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वाद-विवाद विपदा (हिन्दी )
रोशन
वाद-विवाद विपदा *यह सामग्री पूज्य गुरु तरुण प्रधान जी के मूल अंग्रेज़ी आलेख "Debate Disaster" का विनम्रतापूर्वक किया गया भाषांतरण मात्र है; किसी भी त्रुटि हेतुक्षमाप्रार्थी हैं, और इस प्रयास का एकमात्र लक्ष्य गुरु के ज्ञान का संरक्षण एवं प्रसार करना है।* यह लेख ज्ञान के अन्वेषकों हेतु है, जो अपेक्षाकृत नवीन हैं और विषाक्त वाद-विवादों के जाल में कभी-कभी अनजाने में फँस जाते हैं। **वाद-विवाद अथवा तर्क ** सरल शब्दों में, यह दो पक्षों (या व्यक्तियों) के मध्य होने वाला वार्तालाप है, जिसका लक्ष्य किसी प्रस्ताव को सिद्ध अथवा असिद्ध करना होता है। वह प्रस्ताव दर्शनशास्त्र या विज्ञान का कोई विषय हो सकता है अथवा कोई लौकिक (संसारिक) विषय, जैसे कि किसी अपराध हेतु अभियुक्त होना इत्यादि। सामान्यतः, एक मध्यस्थ (अथवा संचालक या न्यायाधीश) होता है और वाद-विवाद की समाप्ति पर वह यह निर्धारित करता है कि कौन विजयी हुआ और क्या सिद्ध हुआ। इसका परिणाम (आशा है कि) किसी विशिष्ट क्षेत्र में प्रगति होती है। **प्राचीन परिपाटियाँ** वाद-विवाद एक प्राचीन कला है। आपने अवश्य ही राजाओं के न्यायालयों (दरबारों) में समस्त प्रकार के विषयों पर होने वाले वाद-विवादों के विषय में सुना होगा। इसमें राजा की रुचियों के आधार पर दर्शनशास्त्र, धर्म तथा आध्यात्मिक विषयों पर भी वाद-विवाद सम्मिलित था। यह प्राचीन विश्वविद्यालयों तथा सम्भवतः गुरु के अधीन कुछ आश्रमों में भी आयोजित होता था। वाद-विवाद के मूलभूत सिद्धान्तों का विस्तृत वर्णन न्याय दर्शन में किया गया है, जिसमें ज्ञान के साधन, तर्कशास्त्र तथा प्रमाण अथवा साक्ष्य क्या है, यह सम्मिलित है। ज्ञानमार्ग के प्रत्येक साधक को इसके विषय में अवश्य अध्ययन करना चाहिए; यह हम सबके लिए एक अनिवार्य पठन है। कई हजारों वर्षों तक, यह किसी प्रस्ताव को सिद्ध करने अथवा किसी अन्य के प्रस्तावों या सिद्धान्तों का खंडन करने का एक महत्त्वपूर्ण (किन्तु अनिवार्य नहीं) साधन था। यह विज्ञान, न्यायपालिका, नीतिशास्त्र, दर्शनशास्त्र तथा अध्यात्म की प्रगति में योगदान देता है। कुछ परम्पराएँ अब भी वाद-विवाद को प्रोत्साहित करती हैं, किन्तु अधिकतर यह विलुप्त हो गया है अथवा विखरा हुआ प्रतीत होता है और अब केवल न्यायालयों तक ही सीमित है। कभी-कभी हमें विद्यालयों अथवा विश्वविद्यालयों में कुछ वाद-विवाद प्रतियोगिताएँ देखने को मिलती हैं, जो कुछ हद तक एक खेल के समान होती हैं। वाद-विवाद संसदों में भी शक्ति प्रदर्शित करने अथवा निर्णयों को प्रभावित करने हेतु होते हैं। **समकालीन परिदृश्य ** आधुनिक काल में 'वाद-विवाद' शब्द ने एक नकारात्मक अर्थ ग्रहण कर लिया है। जो बालक अपने माता-पिता के साथ वाद-विवाद अथवा तर्क करते