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जगत
शैल
जगत जो मेरा अनुभूत सत्य है, मुझ में ही मुझसे अभिव्यक्त है। मेरा विस्तार शरीर तक नहीं, जहां तक मेरी कल्पना जाती वहां तक केवल मैं ही था। अन्य कोई नहीं!!! ज्ञान और अज्ञान से परे, आनंद और विषाद से परे। मेरे लिए सूरज कभी डूबा ही नहीं, क्योंकि वह उगा ही हुआ था। हमेशा से!!! जहां शब्द छोटे पड़ गए, मुझे समेटने के लिए। क्योंकि पकड़ने के लिए, कुछ तो होना चाहिए था। और मैं होने, न होने, और दोनों के अभाव से परे, अस्मिता मात्र अभी और यहीं था! नहीं, कभी और कहीं, बस अभी और यहीं!!! मेरा "कुछ नहीं" हो जाना, जो था, और जो नहीं था, सब उस कुछ नहीं की शून्यता में समाता चला गया। जो था विराट, विशाल, असीम! मुझसे अलग, मेरे बाहर, मेरे सिवा, सब _ उस कुछ नहीं की सूक्ष्मता में, विलीन हो गया हो जैसे!!! जैसे बूंद में सागर सिमट आया हो, समय और स्थान की सभी सीमाएं, मिटती पिघलती गिरती, और फिर बनती, बिना किसी समय में, बिना धरातल के, चित्ताकाश के कल्पित आनंद में, घुल गया हो जैसे!!! जैसे सुख दुःख दोनों मिलकर जीवन है बनता, जैसे एकबारगी सिक्के के दोनों पहलू, एक साथ प्रगट हो गए हों। जैसे प्रगट और अप्रगट अस्तित्व का द्वैत समाप्त हो गया हो!!! इस होने और न होने के भाव में, जो होकर भी नहीं था, और जिसका आभाव भी नहीं था। भाव और अभाव दोनों वही था, वहीं था! जो न होकर भी वही था सभी में, कभी और कहीं नहीं, अभी और यहीं था! बस मेरा होना ही एक मात्र सत्य था!!! अभी और यहीं, बस अस्मिता मात्र!!!!
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