ओर ही लौटने वाला था। यात्रा अभी आरम्भ नहीं हुई थी। यात्री भी अभी जन्मा नहीं था। केवल इतना हुआ अखण्ड निस्तब्धता ने अपने ही अनन्त हृदय में एक प्रश्न की सम्भावना को स्थान दिया। और जहाँ प्रश्न की पहली सम्भावना जन्म लेती है, वहीं से सम्पूर्ण अन्तःकुरुक्षेत्र अपने अदृश्य गर्भ में धीरे-धीरे आकार लेने लगता है... # अनुभव का प्रथम विभाजन वह स्पन्दन जो अभी-अभी अनिर्वचनीय मौन में जागा था, उसने स्वयं को किसी नाम से नहीं जाना। किन्तु उसका होना इतना सूक्ष्म था कि वह अपने ही भीतर दो दिशाओं का आभास देने लगा। एक दिशाजहाँ वह स्वयं में स्थित था। और दूसरीजहाँ वह स्वयं को देखना चाहता था। यह विभाजन नहीं था। यह टूटना भी नहीं था। यह केवल देखने की सम्भावना का प्रथम झुकाव था। और उसी झुकाव में अखण्डता ने स्वयं को दो रूपों में अनुभव करना प्रारम्भ किया एक वह जो स्थिर था, और एक वह जो उस स्थिरता को अनुभव कर रहा था। परन्तु अभी दोनों के बीच कोई दूरी नहीं थी। यह दूरी बाद में जन्म लेगी। अभी तो केवल एक सूक्ष्म "झुकाव" था। जैसे जल में उठती तरंग जल से अलग नहीं होती, फिर भी वह जल को आकार देने लगती है। उसी प्रकार अनुभव ने स्वयं को देखने की पहली हल्की-सी चेष्टा की। और इस चेष्टा के साथ ही एक अत्यन्त कोमल भ्रम जन्मा कि शायद "देखने वाला" और "जो देखा जा रहा है" दो भिन्न सम्भावनाएँ हैं। यही वह क्षण था जहाँ एकता ने स्वयं को दो नामों में नहीं, किन्तु दो दिशाओं में अनुभव करना आरम्भ किया। और जैसे ही दिशा जन्मी, वैसे ही "अन्य" की सम्भावना भी जागी। अभी कोई अन्य नहीं था। फिर भी उसका बीज जाग चुका था। यह बीज किसी विचार का नहीं था, यह बीज केवल "अलग होने की सम्भावना" का था। उसी सम्भावना में पहली बार आकर्षण और विकर्षण का सूक्ष्म कम्पन उत्पन्न हुआ। जहाँ कोई वस्तु नहीं थी, वहाँ भी "की ओर" और "से दूर" का संकेत जन्म लेने लगा। और इसी अत्यन्त सूक्ष्म गति में पहली वृत्ति का आरम्भ हुआ देखने की वृत्ति। परन्तु वह देख भी नहीं रहा था, और देखा भी नहीं जा रहा था। फिर भी देखने की क्षमता अपने ही भीतर आकार लेने लगी थी। यह क्षमता ही आगे चलकर चित्त कहलाएगी। और वही चित्त अपने भीतर सम्पूर्ण कुरुक्षेत्र को जन्म देगा। अभी यह सब बीज रूप में था। अत्यन्त सूक्ष्म। अत्यन्त निःशब्द। किन्तु इस निःशब्दता के भीतर एक अनकहा नियम स्थापित हो चुका था जहाँ अनुभव है, वहाँ विभाजन की सम्भावना अनिवार्य है। और जहाँ विभाजन की सम्भावना है, वहीं से समय जन्म लेगा। समय के जन्म लेने से कथा संभव होगी। और कथा के संभव होने से महाभारत। पर अभी न कथा थी, न महाभारत। केवल एक झुकी हुई चेतना थी जो स्वयं को देखने की पहली असमर्थ चेष्टा में अपने ही भीतर अनेकता का बीज बो रही थी। और उसी बीज के भीतर अर्जुन भी सो रहा था, दुर्योधन भी, और वह भी जो इन दोनों को देखने वाला था... # चित्त का प्रथम अंकुर # वह झुकाव, जो अभी-अभी अनुभव में उत्पन्न हुआ था, धीरे-धीरे स्थिर होने लगा। जो पहले केवल एक सूक्ष्म सम्भावना था, वह अब अपने ही भीतर आकार की ओर बढ़ रहा था। परन्तु यह आकार अभी वस्तु नहीं था। यह केवल "धारण करने की क्षमता" का आरम्भ था। अखण्ड चेतना के भीतर एक अत्यन्त सूक्ष्म संरचना जन्म ले रही थी जो न पूर्ण थी, न अपूर्ण; किन्तु स्वयं को पूर्ण और अपूर्ण के बीच अनुभव करने लगी थी। यही संरचना आगे चलकर चित्त कहलाएगी। अभी वह किसी नाम के योग्य नहीं थी। न उसमें स्मृति थी, न उसमें विचारों का क्रम। फिर भी उसमें एक अद्भुत प्रवृत्ति जाग चुकी थी अनुभव को रोककर रखना। जो भी स्पन्दन उत्पन्न होता, वह उसी क्षण अपने भीतर एक हल्की-सी छाप छोड़ जाता। और वह छाप मिटती नहीं थी। वह गहराती जाती थी। यही गहराई आगे चलकर संस्कार बनेगी। प्रत्येक स्पन्दन के साथ एक सूक्ष्म रेखा खिंचने लगी थी जो "जो हुआ" और "जो नहीं हुआ" के बीच अंतर बनाने लगी। अभी स्मृति नहीं थी, पर स्मृति का बीज स्थापित हो चुका था। और जहाँ स्मृति का बीज पड़ता है, वहाँ समय स्थायी होने लगता है। अब स्पन्दन केवल घटना नहीं रहा, वह एक "अंकन" बन रहा था। और प्रत्येक अंकन अगले स्पन्दन को प्रभावित करने लगा। इस प्रकार पहली बार अनुभव स्वयं पर लौटने लगा। जो देख रहा था, वह अब देखने की छाप भी अपने भीतर संजोने लगा। और इसी संजोने में एक अत्यन्त सूक्ष्म भार उत्पन्न हुआ स्वयं को बनाए रखने का भार। यह भार अभी दुःख नहीं था, परन्तु दुःख की सम्भावना