ज्ञानाक्षर
अज्ञान ही अशांति है।
दिप्तज्योती
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मन का शांत होना यह एक बहुत बड़ी प्रक्रिया है, आध्यात्मिकता की दृष्टि में क्यों?? क्योंकि हमारे अंदर हजारों विचार आते हैं और जाते हैं।। हम देख नहीं पाते और अचानक से किसी एक विचार के पीछे बिना सोचे समझे चल पडते हैं और अनेकानेक ,अजीब अजीब सी जीवन की घटनाएं घटने लगती है परंतु जब हम शांत होते हैं, तो हम स्पष्टता से देख पाते हैं, की कितने विचार आए और कितने विचार चले गए,, पर क्या ये उपयोगी था जीवन के लिए।। क्या जरूरी था जीवन के लिए।। आप स्थिर बैठ करके देखेंगे तो आपको पता चलेगा कि यहां पर बहुत ही आवश्यक कार्य आपके द्वारा करवा लिया जाता है।। अति आवश्यक इतनी पूर्णता से आएगा,, प्रवाह से यह आएगा की शरीर को उठकर वह कार्य करना ही होगा।। बाकी सारे कार्य विचार के रूप में आएंगे और चले जाएंगे ।।इससे यह पता चलता है कि यहां पर हजारों अनावश्यक कार्य में हम बहते रहते हैं।। अति आवश्यक कार्य प्रकृति द्वारा स्वयं ही करवा लिया जाता है।। जीवन में सुकून शांति को ढूंढने तो हम चलते हैं,, पर ढूंढना कम सुकून शांति को अव्यवस्थित कर लेते हैं ।।और अशांति को ही प्राप्त अज्ञानता वश कर लेते हैं।। इसीलिए ज्ञानी जन हमें जीवन को कैसे जीना है,, यह सीखाते हैं क्योंकि जीवन शांतिपूर्ण तरीके से जीने की कला है।। जीव जंतु जैसे प्रकृति का हिस्सा है और उन्हें कोई परवाह नहीं ,उनके भोजन का इंतजाम प्रकृति ने देकर रखा है।। और वह सहज जीवन जी कर चले जाते हैं।। पर मानव को इतनी अशांति के कारण ही, इतनी चाहतों के कारण ही, शांति को ढूंढने की जरूरत पड़ती है क्योंकि उसने अशांति को खुद ही खड़ा कर लिया है।। जबकि जीवन बहुत ही सहज है।। हम भाव के पीछे भागते हैं,, भाव भी मोह प्रेम के रूप में आता है और दुख दे जाता है।। जबकि यह आ रहा है और यह जा रहा है।। इतना हीदेख लेने से आपको अपने आनंद स्वरूप का पता चल जाता है की ना यहां कोई भाव है, ना यहां कोई भवसागर है, ना यहां कोई विचार है और ना ही कोई संसार है ।।सब झूठ-के खेल बस रचा है और हम इसमें मैं मेरा करके फंसे हुए हैं।।