हैं, उन्हें अशिष्ट मानकर फटकार लगाई जाती है अथवा दण्डित किया जाता है। ये सिद्धांत स्थापनाएँ बहुत जल्दी ही हो जाती हैं। विद्यालयों इत्यादि में शिक्षकों के साथ तर्क करने वाले छात्रों को निष्कासित कर दिया जाता है अथवा दण्ड दिया जाता है। जो विद्यार्थी दूसरों से तर्क करते हैं, उन्हें आक्रामक और हिंसक के रूप में देखा जाता है, और कोई भी उनसे दोस्ती नहीं करना चाहता। और इसी प्रकार। अधिकांश वाद-विवाद अब किसी का अपमान करने, उत्पीड़न करने, विवश करने अथवा दबाव डालने का एक माध्यम बन गए हैं। वाद-विवादों के कारण अत्यन्त कटु कलह , नकारात्मकता, घृणा उत्पन्न होती है, और हारने वाले सामाजिक चिन्ता, भय, हीन भावना और आत्मविश्वास की कमी से ग्रस्त होते हैं। प्रायः विजयी व्यक्ति भी सबके द्वारा घृणा का पात्र बनता है, अहंकार से भर जाता है और उस पशु के समान व्यवहार करता है जिसने अभी-अभी एक समूह के संघर्ष में दूसरे पशु को पराजित किया हो। विशेष रूप से, दार्शनिक सन्दर्भ में, क्षेत्र की प्रगति अथवा सीखने के लिए वाद-विवाद के उपयोग की मूल भावना विलुप्त हो चुकी है। आप अब भी इसके कुछ अवशेष देख सकते हैं, और शायद ही ये वाद-विवाद कोई अन्तर्दृष्टि (Insight) प्रदान करते हैं। सामान्यतः, कुछ भी सीखा नहीं जाता है, और कोई प्रगति नहीं होती है। इसका कारण मानव बुद्धि और सभ्यता अथवा संस्कृति का ह्रास है। यह वाद-विवाद के अंधकारमय युग हैं। **वाद-विवाद कब करें** कदापि नहीं। परन्तु यदि आप अब भी उत्सुक हैं, तो आप इन परिस्थितियों में प्रयास कर सकते हैं: -जब आपके गुरु आपको ऐसा करने का निर्देश दें। प्रायः यह उनके स्वयं के शिष्यों के साथ होगा। -जब आप अपने प्रतिद्वन्द्वियों को व्यक्तिगत रूप से जानते हों, जैसे कि वे आपके मित्र, सम्बन्धी इत्यादि हों, और जब आप सुनिश्चित हों कि इसके कारण आपके सम्बन्ध उनसे क्षतिग्रस्त नहीं होंगे। -जब यह किसी खेल अथवा प्रतियोगिता के समान हो। -जब यह नितान्त अनिवार्य हो। -जब कोई ईमानदार और तटस्थ मध्यस्थ उपस्थित हो। -जब अन्य पक्ष प्रतिष्ठित, सभ्य और संस्कृत हो। -जब अन्य पक्ष न्याय शास्त्रों के अनुसार वाद-विवाद के नियम जानता हो। (बशर्ते आप भी उन्हें जानते हों) **वाद-विवाद से कब बचें** इसे एक नियम बना लें कि आप कभी भी तर्क अथवा वाद-विवाद नहीं करेंगे, विशेष रूप से दर्शनशास्त्र और अध्यात्म के विषयों पर। -आपको वाद-विवाद में प्रवेश कदापि नहीं करना चाहिए,जबआपके गुरु ने इसे अनुमोदित नहीं किया है। -आपको इसे करने की कोई आवश्यकता नहीं है। -आपको इससे कुछ भी प्राप्त या सीखने को नहीं मिलेगा। -परिणाम का निर्णय करने हेतु कोई मध्यस्थ, न्यायाधीश या तटस्थ तृतीय पक्ष नहीं है। -आपको न्यायाधीश पर विश्वास नहीं है। -विषय अवैध , अनैतिक, अश्लील या विवादास्पद हो। -आप अन्य पक्ष को नहीं जानते हैं (जैसे कि