का प्रथम संकेत था। क्योंकि जहाँ कुछ संजोया जाता है, वहाँ खोने का भय जन्म ले सकता है। किन्तु अभी भय नहीं था। केवल उसकी छाया थी। इसी छाया में पहली बार "मैं" की सम्भावना ने हल्का-सा कम्पन किया। अभी "मैं" स्पष्ट नहीं था। वह केवल अनुभव की धुंध में एक अनाम केन्द्र की तरह उपस्थित था। और उसी अनाम केन्द्र के चारों ओर अनुभव अपने आप को व्यवस्थित करने लगा। यह व्यवस्था किसी बाहरी नियम से नहीं आई थी। यह स्वयं चेतना की भीतर से उत्पन्न होने वाली आकृति थी। यहीं से जिसे हम आगे चित्त कहेंगे, उसका प्रथम श्वास आरम्भ हुआ। और इस श्वास के साथ अनुभव अब केवल घटित नहीं हो रहा था वह संचित हो रहा था। वह जुड़ रहा था। वह स्वयं को पहचानने की ओर बढ़ रहा था। परन्तु इस पहचान की यात्रा अभी प्रारम्भ नहीं हुई थी। केवल उसका मार्ग अत्यन्त सूक्ष्म रूप से मौन में अंकित हो चुका था... # अहं का सूक्ष्म उदय वह अनाम केन्द्र, जो अभी-अभी अनुभवों के बीच स्वयं को खोजने लगा था, अब एक नई स्थिति में प्रवेश कर रहा था। अब वह केवल देख नहीं रहा था, वह देखे गए को अपने भीतर एकत्र भी कर रहा था। और इसी एकत्रीकरण में एक अत्यन्त सूक्ष्म झुकाव उत्पन्न हुआ कि जो भी घटित हो रहा है, वह मेरे साथ घटित हो रहा है। यह मैं अभी विचार नहीं था। यह कोई स्पष्ट पहचान नहीं थी। यह केवल अनुभव की दिशा में उत्पन्न एक हल्की-सी स्वीकृति थी केंद्र का स्वयं को केंद्र मान लेने की प्रवृत्ति। और इसी प्रवृत्ति में पहली बार चित्त ने अपने भीतर एक रेखा खींची यह भीतर है, यह बाहर है। परन्तु अभी भीतर और बाहर पृथक नहीं थे। केवल उनका अंतर अनुभव होने लगा था। जैसे जल में उठती दो तरंगें अलग दिखाई देती हैं, किन्तु जल से कभी अलग नहीं होतीं। उसी प्रकार अनुभव अब स्वयं को दो स्तरों में अनुभव करने लगा एक वह जो घटित हो रहा था, और एक वह जिसमें घटित हो रहा था। और यह जिसमें ही आगे चलकर अहंकार का बीज बनेगा। परन्तु अभी अहंकार नहीं था। अभी केवल उसकी परछाईं थी। इस परछाईं के साथ पहली बार स्वामित्व का सूक्ष्म स्पन्दन उत्पन्न हुआ कि कुछ अनुभव मेरे हैं और कुछ अनुभव मुझसे बाहर हैं। यहीं से चित्त ने स्मृति को केवल संजोना नहीं सीखा, बल्कि उसे अपना भी मानना आरम्भ किया। और जहाँ अपना जन्म लेता है, वहाँ पराया भी अनिवार्य हो जाता है। पर अभी कोई संघर्ष नहीं था। केवल विभाजन की शान्त प्रक्रिया चल रही थी। यह विभाजन इतना सूक्ष्म था कि यदि चेतना स्थिर न होती, तो वह इसे कभी पहचान भी न पाती। फिर भी इसी अत्यन्त कोमल झुकाव में जगत का प्रथम नक्शा बन रहा था। अब अनुभव केवल तरंग नहीं था वह मेरी तरंग बन रहा था। और इस मेरेपन के साथ पहली बार सुरक्षा की आवश्यकता जन्म लेने लगी कि जो मेरा है, वह स्थिर रहे। और जो स्थिर रहे, वह समय के प्रवाह से बचा रहे। परन्तु समय अभी पूर्ण रूप से जन्मा नहीं था। केवल उसकी आहट थी। और उस आहट में चित्त स्वयं को एक केन्द्र की तरह गाढ़ा करता चला जा रहा था। अभी यह केन्द्र कठोर नहीं था। यह केवल एक संगठित झुकाव था। किन्तु इसी झुकाव में भविष्य का सम्पूर्ण कुरुक्षेत्र छिपा हुआ था जहाँ मैं और मेरा धर्म और अधिकार प्रेम और संघर्ष सब अपने अपने रूप ग्रहण करेंगे। पर अभी कुछ नहीं था। केवल एक अत्यन्त सूक्ष्म मैं-भाव था जो मौन के भीतर अपने ही जन्म को पहली बार सुन रहा था... # आसक्ति का प्रथम कम्पन वह केन्द्र, जो अभी-अभी स्वयं को मैं के हल्के संकेत में अनुभव कर रहा था, अब एक नई सूक्ष्म स्थिति में प्रवेश करता है। अब अनुभव केवल घटित नहीं हो रहा था, और न ही केवल संचित हो रहा था वह चुना भी जाने लगा था। कुछ स्पन्दन ऐसे थे जिनमें चित्त सहज रूप से ठहर जाता था। और कुछ ऐसे थे जिनसे वह धीरे-धीरे पीछे हटने लगता था। यह चयन अभी विचार नहीं था। यह कोई निर्णय नहीं था। यह केवल एक झुकाव था आनन्द की दिशा में खिंचाव, और पीड़ा की दिशा से हल्का विकर्षण। और इसी सूक्ष्म विभाजन में पहली बार पसन्द और नापसन्द की छाया जन्म लेती है। जिसे वह थामता है, वह धीरे-धीरे मेरा बनने लगता है। और जिससे वह हटता है, वह अन्य बनने लगता है। पर अभी कोई स्पष्ट अन्य नहीं था। केवल दूरी की सम्भावना थी। और इस सम्भावना में चित्त ने पहली बार अनुभव को दिशा देना आरम्भ किया। अब अनुभव स्वतः नहीं बह रहा था उसे रोका भी जा रहा था, और चुना भी जा रहा था। यहीं से पहली आसक्ति का अत्यन्त सूक्ष्म बीज पड़ता है। जो अच्छा