ज्ञानाक्षर
बारिश आई बारिश आई
निशिगंधा क्षीरसागर
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बारिश आई। बारिश आई l पात्र सारे भर गई l कुछ घडे कुछ सुराई खाली थे l खाली पात्र भर गये l अमृतमई हो गये l बारिश आई। बारिश आई l पात्र सारे भर गई l .....!!!! कुछ बर्तन हांडे उलटे थे l बारिश आई। बारिश आई l पात्र सारे भर गई l उलटे हांडे रिक्त रहे l अमृत सारा बहा दिये l.......!!!! कुछ कटोरे कुछ पतिले.. ढके थे ढके रहे l बारिश आई। बारिश आई l पात्र सारे भर गई l कटोरे पतिले ढके रहे l अमृत सारा जाया किंये l.....!!! बाकी के कुछ बर्तन जो पहले से हि भरे थे, जो पहले से भरे थे, अपने आप में मस्त थे और जो ढके हुवे थे वो भी बडे सुस्त थे एक बूँद भी न ले सके.......!!! बारिश आई। बारिश आई l पात्र सारे भर गई l वर्षा सब पर कर गई l कुछ उसको पा लिये कुछ उसे गवां दिये....!!! अपने विचार अपनी मान्यता मेरा मत मेरी अवधारणा मै मेरी कीं सारी संकल्पना हांडे में दम जोश था खुद हि पर भरोसा था भेद का कुडा लिये खुश था बारिश आई बरसकर चली गई अज्ञानी हांडे जस के तस कुछ समेंट हि ना पाये....!!! कुछ घडे टूटे थे हलकी छेद लिये थे अमृत भरा दिखा रहे धीरे धीरे खाली हुवे अमृत कीं झडी हुई टिप टिप बह गई कुछ सहेजकर रख ना पाई बारिश आई बारिश आई बरसकर चली गई अज्ञानी खुद से बेबस था विष को अमृत माना विषयो में रमा रहा गुरुवाणी का अमृत बरसा पानी सारा अमृत था भांडे मात्र का भेद था मै मै जो करता रहा l भिगकर भी सुखा हि रहा l बारिश आई। बारिश आई l बरसकर बरसकर दिन रात जो सबको भिगा ना पाई...!!! जो पहले से हि थे भरे ... अमृत को ना ले सके .... अपने "मैं" से भरे थे । उसी से जो खुश थे अमृत कैसे पाते भले?? बारिश आई। बारिश आई l पात्र सारे भर गई l वर्षा सब पर कर गई l फिर भी कुछ पात्र एवं घडे वैसे के वैसे हि रहे l बस्स खाली थे खाली रहे l बारिश आकर भिगो गई भिगाकर भी सुखा छोड गई.....!!! सुनने के लिये दो कर्ण श्रवण साधन के पात्र बने दो कर्ण दुबारा सुनने के लिये गुरुवाणी स्वीकार करने लिये लेकिन कोई सुनता नहीं सुनकर ग्रहण करता नही बरस बरसकर अमृत कीं झडी निकल जाती पतली गली बारिश आई बारिश आई अमृत का झरना बहा गई कौन तय्यार परख गई....!!! कुछ होते है उलटे घडे विपरीत दृष्टी उलटे समझते अपनी हि जो रट लगाते सुनते नहीं बोलते जाते अपनाही मत दोहराते रहते उथले पानी में उछाल उथले बर्तन भर ना सके अमृत को समेंट ना सके भांडे भांडे में भेद दिखता परिणाम से दिख पडता पात्र कैसा है पता चलता पात्र अपात्र पहचान करे ग्रहण करने लायक नहीं वह पात्र है अपात्र ग्रहण करता टिकता नहीं ऐसा पात्र कहते कच्चापात्र कुछ का कुछ हि विपरीत ग्रहण करनेवाला कुपात्र और जैसा जितना मिले उसे वैसा का वैसा ग्रहण और धारण करता सुपात्र सवाल बस रह जाता यही बारिश आई बारिश आई पात्र सारे भर गई अमृत बरखा बरस रही क्या मुझे वह भिगा सकी? एक दिन ऐसा आयेगा टूटेगा और फूट जायेगा घडा मिट्टी हो जायेगा तब अवसर नहीं पायेगा घडेपना से नासमझी मै पना अज्ञान हटाने का एक मौका जीवन रुपी आकार मिला जिंदा रहकर जिसको मिटाना यही तो था अमृत खरा अमृत स्पर्श ज्ञान हि था द्वार जिसका श्रवण था जिसने इसे नहीं पहचाना अमृत द्वार जीवन अमृत उसने व्यर्थ गवा दिया टूटने के बाद जो चुप हुआ.. रिक्त हुआ। वो खाली का खाली रहा l भैस के सामने बीन जैसी व्यर्थ सी हो गई बारिश आई बारिश आई बरस बरस चली गई.....!!!! बारिश में अमृत था हि नहीं वो था पात्र के रिक्त होने में स्वच्छ और शुद्ध होने में ज्ञान शब्दों में था हि नहीं वो था "मैं" को मिटाने में.. मिथ्या अज्ञान हटाने में... अज्ञान आवरण धूल पें अमृत बरसा धूल मिटी मृत हटाया मृत्यू हराया खरा स्वर्ण तो सुनना था जोहरी जैसे परखना था बस्स बुद्धी का खेल था खेल खेल में खेलना था यही सच्चा अमृत था ऋतू चक्र को समझना था काल चक्र को जितना था अमृत तो मै स्वयं था बस समझ कीं देरी थी और प्राप्त कीं प्राप्ती थी बारिश आई बारिश आई पात्र सारे खाली करो धुलकर साफ स्वच्छ करो ढककन हटाकर खुले रखो दरार छेदो को भर दो बाकी अपने आप हो रहा अमृत गुरुमुख से छलक रहा अमृत पाओ अमृत पिलो कानो से यह पिया जाता अनमोल अमृत जतन करो हृदय में समेट लो आनंद उठाओ जीsलो जीsलो....!!! ज्ञान वर्षा आई आई भीज लो भीज लो....!!! पात्र में क्या भरा?? और पात्र कितना भरा??? देख लो देख लो.... बारिश आई बारिश आई अमृत कीं बरखा लाई.... पात्र सारे भर गई ....!!! पात्र सारे भर गई