अन्तरजाल या ऑनलाइन समुदायों/समूहों पर)। -आप अपने सहकर्मी, मित्रों, भाई-बहनों, जनकों या सम्बन्धियों से प्रेम करते हैं और इन सम्बन्धों को दूषित नहीं करना चाहते। -आप यह अनुभूति करते हैं कि अन्य पक्ष असंस्कृत, हिंसक, मूर्ख और दुराशय वाला है। -आप देखते हैं कि अन्य पक्ष वास्तव में कुछ भी सीखने में रुचि नहीं रखता है। -अन्य पक्ष भिन्न मार्ग से सम्बन्धित है। -अन्य किसी अन्य गुरु का शिष्य है या शिष्य भी नहीं है। -अन्य पूर्वाग्रह या अंधविश्वासों से परिपूर्ण है। -अन्य व्यक्तिगत अपमान और अशिष्ट भाषा (गालीगलौज) से वार्तालाप आरम्भ करता है। -अन्य ने न्याय शास्त्र के विषय में कभी सुना भी नहीं है। -अन्य अत्यधिक नकारात्मक, द्वेषपूर्ण और विषाक्त है। -अन्य उकसाहट के बिना ही आक्रमण करता है। -वे ट्रोल हैं। -वे आप पर दो या दो से अधिक व्यक्तियों के समूह में आक्रमण करते हैं (जो प्रायः पूर्व-नियोजित आक्रमण होता है)। -पुरस्कार के रूप में धन की एक बड़ी राशि प्रस्तावित है। -वहाँ बाजी लगी है। -आर्थिक या प्रतिष्ठा की हानि की संभावनाएँ हैं। -अन्य किसी शत्रु देश, प्रतिद्वंद्वी समुदाय या व्यापार में प्रतिस्पर्धी इत्यादि से है। -अन्य धार्मिक अतिवादी या किसी राजनीतिक दल से है। -वहाँ हितों का टकराव (Conflict of Interest) है। -कुछ लोग आपको उकसाकर या आपकी दुर्बलताओं को दबाकर सस्ते मनोरंजन के लिए आपका उपयोग करने का प्रयास कर रहे हैं। -कोई वाद-विवाद में आपकी प्रतिक्रिया देखने हेतु आपको हेरफेर तथा शोषण करने का प्रयास कर रहा है। -कोई आपके प्रतिनिधि के रूप में वाद-विवाद करने से लाभ उठाने का प्रयास कर रहा है। -कोई आपको नैतिक कर्तव्य, देशभक्ति इत्यादि के आधार पर तर्क हेतु उकसाता है। -आप खतरा महसूस करते हैं, प्रायः तर्क हिंसक आक्रमणों और हत्याओं की ओर ले जाने वाला पहला कदम होता है। -आप अन्य पक्ष से तुच्छता, प्रतिस्पर्धा, जातिवाद, लोभ, निम्न बुद्धिमत्ता और रक्षात्मकता महसूस करते हैं। -अन्य पक्ष को विषय के बारे में कोई ज्ञान नहीं है। -अन्य पक्ष को वाद-विवाद में गलत जानकारी दी गई थी या हेरफेर किया गया था। -अन्य मस्तिष्क प्रक्षालित (Brainwashed) है या षड्यंत्र सिद्धान्तों या छद्म विज्ञानों (Pseudosciences) में विश्वास करता है। -अन्य स्वयं को श्रेष्ठ घोषित करता है। -अन्य नाबालिग है। -अन्य केवल आपके ज्ञान या धैर्य की परीक्षा ले रहा है। -अन्य आपको हतोत्साहित करने या आपको अपने करियर, कार्य, परियोजना या आध्यात्मिक अभ्यास में सफल होने से रोकने का प्रयास कर रहा है। -अन्य आपके मार्ग और गुरु का अपमान करता है। यह सूची अधूरी है, वाद-विवाद न करने के सौ अन्य कारण हैं। **लाभ ** मेरा व्यक्तिगत मत यह है कि वाद-विवाद के कोई लाभ नहीं हैं। कोई उपयोगी वस्तु कभी प्राप्त नहीं होती। तथापि, एक स्वस्थ वाद-विवाद कभी-कभी