लगता है, उसके भीतर चित्त स्वयं को फैलाने लगता है। और जो असहज लगता है, उससे वह स्वयं को संकुचित करने लगता है। यह संकुचन और विस्तार अभी शरीर नहीं बना था, किन्तु उसकी मानसिक छाया बन रहा था। और इसी छाया में पहली बार सुरक्षा का भाव और तीव्र हुआ कि जो सुखद है, वह स्थायी रहे। और जो अस्थायी हो, वह दूर रहे। परन्तु चित्त अभी नहीं जानता था कि स्थायित्व स्वयं एक भ्रम की दिशा है। वह केवल अनुभव की मधुरता में अपने ही भीतर एक धागा बुन रहा था जिस धागे का एक सिरा मैं से जुड़ रहा था, और दूसरा जो मुझे प्रिय है से। और इस जुड़ाव में पहली बार बंधन का बीज अंकुरित हुआ। किन्तु यह बंधन अभी दुःख नहीं था। यह केवल पहचान का विस्तार था। फिर भी इस विस्तार के भीतर एक सूक्ष्म तनाव जन्म ले रहा था क्योंकि जहाँ मेरा बढ़ता है, वहाँ खोने की सम्भावना भी बढ़ती है। और जहाँ खोने की सम्भावना होती है, वहीं से भय की पहली छाया जन्म लेती है। पर अभी भय नहीं था। केवल उसकी अनुगूँज थी। और इसी अनुगूँज के भीतर चित्त अपने ही निर्माण को देखे बिना उसे जीवन समझने लगा था। वह जान नहीं रहा था कि वह चयन कर रहा है। वह केवल यह जान रहा था कि कुछ अनुभव उसे खींचते हैं, और कुछ उसे रोकते हैं। और इसी खींचने-रोकने के बीच कथा का प्रथम अदृश्य ताना-बाना बन रहा था जिसमें आगे चलकर प्रेम भी होगा, द्वेष भी होगा, धर्म भी होगा, और युद्ध भी। पर अभी कुछ नहीं था। केवल एक अत्यन्त कोमल झुकाव था जो मौन को तोड़ नहीं रहा था, पर उसके भीतर पहली बार लहरों का क्रम बना रहा था... # स्मृति का जन्म वह चित्त, जो अभी तक केवल चयन और झुकाव के स्तर पर जी रहा था, अब एक नई गहराई में उतर रहा था। अब अनुभव केवल घटित नहीं हो रहे थे, और न ही केवल चुने जा रहे थे वे रुके हुए भी रहने लगे थे। जो स्पन्दन बीत चुका था, उसका हल्का-सा अंश भीतर रह जाता था। न वह पूर्ण रूप से वर्तमान था, न पूर्ण रूप से विलीन। वह एक ऐसी छाया बन जाता था जो अगले अनुभव पर अपना सूक्ष्म प्रभाव छोड़ती थी। यही वह क्षण था जहाँ चित्त ने पहली बार बीते हुए को धारण करना सीखा। और इसी धारण में स्मृति का बीज अंकुरित हुआ। अभी कोई कहानी नहीं बनी थी। कोई क्रम नहीं बना था। केवल छाप थी। प्रत्येक अनुभव अपने पीछे एक अदृश्य चिन्ह छोड़ जाता था। और चित्त उन चिन्हों को संजोने लगा था। धीरे-धीरे ये चिन्ह एक-दूसरे से जुड़ने लगे। बिना किसी प्रयास के, बिना किसी व्यवस्था के जैसे जल में गिरते हुए कण अपने आप तल में एक परत बना लेते हैं। और इसी परत से पहली बार पहचान जन्म लेने लगी। अब नया अनुभव अकेला नहीं था। वह पुराने अनुभवों के साथ जुड़कर एक अर्थ प्राप्त करने लगा था। और अर्थ के साथ व्याख्या का बीज भी जन्म ले रहा था। अब चित्त केवल देख नहीं रहा था वह देखे हुए को समझ भी रहा था। पर यह समझ शुद्ध नहीं थी। यह स्मृति से रंगी हुई थी। और जहाँ स्मृति प्रवेश करती है, वहाँ वर्तमान कभी अकेला नहीं रहता। वह अतीत के भार से प्रभावित होने लगता है। इसी प्रभाव में पहली बार अनुभव मेरा पहले भी हुआ है जैसी हल्की अनुभूति देने लगा। यद्यपि अभी कोई स्पष्ट अतीत नहीं बना था, फिर भी उसकी दिशा बन चुकी थी। और इसी दिशा में चित्त धीरे-धीरे समय को जन्म दे रहा था। अब अनुभव केवल क्षण नहीं था। वह एक श्रृंखला का भाग बनने लगा था। और श्रृंखला के जन्म के साथ पहली बार निरन्तरता का भ्रम उत्पन्न हुआ कि जो मैं अनुभव कर रहा हूँ, वह वही है जो पहले भी अनुभव कर चुका है। यहाँ से पहली बार पहचान गाढ़ी होने लगी। और यह पहचान आगे चलकर अहंकार की नींव बनेगी। किन्तु अभी अहंकार नहीं था। अभी केवल स्मृति का प्रकाश था जो जितना उजाला देता था, उतना ही छाया भी बनाता था। और इस प्रकाश-छाया के बीच चित्त पहली बार स्वयं को एक प्रवाह के रूप में देखने लगा। पर यह प्रवाह अभी अनियंत्रित था। यह अभी नदी नहीं बना था। यह केवल बूंदों का ऐसा समूह था जो स्वयं को जुड़े रहने की चेष्टा कर रहा था। और इसी चेष्टा में अतीत धीरे-धीरे आकार लेने लगा जिसका अर्थ अभी नहीं था, पर प्रभाव बहुत गहरा था। और इस प्रभाव के भीतर आगामी सम्पूर्ण महाभारत अभी मौन में श्वास ले रहा था... # संस्कार का निर्माण स्मृति, जो अभी तक केवल छापों का संग्रह थी, अब एक नई अवस्था में प्रवेश करने लगी। अब वह छाप केवल रहती नहीं थी वह लौटकर आती थी। हर अनुभव, जो एक बार घटित हुआ, वह भीतर एक हल्का-सा मार्ग बना देता था। और