Wise Words
कविता संग्रह -५
अमिताभ
**१.प्रमाण साक्षी का...** बस यही है प्रमाण कि मैं बदलता नहीं। साथ हूँ मैं सभी के पर साथ चलता नहीं। तुम्हे मेरी है तलाश पर मैं मिलूंगा नहीं। जो मिला मैं तो फिर तुम रहोगे नहीं। जले सारी दुनिया पर मैं जलता नहीं। बस यही है प्रमाण कि मैं बदलता नहीं। जो मुझे देख ले कहीं ऐसी आँखें नहीं। पर तुम्हें मैं सदा देखता ही तो हूं, बस देखता हूं, मैं तो कुछ करता नहीं। बस यही है प्रमाण कि मैं बदलता नहीं। दो कदम तुम चलो , मैं सदियों चलूं, जो तुम मुझको मिलो तो तुम मैं ही तो हूँ। तुम मुझमें हो, मैं कहने से डरता नहीं बस यही है प्रमाण कि मैं बदलता नहीं। **२.जीव की व्यथा** कैसे होगा विकास, क्या करूं मैं प्रयास, सोचता ही रहूं मैं बस यही दिनों रात। भागता ही रहूंगा या रुकूंगा कभी मुझको, मैं मिलूंगा कभी, कब पूरी होगी आस। इस संसार में कुछ भी ठहराता नहीं। जो अभी है न जाने कल होगा या नहीं। किसपे करूं मैं यकीन किसका थाम लूं मैं हाथ। मेरे गुरु जो मिले तो जानू अब बनेगी कुछ बात। नाम, दाम और काम मैंने भोगे बड़े, सुख कहीं न मिला हाथ खाली पड़े। नहीं बुझती मेरी प्यास इस संसार में, नहीं पाता मैं खुद को किसी आकार में। दुख के दरिया से मुझे निकलना है अब, नहीं आना मुझे अब इस संसार में। थक गया हूँ मैं अब जीवन को ढोते हुए। कब तक रहूंगा मैं इसमें यूहीं रोते हुए। जो अब गुरु हैं मिले जाने दूंगा नहीं, सारा अज्ञान त्याग उनसे ज्ञान लूंगा यहीं। चाहे डांटे या मारे वो कोड़े मुझे। जन्मों जनम अब उन्हें मैं छोडूंगा नहीं। **३. माया की विशेषताएं ** सब रूप में, सब रंग में, सब जीवों के सब अंग में ये। जो है नहीं पर दिखता है कितनी विचित्र है ये। हम देख पाते तीन ही आयाम पर बहुआयामी चित्र हैं ये।। अच्छे बुरे, कुरूप और सुंदर, दिन और रात विकास और विनाश सब लीला है इन देवी की। सारे जगत, लोक, चराचर संसार और सब जीव, अनंत विश्वचित्त की अनुपम परते हैं इन वैदेही की। हम इनकी ही रचना हैं, सब प्रकट रुपों की जननी हैं ये। करें स्वयं का समर्पण और स्वीकार करें तो देती मुक्ति हैं ये। **४. मूलज्ञान** मुख्य ज्ञान कौन सा है? मूलज्ञान ही है मुख्य ज्ञान, सब प्रश्नों का है समाधान, नष्ट हो जाता सब अज्ञान, स्वयं का हो जाता ज्ञान। तीन चरणों में होता है मूलज्ञान, जाने स्वयं को तो हो आत्मज्ञान, मैं कोई अनुभव नहीं है माया का ज्ञान, सब मैं ही मैं कोई और नहीं, है ब्रह्मज्ञान। **५. मैं हूँ अनुभवकर्ता** भला क्यों पेड़ों के जड़ होते उसके मूल, आनंद- सुगंध फैलाते उसके सब फूल, प्रेम- गीत गाती उसकी सब पत्तियां, मीठे फलों में संग्रहीत होता बीज समूल। कैसे नियम से निकलता डूबता सूरज, पर हवा है बहती यदृक्ष्य अनियमित। कौन नियंत्रित करता ऋतुओं का चक्र, हो जाता हूँ भाव- विभोर, रह जाता चकित। कैसे सागर से उठते बादल, बरस बुझाते धरती की तपस, नदियों की धारा बह बह कर, बुझाती जीवों, पेड़ पौधों की प्यास। कौन है इन सबका पालनकर्ता, कौन दुख देता कौन दुखों को हरता। सब प्रश्न गिरे जब हुआ मूलज्ञान, नहीं मैं कोई अनुभव, मैं हूँ अनुभवकर्ता।।
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