निम्नलिखित कर सकता है: -आपकी तार्किक क्षमताओं को उत्तम बनाना -आपको अधिक बुद्धिमान बनाना -आपको आत्मविश्वास से परिपूर्ण बनाना -आप कुछ नया सीखते हैं -आपको यह ज्ञात होता है कि आप मूर्ख हैं -आपको अपनी अज्ञानता का ज्ञान होता है -आपको अपनी तुच्छता का ज्ञान होता है -आपको इसे करने के कटु फल और बुरे कर्मफल प्राप्त होते हैं। -मैंने कभी भी किसी को वाद-विवाद से लाभान्वित होते नहीं देखा है, विशेष रूप से आध्यात्मिक क्षेत्र में। **हानियाँ ** आपने अनुमान लगा लिया होगा कि यह सूची लम्बी है। परन्तु कुछ मुख्य हानियाँ ये हैं: -यह पूरी तरह से बेकार और अनावश्यक है। -दोनों तरफ से कोई कुछ सीख नहीं पाता। -कोई प्रगति नहीं होती। -अगर आप खुद अच्छी तरह जानते हैं कि आप सही हैं, तो यह साबित करने का कोई मतलब नहीं है, खासकर जब सामने वाला मानने को तैयार न हो। -आपको किसी के सामने कुछ भी साबित करने के लिए मजबूर या बाध्य नहीं किया गया है। खासकर, आध्यात्मिक बातें आपका निजी मामला हैं। -अगर कोई अजनबी (या कोई भी व्यक्ति) आपसे सहमत नहीं है, तो कोई फर्क नहीं पड़ता। लोग ज़रूरी नहीं हैं, आपकी खुद की प्रगति ज़रूरी है। आपका समय बहुत कीमती है। -बहुत ज्यादा समय बर्बाद होता है। -कड़वाहट, नकारात्मकता, जहर, दुश्मनी और हिंसा पैदा करता है। -अपराधों और झगड़ों का कारण बनता है। -आप आसानी से अपने गुरु की कृपा खो देंगे। -दोस्त आपका आक्रामक व्यवहार देखकर आपको छोड़ देंगे। -रिश्तों का खराब होना तय है। प्यार कुछ ही मिनटों में नफरत बन जाता है। -कमजोरी (तुच्छता), मूर्खता पैदा करता है और जानवरों जैसी आदतों को भड़काता है। -हारने वाले के लिए बहुत अपमानजनक होता है। -हारने वाला डर जाता है, शर्म और पछतावे से भर जाता है, और सदमे में चला जाता है। -हारने वाला हतोत्साहित होता है, सामाजिक चिंता, हीन भावना और अन्य मानसिक समस्याओं से पीड़ित होता है। -हारने वाला अक्सर सबूत को नहीं मानता, और और ज्यादा संकीर्ण सोच वाला हो जाता है। -हारने वाला बदला लेने की कसम खाता है, और कट्टरपंथी बन जाता है। -हारने वाला अगली बार जीतने के लिए गलत/गैरकानूनी तरीके अपनाता है। -हारने वाले पलटवार की योजना बनाते हैं, अक्सर गलत साबित होने पर भी वे हार नहीं मानते। -हारने वाले आत्मरक्षा में और भी खराब सिद्धांतों, अंधविश्वासों और गलत मान्यताओं से चिपके रहते हैं। -जीतने वाला और ज्यादा अहंकारी, घमंडी और अहंकार से भर जाता है। -जीतने वाला श्रेष्ठता का झूठा एहसास महसूस करता है। -जीतने वाला हर जीत के साथ और ज्यादा आक्रामक होता जाता है और आखिरकार हिंसक बन जाता है। -जीतने वाला दूसरे पक्ष को गुलाम या जानवर जैसा समझता है। -जीतने वाला हारने वाले पर मनमाना दंड लगाता है। *(पुरानी कहानियों में हारने वाले को अपनी संपत्ति, गाय, पत्नी और बेटी तक छोड़ने, उन्हें अपमानित करने और मुँह काला करके गधे पर बिठाने की बात है। -सजा की किस्में इस बात पर निर्भर करती थीं कि जीतने वाला क्या सोच सकता है।)