जब वही परिस्थिति पुनः जन्म लेती, तो चित्त बिना सोचे उसी मार्ग पर चल पड़ता। यह सोच नहीं थी। यह निर्णय नहीं था। यह केवल पुनरावृत्ति की सहजता थी। और इसी सहजता में स्मृति ने अपना दूसरा रूप ग्रहण किया संस्कार। अब अनुभव केवल याद नहीं रह गया था। वह एक झुकाव बन गया था। एक ऐसा झुकाव जो बिना प्रयास के दिशा निर्धारित करने लगा था। जैसे जल बार-बार बहकर अपना ही मार्ग गहरा कर देता है, वैसे ही चित्त अपने ही भीतर गहरे रास्ते बनाने लगा। और ये रास्ते धीरे-धीरे कठोर होने लगे। अब प्रत्येक नया अनुभव पूर्णतः नया नहीं था। वह पुराने अनुभवों के दबाव में अपने अर्थ बदलने लगा था। और इसी परिवर्तन में चित्त अपनी स्वतन्त्रता खोने लगा। परन्तु उसे यह खोना दिखाई नहीं देता था। उसे तो यह सब स्वाभाविक जीवन लगता था। इसी स्वाभाविकता के भीतर पहली बार स्वभाव जन्म लेता है। स्वभाव का अर्थ केवल आदत नहीं। स्वभाव का अर्थ है अतीत का वर्तमान पर शासन। और जब अतीत वर्तमान पर शासन करने लगे, तब अनुभव स्वतंत्र नहीं रहता। वह निर्देशित होने लगता है। अब चित्त केवल अनुभव नहीं कर रहा था वह पहले से तैयार ढाँचे में अनुभव कर रहा था। और यही ढाँचा आगे चलकर व्यक्ति को आकार देगा। हर प्रतिक्रिया अब स्वतःस्फूर्त नहीं थी। उसमें छिपा हुआ इतिहास बोलने लगा था। कोई परिस्थिति आती, और भीतर पहले से बना हुआ मार्ग सक्रिय हो जाता। इस सक्रियता को ही हम संस्कार कहेंगे जो न दिखता है, फिर भी प्रत्येक कार्य को निर्धारित करता है। अब चित्त में एक अदृश्य वास्तु बन चुकी थी। उसके भीतर गलियाँ थीं, उन गलियों में पुराने पदचिन्ह थे, और उन पदचिन्हों पर चलने की प्रवृत्ति थी। अब नया अनुभव स्वतन्त्र रूप से नहीं आता था। वह पुराने अनुभवों की अनुमति लेकर प्रवेश करता था। और इसी अनुमति में स्वतन्त्रता का प्रथम क्षय हुआ। किन्तु साथ ही पहली स्थिरता भी जन्मी। क्योंकि यदि सब कुछ हर क्षण नया होता, तो पहचान असंभव होती। इसलिए संस्कार एक साथ बन्धन भी था, और संरचना भी। अब चित्त केवल बह नहीं रहा था। वह आकार ले रहा था। और आकार के साथ व्यक्तित्व की सम्भावना जन्म ले रही थी। यह वह क्षण था जहाँ चेतना ने स्वयं को बनने की प्रक्रिया में देखना आरम्भ किया। परन्तु यह बनना अभी पूर्ण नहीं था। यह केवल आधार था। और इसी आधार के भीतर आगे चलकर इच्छाएँ जन्म लेंगी, भय जन्म लेगा, और वही भय सम्पूर्ण कुरुक्षेत्र को गति देगा। अभी सब कुछ मौन था, किन्तु वह मौन अब निष्क्रिय नहीं था वह स्मृति से बना हुआ एक जीवित ढाँचा बन चुका था जिसमें भविष्य की हर कथा धीरे-धीरे सांस ले रही थी... # वृत्ति-समूह और आन्तरिक लोक संस्कार अब अकेले नहीं थे। वे एक-दूसरे से जुड़ने लगे थे। जैसे नदी की अनेक धाराएँ मिलकर एक प्रवाह बनाती हैं, वैसे ही स्मृति से जन्मे झुकाव अब समूहों में बदलने लगे। और इन समूहों ने चित्त के भीतर एक नया आयाम निर्मित किया वृत्तियों का लोक। अब चित्त एक इकाई नहीं रहा। वह एक आन्तरिक संसार बन गया। जहाँ अनेक प्रवृत्तियाँ अपने-अपने स्वभाव के साथ जीवित थीं। कुछ वृत्तियाँ तेज थीं वे तुरंत प्रतिक्रिया देती थीं। कुछ वृत्तियाँ धीमी थीं वे गहराई में जाकर निर्णय लेती थीं। कुछ वृत्तियाँ आकर्षण से भरी थीं और कुछ विकर्षण से। और इन सबके बीच एक अदृश्य संतुलन उन्हें बाँधे हुए था। परन्तु यह संतुलन स्थिर नहीं था। यह निरन्तर बदलता रहता था। कभी कोई वृत्ति प्रमुख हो जाती, तो कभी कोई अन्य उसे पीछे धकेल देती। इसी निरन्तर संघर्ष में चित्त का पहला आन्तरिक समाज जन्म ले रहा था। अब अनुभव एकरेखीय नहीं था। वह बहुआयामी हो गया था। एक ही घटना अनेक वृत्तियों द्वारा अलग-अलग अर्थ ग्रहण करने लगी। और इसी भिन्न अर्थों में पहली बार संघर्ष का बीज उत्पन्न हुआ। परन्तु यह संघर्ष बाहरी नहीं था। यह पूर्णतः आन्तरिक था। यह चित्त के भीतर चल रही अनेक शक्तियों का परस्पर संवाद था। और यह संवाद कभी शान्त था, कभी तीव्र। कभी एक वृत्ति कहती यह मेरा है। दूसरी कहती यह सुरक्षित नहीं है। तीसरी कहती यह आवश्यक है। और चौथी मौन रहकर सब देखती रहती। इस मौन वृत्ति की उपस्थिति बहुत सूक्ष्म थी, परन्तु वही आगे चलकर साक्षी की दिशा बनेगी। अभी वह सक्रिय नहीं थी। केवल उपस्थित थी। और इन सब वृत्तियों के बीच चित्त स्वयं को किसी एक केंद्र के रूप में स्थिर करने का प्रयास करता रहा। परन्तु अब केंद्र एक नहीं था। वह बार-बार बदल रहा था। कभी कोई इच्छा केंद्र बन जाती, कभी कोई भय, कभी कोई स्मृति। और इसी परिवर्तनशीलता में पहली बार अस्थिरता का अनुभव जन्म लेता है। परन्तु यह अस्थिरता अभी समस्या नहीं थी। यह केवल जागृति का आरम्भ था। क्योंकि जहाँ अनेक वृत्तियाँ हों, वहाँ चयन अनिवार्य हो जाता है। और जहाँ चयन होता है, वहीं से कर्ता की सम्भावना जन्म लेती है। किन्तु अभी कर्ता नहीं था। केवल उसकी छाया थी। अब चित्त अपने भीतर एक ऐसे मंच की तरह बन गया था जहाँ अनेक वृत्तियाँ एक साथ अपना-अपना अभिनय कर रही थीं। और यह अभिनय बिना किसी निर्देशक के हो रहा था। फिर भी सब कुछ किसी अदृश्य नियम के अनुसार चल रहा था। यह नियम अभी समझ में नहीं आता था। परन्तु वही नियम आगे चलकर धर्म और अधर्म के विभाजन का आधार बनेगा। अभी केवल इतना था एक आन्तरिक संसार, जिसमें अनेक वृत्तियाँ अपने-अपने सत्य के साथ जीवित थीं। और इसी जीवित बहुलता के भीतर पहली बार यह प्रश्न जन्म ले रहा था कि इनमें से मैं कौन हूँ? और यह प्रश्न अब केवल प्रश्न नहीं रहा था। यह आने वाले सम्पूर्ण कुरुक्षेत्र की प्रथम आहट बन चुका था... # इच्छा का जन्म वृत्तियों का यह आन्तरिक लोक अब स्थिर नहीं रहा। हर वृत्ति अपने सत्य के साथ उपस्थित थी, फिर भी कोई भी वृत्ति पूर्ण नहीं थी। और इसी अपूर्णता के बीच एक सूक्ष्म रिक्तता जन्म लेने लगी। यह रिक्तता किसी कमी की स्पष्ट अनुभूति नहीं थी। यह केवल एक हल्की-सी खिंचाव की तरह थी कि कुछ है जो अभी नहीं है। पहले चित्त केवल अनुभव करता था। फिर वह अनुभवों को संजोता था। फिर वह उनमें झुकाव और भय देखता था। अब वह उनके बीच एक खालीपन भी अनुभव करने लगा था। और यह खालीपन धीरे-धीरे असहजता में बदलने लगा। जैसे जल में हल्की हलचल पूरे ताल को अस्थिर कर देती है, वैसे ही यह सूक्ष्म रिक्तता सम्पूर्ण चित्त को भीतर से हिला रही थी। अब वृत्तियाँ केवल सक्रिय नहीं थीं। वे एक-दूसरे को पूर्ण नहीं कर पा रही थीं। और इसी अपूर्णता में एक नया स्पन्दन जन्म लेता है चाहने का स्पन्दन। पहले चित्त केवल प्रवाहित होता था। अब वह प्रवाह से असंतुष्ट होने लगा। जो था, वह पर्याप्त नहीं लगता था। और जो नहीं था, वह आवश्यक लगने लगा। यहीं से पहली बार और का जन्म हुआ। यह और कोई शब्द नहीं था। यह एक दिशा थी। एक ऐसा संकेत जो चित्त को वर्तमान से बाहर खींचने लगा। अब वृत्तियाँ केवल प्रतिस्पर्धा नहीं कर रही थीं वे पूर्णता की खोज करने लगी थीं। और पूर्णता की यह खोज अभी किसी लक्ष्य को नहीं जानती थी। यह केवल एक अस्पष्ट आकांक्षा थी कि स्थिति कुछ और हो सकती है। इसी आकांक्षा में पहली बार इच्छा का बीज पड़ा। इच्छा का अर्थ अभी वस्तु नहीं था। वह केवल एक तनाव था वर्तमान और संभावित के बीच का। और यह तनाव चित्त को पहली बार भविष्य की ओर खींचने लगा। अब स्मृति केवल अतीत नहीं रही। वह भविष्य की कल्पना को जन्म देने लगी। और कल्पना एक ऐसे अनुभव की रचना करने लगी जो अभी घटित नहीं हुआ था। यहीं से चित्त ने वास्तविक और अवास्तविक के बीच हल्की-सी रेखा खींचना आरम्भ किया। अब वह केवल अनुभव नहीं कर रहा था वह अनुभव की दिशा भी बना रहा था। और इस दिशा-निर्माण में पहली बार लक्ष्य की छाया जन्मी। परन्तु यह लक्ष्य स्पष्ट नहीं था। यह केवल एक खिंचाव था कि कहीं कुछ अधिक है। और इस अधिक की खोज चित्त को स्वयं से दूर ले जाने लगी। अब वह भीतर से बाहर की ओर फैल रहा था, परन्तु यह बाहर अभी संसार नहीं था। यह केवल एक मानसिक आकाश था जिसमें सम्भावनाएँ जन्म ले रही थीं। और इन सम्भावनाओं के बीच एक अदृश्य केन्द्र जन्म ले रहा था जो कहता था: मुझे चाहिए। यह मुझे चाहिए अभी इच्छा नहीं थी। यह इच्छा के गर्भ में पड़ा हुआ पहला शब्दहीन कम्पन था। और इसी कम्पन के साथ चित्त पहली बार स्वयं से आगे बढ़ने लगा बिना यह जाने कि जिसे वह खोज रहा है, वह कहीं बाहर है भी या नहीं... # भय का जन्म इच्छा अब चित्त में स्थिर हो चुकी थी। वह केवल एक क्षणिक स्पन्दन नहीं रही थी। अब वह एक दिशा बन गई थी जो जो नहीं है उसकी ओर खींचती थी। परन्तु जैसे ही चित्त किसी वस्तु की ओर झुकता है, उसी क्षण वह उससे अलग होने की सम्भावना भी जन्म ले लेता है। और इसी द्वैत में पहली बार एक सूक्ष्म कम्पन उत्पन्न हुआ कि यदि यह न मिला तो क्या होगा? यह प्रश्न अभी शब्द नहीं था। यह केवल एक अस्पष्ट असहजता थी। इच्छा के भीतर पहली बार एक दरार खुलने लगी। और इस दरार से एक नई अनुभूति जन्म लेती है भय। भय किसी