* -जीतने वाला दुश्मन को मार डालता है। *(पुरानी कहानियों में हारने वाले का सिर काटने, जिंदा जलाने, डुबोने या तड़पाकर मारने का वर्णन है। कुछ खुदकुशी भी कर लेते हैं।)* -एक सभ्य विजेता भी फिर भी कुछ नुकसान पहुँचाने की कोशिश करेगा, जैसे कि पैसों का नुकसान। -जीतने वाला दूसरे लोगों पर हमला करना शुरू कर देता है, और जब वह देखता है कि वह दूसरों को आसानी से हरा सकता है, तो वह एक गुंडा (Bully) बन जाता है। -जीतने वाला खुद को सब जानने वाला बताकर कुछ भी नया सीखने से मना कर देता है। -एक जीत भी जीवन भर के लिए संकीर्ण सोच का कारण बन सकती है। प्रगति रुक जाती है। अज्ञानता पक्की हो जाती है। -लोग किसी बेकसूर व्यक्ति को हराने के लिए गिरोह बना लेते हैं। -बहस करने वालों में कोई अच्छा बदलाव नहीं आता। -कोई बेहतर नहीं होता, दोनों पक्ष गिरते हैं। -सामाजिक शांति में बाधा डालता है, राजनीतिक लड़ाइयों का कारण बनता है। **वाद-विवाद से बचने के उपाय:** -मौन रहें। (चुप रहें।) -जवाब न दें। -दूसरे से बात न करें या न मिलें, दूर रहें। -दूसरे को सिखाने या समझाने की कोशिश न करें। -दूसरे को पूरी तरह से अनदेखा कर दें। -ब्लॉक या बैन कर दें। -चुपचाप निकल जाएँ (वहाँ से हट जाएँ)। -अज्ञात लोगों के सामने अपना ज्ञान न दिखाएँ। -अपनी मान्यताओं को दूसरों पर न थोपें। -घमंड न करें। -मूर्ख या अज्ञानी लोगों का अपमान न करें। -गलतियाँ या कमियाँ न बताएँ, जब तक कोई आपसे विनम्रतापूर्वक अनुरोध न करे। -अज्ञात लोगों की आलोचना न करें। -ट्रोलों को चारा न डालें (यानी उन्हें जवाब देकर बढ़ावा न दें)। -जब कोई आपको अपमानजनक तरीके से चुनौती दे, तो गुस्सा न हों या अपनी निम्न प्रवृत्तियों (वासनाओं) के आगे न झुकें। -जब कोई यह सिद्ध करने की कोशिश करे कि आप अज्ञानी हैं, तो सरल रूप से स्वीकार कर लें, विपरीत सिद्ध करने की कोशिश न करें। यह बुद्धिमानी और विनम्रता है, यह शर्मनाक नहीं है। -सामान्य रूप से लोगों से बचें। -चर्चाओं में विवादास्पद विषय न उठाएँ। जब आप किसी को ऐसा करते देखें, तो वह स्थान छोड़ दें। -बेहतर संगति, बेहतर लोग और बुद्धिमान दोस्त खोजें। -विषैले लोगों और सम्बन्धों को तुरन्त छोड़ दें। -वाद-विवाद के लिए उकसाए जाने पर शांत रहें। -जागरूकता में रहें, स्वप्न को साकार होते देखें। -कार्मिक बन्धनों को तोड़ें, जाने दें। -समाज के शोर से दूर, एकान्त में, शांति और आनंद में रहें। ये सुझाव ऑनलाइन बातचीत पर भी लागू होते हैं। **विकल्प ** अब जब आप यह जान गए हैं कि वाद-विवाद कितने खराब होते हैं, तो आप सीखने के साधन के रूप में उनकी प्रभावकारिता पर प्रश्न उठा सकते हैं। यदि आप वास्तव में सीखना चाहते हैं, अथवा