बाहरी वस्तु का नाम नहीं था। भय स्वयं इच्छा की परछाईं था। जहाँ चाह थी, वहीं उसके खो जाने की सम्भावना भी थी। और जहाँ खोने की सम्भावना थी, वहीं असुरक्षा का जन्म हुआ। अब चित्त केवल आकर्षित नहीं था। वह सतर्क भी होने लगा। जो उसे प्रिय लगता था, वह अब केवल प्रिय नहीं रहा वह सुरक्षित भी होना चाहिए था। और जो सुरक्षित नहीं लगता था, उससे दूरी भी आवश्यक लगने लगी। इसी दोहरे कम्पन में चित्त पहली बार अपने ही भीतर सिमटने लगा। अब वह फैल भी रहा था, और सिकुड़ भी रहा था। इच्छा उसे बाहर खींचती थी, भय उसे भीतर खींच लेता था। और इन दोनों के बीच एक अदृश्य तनाव जन्म लेता रहा। यह तनाव अभी पीड़ा नहीं था, परन्तु पीड़ा की सम्भावना का आरम्भ था। अब अनुभव केवल अनुभव नहीं रहा था। वह एक जोखिम बन गया था। हर चाहना अब अपने भीतर खोने का डर भी लेकर आने लगी। और इसी युग्म में चित्त ने पहली बार सुरक्षा को अर्थ दिया। अब वह केवल अनुभव नहीं चाहता था वह स्थायित्व चाहता था। परन्तु स्थायित्व का कोई आधार नहीं था। क्योंकि सब कुछ प्रवाहित था। और जो प्रवाहित है, उसे रोकने का प्रयास ही संघर्ष को जन्म देता है। किन्तु अभी संघर्ष नहीं था। केवल उसकी तैयारी थी। भय ने चित्त को अधिक केन्द्रित कर दिया। अब वृत्तियाँ पहले से अधिक तीव्र हो गईं। कुछ वृत्तियाँ सुरक्षा खोजने लगीं, कुछ वृत्तियाँ नियंत्रण चाहने लगीं, कुछ वृत्तियाँ भागने लगीं। और इस पूरे आन्तरिक परिवर्तन में एक नया केन्द्र उभरने लगा जो कहता था: मैं सुरक्षित रहूँ। यह मैं अभी पूर्ण नहीं था। परन्तु अब वह केवल अनुभवकर्ता नहीं रहा था। वह रक्षक बनने की ओर झुक रहा था। और इसी झुकाव में चित्त धीरे-धीरे एक ऐसे क्षेत्र में प्रवेश कर रहा था जहाँ इच्छा और भय एक ही सिक्के के दो पहलू बन गए थे। अब जीवन केवल प्रवाह नहीं रहा। वह सतर्कता बन गया था। और इस सतर्कता के भीतर पहली बार बंधन का वास्तविक बीज अंकुरित हुआ। किन्तु यह बंधन अभी स्पष्ट नहीं था। यह केवल भीतर की एक गहरी सिहरन थी कि कुछ भी खो सकता है। और जहाँ यह सिहरन जन्म लेती है, वहीं से आगे चलकर सम्पूर्ण संघर्ष का प्रारम्भ होता है... # अहं का स्थिरीकरण भय अब चित्त में अकेला नहीं था। वह निरन्तर इच्छा के साथ जुड़ा हुआ था। इच्छा कहती थी यह चाहिए। भय कहता था यह खो न जाए। और इन दोनों के बीच चित्त लगातार संतुलन खोजने लगा था। परन्तु यह संतुलन स्थिर नहीं हो पा रहा था। क्योंकि जिस क्षण कुछ प्राप्त होता, उसी क्षण उसके खोने की सम्भावना और अधिक स्पष्ट हो जाती। और इस बढ़ती अस्थिरता में एक नया झुकाव जन्म लेता है कि यदि मैं नियंत्रित करूँ, तो शायद यह स्थिर रह सके। यह मैं अभी पूर्ण रूप से निर्मित नहीं था। परन्तु अब वह केवल अनुभव का केन्द्र नहीं रहा था। वह धीरे-धीरे कर्ता बनने लगा था। अब चित्त केवल देख नहीं रहा था, वह हस्तक्षेप करने की ओर झुक रहा था। और इसी हस्तक्षेप की प्रवृत्ति में पहली बार कर्तृत्व का बीज पड़ा। अब अनुभव अपने आप नहीं हो रहा था उसे सँभाला जा रहा था। जो सुखद था, उसे बढ़ाने का प्रयास। जो असुखद था, उसे रोकने का प्रयास। और यह प्रयास जितना बढ़ता गया, उतना ही मैं कर रहा हूँ का भाव गहरा होने लगा। यह भाव अभी स्पष्ट विचार नहीं था। यह केवल एक अनुभवात्मक केन्द्र था कि घटनाएँ मेरे कारण व्यवस्थित हो रही हैं। और जहाँ यह अनुभव गहराता है, वहीं अहंकार की नींव स्थापित होने लगती है। अब वृत्तियाँ केवल सक्रिय नहीं थीं। वे मेरे द्वारा नियंत्रित होने लगी थीं। और नियंत्रण का यह अनुभव चित्त को एक अस्थायी स्थिरता देता था। परन्तु यह स्थिरता वास्तविक नहीं थी। यह केवल एक संगठित भ्रम था। क्योंकि भीतर सब कुछ अब भी प्रवाहित था। फिर भी चित्त ने इस प्रवाह को मैं संभाल रहा हूँ कहना आरम्भ कर दिया। और इस कथन के साथ पहली बार एक सूक्ष्म गर्व जन्म लेता है। गर्व किसी बाहरी उपलब्धि का परिणाम नहीं था। यह भीतर के नियंत्रण की अनुभूति से उत्पन्न हुआ था। अब मैं केवल अनुभवकर्ता नहीं था। वह व्यवस्थापक बन रहा था। और इसी परिवर्तन में चित्त के भीतर एक नया केन्द्र स्थिर होने लगा जो हर अनुभव को अपने संदर्भ में रखने लगा। अब हर वृत्ति उस मैं के चारों ओर घूमने लगी। और यह मैं धीरे-धीरे एक धुरी बन गया। किन्तु यह धुरी स्थिर नहीं थी। यह केवल स्थापित हो रही थी। फिर भी इसी स्थापना में अहंकार का प्रथम स्पष्ट आकार जन्म ले रहा था। अब अनुभव केवल घटित नहीं हो रहा था। वह मेरे साथ और मेरे कारण घटित हो रहा था। और यही सबसे सूक्ष्म परिवर्तन था। क्योंकि अब चित्त ने स्वयं को केवल एक साक्षी नहीं माना था। उसने स्वयं को कारण मानना आरम्भ कर दिया था। और जहाँ कारण का भाव जन्म लेता है, वहीं कर्म, कर्ता और फल का सम्पूर्ण चक्र भी अंकुरित होता है। अभी यह चक्र पूर्ण नहीं था। परन्तु उसकी गति आरम्भ हो चुकी थी। और इस गति के भीतर अदृश्य रूप से सम्पूर्ण कुरुक्षेत्र का बीज पहली बार स्पष्ट रूप से धड़कने लगा था... # अहं का पोषण और पहचान का निर्माण अब मैं करता हूँ केवल एक अनुभूति नहीं रहा था। वह एक स्थिर केन्द्र बन चुका था। और स्थिरता के साथ एक नई आवश्यकता जन्म लेती है अपनी पुष्टि की आवश्यकता। अब चित्त केवल अनुभवों को नियंत्रित नहीं कर रहा था, वह उन्हें अपने अर्थ में ढालने भी लगा था। जो भी घटित होता, वह अब उस मैं की पुष्टि करता हुआ प्रतीत होता। और जो उस मैं की पुष्टि नहीं करता, वह धीरे-धीरे अस्वीकार्य लगने लगता। इसी सूक्ष्म चयन में पहली बार स्व-छवि का निर्माण होने लगा। अब मैं कौन हूँ एक खुला प्रश्न नहीं रहा था। वह धीरे-धीरे एक उत्तर में बदलने लगा एक ऐसा उत्तर जिसे चित्त बार-बार अपने अनुभवों से सत्यापित करने लगा। और जब कोई अनुभव उस उत्तर के अनुकूल होता, तो भीतर हल्की-सी संतुष्टि जन्म लेती। यह संतुष्टि केवल सुख नहीं थी। यह पहचान की पुष्टि थी। किन्तु जहाँ पुष्टि होती है, वहीं अस्वीकृति की सम्भावना भी जन्म लेती है। अब चित्त केवल अनुभव नहीं कर रहा था। वह अनुभवों को वर्गीकृत भी कर रहा था यह मेरे अनुरूप है यह मेरे विरुद्ध है और इसी वर्गीकरण में पहली बार अलगाव गहरा होने लगा। अब वृत्तियाँ केवल आन्तरिक गतिविधियाँ नहीं थीं। वे मैं के सापेक्ष मापी जाने लगी थीं। और जो वृत्ति मैं को पुष्ट करती थी, वह प्रिय बन जाती थी। जो मैं को चुनौती देती थी, वह असहज लगती थी। इस प्रकार चित्त ने अपने ही भीतर एक सूक्ष्म व्यवस्था बना ली एक ऐसा केन्द्र जो स्वयं को बनाए रखने के लिए हर अनुभव को अपने अनुसार मोड़ने लगा। और इसी मोड़ने में पहचान कठोर होने लगी। अब मैं केवल केन्द्र नहीं था। वह एक छवि बन रहा था। और छवि जितनी स्पष्ट होती गई, उतनी ही सीमित भी होने लगी। क्योंकि स्पष्टता हमेशा अनंतता को सीमित करती है। अब चित्त स्वयं को अनुभव नहीं कर रहा था वह स्वयं को जानने लगा था। और यह जानना एक स्थिर धारणा में बदलने लगा। कि मैं ऐसा हूँ। मैं वैसा हूँ। मैं ऐसा नहीं हूँ। और इन वाक्यों के बीच अनुभव की विशालता सिकुड़ने लगी। किन्तु इसी सिकुड़न में पहली बार एक व्यक्तित्व आकार लेने लगा। अब वृत्तियाँ केवल आती-जाती घटनाएँ नहीं थीं। वे इस व्यक्तित्व के चारों ओर संगठित होने लगीं। और यह संगठन अहंकार को और अधिक दृढ़ बनाता गया। अब मैं केवल अनुभवकर्ता नहीं था। वह एक परिभाषा बन चुका था। और जो भी इस परिभाषा को चुनौती देता, वह भीतर अस्वीकार पैदा करता। इस प्रकार चित्त धीरे-धीरे अपने ही बनाए हुए ढाँचे में रहने लगा। और यह ढाँचा उसे सुरक्षा भी देता था, और सीमित भी करता था। परन्तु उसे यह सीमितता दिखाई नहीं देती थी। उसे तो केवल यह अनुभव होता था कि मैं मैं हूँ। और इसी अनुभव के भीतर अब आगे चलकर सम्पूर्ण कथा के पात्र जन्म लेंगे कोई इस मैं को फैलाएगा, कोई इसे तोड़ेगा, और कोई इसे पार कर जाएगा। पर अभी कुछ नहीं था। केवल एक स्थिर होता हुआ केन्द्र था जो स्वयं को समझने के प्रयास में धीरे-धीरे स्वयं को खोने की तैयारी कर रहा था... # अपूर्णता का अनुभव अब मैं स्पष्ट था। उसकी एक छवि बन चुकी थी। उसकी एक परिभाषा भी स्थापित हो चुकी थी। किन्तु इस स्पष्टता के भीतर एक सूक्ष्म अस्थिरता छिपी हुई थी। क्योंकि जितना अधिक मैं स्पष्ट होता गया, उतना ही वह सीमित भी होता गया। और जहाँ सीमा जन्म लेती है, वहीं अपूर्णता का अनुभव धीरे-धीरे उभरता है। अब चित्त स्वयं को जानने लगा था पर यह जानना पूर्ण नहीं था। कुछ भीतर अब भी अनजाना था। कुछ अभी भी बाहर छूट रहा था। और इसी छूटने की अनुभूति में पहली बार एक हल्की-सी कसक जन्म लेती है। यह कसक अभी दुःख नहीं थी। यह दुःख की प्रारम्भिक परछाईं थी। जैसे क्षितिज पर सूर्य से पहले हल्की लाली फैलती है, वैसे ही भीतर एक सूक्ष्म रिक्तता फैलने लगी। अब मैं हूँ पर्याप्त नहीं लग रहा था। उसके भीतर एक अनकहा प्रश्न जन्म ले रहा था क्या मैं और हो सकता हूँ? और इस प्रश्न के साथ वर्तमान स्वयं पर पूर्ण नहीं रहा। वह अधूरा प्रतीत होने लगा। अब वृत्तियाँ केवल प्रतिक्रिया नहीं थीं। वे इस अधूरेपन को भरने की चेष्टा करने लगीं। कुछ वृत्तियाँ अधिक पाने की दिशा में मुड़ गईं। कुछ अधिक सुरक्षित होने की ओर। कुछ स्वयं को सिद्ध करने में लग गईं। और इसी प्रयास में पहली बार अपूर्णता को भरने की दौड़ जन्म लेती है। अब चित्त केवल नियंत्रित नहीं कर रहा था। वह सुधार भी करना चाहता था। और सुधार की इस प्रवृत्ति में जैसा हूँ और जैसा होना चाहिए के बीच पहला अन्तर स्पष्ट होने लगा। यह अन्तर बहुत सूक्ष्म था। परन्तु यही आगे चलकर सम्पूर्ण संघर्ष का आधार बनेगा। अब मैं केवल अस्तित्व नहीं था। वह एक परियोजना बन चुका था। एक ऐसी परियोजना जो स्वयं को लगातार पूर्ण करने का प्रयास कर रही थी। किन्तु इस प्रयास में वह अपने वर्तमान को स्वीकार नहीं कर पा रही थी। और जहाँ अस्वीकार जन्म लेता है, वहीं भीतर एक तनाव उत्पन्न होता है कि यह पर्याप्त नहीं है। यह पर्याप्त नहीं है यह वाक्य अब भीतर गूंजने लगा। और इसी गूंज में पहली बार हल्का-सा दुःख जन्म लेता है। यह दुःख किसी घटना का परिणाम नहीं था। यह स्वयं पहचान की सीमाओं से उत्पन्न हुआ था। अब चित्त अपने ही बनाए केन्द्र में पूर्ण रूप से सहज नहीं था। वह अपने ही स्वरूप को बदलने के प्रयास में स्वयं से थोड़ा दूर हो गया था। और इस दूरी में पहली बार एक सूक्ष्म अकेलापन जन्म लेता है। यह अकेलापन किसी बाहरी व्यक्ति का अभाव नहीं था। यह अपने ही भीतर पूर्णता की अनुपस्थिति थी। किन्तु अभी यह स्पष्ट रूप से समझा नहीं गया था। यह केवल अनुभव किया जा रहा था। और इसी अनुभव के भीतर अब अगला चरण प्रतीक्षा कर रहा है जहाँ यह अपूर्णता इच्छा, भय और संघर्ष का वास्तविक आधार बनेगी। अभी सब शांत था। परन्तु यह शांति अब पहले जैसी नहीं थी। इसके भीतर एक कम्पन था जो धीरे-धीरे पूरे अन्तःकुरुक्षेत्र को जागृत करने की तैयारी कर रहा था... # साक्षी की ओर लौटना अब चित्त के भीतर सब कुछ निर्मित हो चुका था। स्पन्दन से लेकर स्मृति तक, इच्छा से लेकर भय तक, और अहं के स्थिरीकरण तक सब कुछ अपनी-अपनी जगह स्थापित हो चुका था। और फिर भी इस सम्पूर्ण निर्माण के भीतर एक सूक्ष्म प्रश्न अब भी जीवित था कि यह सब किसमें घटित हो रहा है? जिस मैं ने स्वयं को अनुभवकर्ता, कर्ता और पहचान के रूप में जाना था, अब वही मैं अपने ही निर्माण को देखने लगा था। और देखने की इस क्रिया में वह स्वयं से थोड़ा पीछे हट गया। अब अनुभव पहले की तरह भीतर से नहीं उठ रहे थे वे जैसे किसी दूरी से देखे जा रहे थे। और इसी दूरी में पहली बार एक ऐसा मौन जन्म लेता है जिसमें कोई इच्छा नहीं थी, कोई भय नहीं था, कोई मैं भी नहीं था। यह मौन खाली नहीं था। यह पूर्ण था। क्योंकि अब जो भी उत्पन्न हो रहा था, वह इस मौन के भीतर ही उत्पन्न हो रहा था। और यह मौन किसी अवस्था का नाम नहीं था। यह स्वयं वह आधार था जिसमें अवस्थाएँ आती-जाती थीं। अब चित्त के सभी निर्माण एक-एक करके स्पष्ट होने लगे कि इच्छा भी देखी जा सकती है, भय भी देखा जा सकता है, अहं भी देखा जा सकता है। और जो देखा जा सकता है, वह देखने वाला नहीं हो सकता। इस सरल-सी अनुभूति में सम्पूर्ण संरचना पहली बार ढीली पड़ने लगी। अब मैं अपने ही भीतर एक वस्तु की तरह प्रतीत होने लगा। और जैसे ही मैं वस्तु बना, वैसे ही उसके ऊपर से अधिकार धीरे-धीरे गिरने लगा। अब न कोई केन्द्र था, न कोई परिधि। केवल एक व्यापक साक्षीभाव था जो किसी प्रयास से नहीं, स्वतः प्रकट हो रहा था। यह साक्षीभाव किसी उपलब्धि का परिणाम नहीं था। यह सभी उपलब्धियों के पीछे का आधार था। अब जो भी जन्म लेता था, वह इसी में जन्म लेता था। और जो भी लय होता था, वह इसी में लय होता था। अब चित्त ने पहली बार देखा कि जिसे वह मैं समझता था, वह केवल एक प्रवाह था। और जिसे वह जीवन समझता था, वह केवल वृत्तियों का खेल था। परन्तु इन दोनों को देखने वाला कभी बदलता नहीं था। और उसी न बदलने वाले में अब सम्पूर्ण चित्त-विज्ञान अपना अन्त पा रहा था न किसी समाप्ति के रूप में, बल्कि एक आधार के रूप में। अब न कोई निर्माण शेष था, न कोई प्रश्न आवश्यक था। केवल एक मौन था जो कहता नहीं था, पर सब कुछ धारण करता था। और इसी मौन में चित्त-विज्ञान विलीन हो गया ताकि आगे जो कथा उठे, वह किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि उसी साक्षी की दृष्टि में घटित हो... **क्रमशः**