अपनी बुद्धिमत्ता या तार्किक क्षमताओं में सुधार करना चाहते हैं, तो इन युक्तियों को प्रयास करें: एक योग्य शिक्षक से विषय को ठीक तरीके से सीखें। -महान गुरुओं, किताबों, तर्कशास्त्रियों और गणितज्ञों का अनुसरण करें। -एक अच्छे वकील से दोस्ती करें। -हर दिन चिन्तन और खुद का निरीक्षण (आत्म-निरीक्षण) करें। -लिखने की आदत डालें। अपने विचारों को लिखकर सामने रखें और उनकी जाँच (समीक्षा) कराएँ। -तर्क में होने वाली गलतियों (Logical Fallacies) के बारे में सीखें। -सोच की कमियों (Cognitive Biases) के बारे में सीखें। -मनोविज्ञान (Psychology) सीखें। मानसिक रूप से बिगड़े लोगों को आसानी से पहचानना और उनसे बचना सीखें। -सवाल पूछकर सीखें। एक शिक्षक बहुत ज़रूरी है। -अपने शक (सन्देहों) को अपने शिक्षक से ही साफ करें, दूसरों से नहीं। -अपने अनुभव से सीखें। -एक साफ जीवन लक्ष्य रखें। दूसरे लोगों को अपना जीवन लक्ष्य न बनाएँ। -गुरु की अनुमति लेने के बाद केवल योग्य साधक को ही सिखाने की कोशिश करें। -प्रेम, दया, अच्छाई और धैर्य को विकसित करें। -अपना ज्ञान पाने के लिए मेहनत करें।मात्र अभ्यास, अभ्यास, अभ्यास । **प्रश्न कैसे पूछें? ** अनेक बार मुझे यह देखकर दुःख होता है कि लोग, यहाँ तक कि साधक भी, प्रश्न पूछना नहीं जानते हैं। उनकी वाद-विवादी मानसिकता समय-समय पर प्रकट होती है। अतः, यहाँ कुछ युक्तियाँ दी गई हैं। -उससे प्रश्न न पूछें जिसे विषय के बारे में कुछ भी पता न हो। -इंटरनेट पर जो कोही लोगों से प्रश्न न पूछें। -प्रश्न की आड़ (छद्मभेषमें) अपने गुरु का अपमान न करें। प्रेम और सम्मान दिखाएँ। -कुछ पूछने से पहले यह प्रदर्शित न करें कि आप कितने महान हैं। विनम्र रहें। -प्रश्न को चुनौती के रूप में प्रस्तुत न करें। -प्रश्न को पहेली के रूप में प्रस्तुत न करें। -अत्यधिक कविता या रूपक (Metaphor) का उपयोग न करें, इसे स्पष्ट और सीधा रखें। -प्रश्न के लिए अतिशयोक्तिपूर्ण या चाटुकारितापूर्ण भाषा का उपयोग न करें। -इसे जितना सम्भव हो उतना छोटा रखें। -व्यक्तिगत या सामाजिक मुद्दों के बारे में प्रश्न न पूछें। -पक्षपाती न बनें। उत्तर को स्वीकार करने के लिए खुले रहें। परन्तु इसकी सत्यता की जाँच करें। -गुरु के पास जाने से पहले एक साधक के गुणों को विकसित करें। -उस गुरु के पास न जाएँ जिसे आप पसंद नहीं करते। -सदैव विनम्रता से प्रश्न पूछें। शिष्टता और संस्कृति दिखाएँ। -केवल बुद्धिमान ही नहीं, शिष्ट होना भी सीखें। -पूछने से पहले प्रश्न के बारे में पर्याप्त समय तक सोचें। अपनी त्रुटियाँ, यदि कोई हों, तो देखें। -बहुत सारे प्रश्न न पूछें। इससे कई लोग चिढ़ जाते हैं। अपनी बारी की प्रतीक्षा करें। -विषय से हटकर प्रश्न न पूछें। मार्ग पर बने रहें। -भाषाएँ न मिलाएँ या अशुद्ध भाषा का उपयोग न करें। पहले इसे सीखें। -स्पष्ट रूप से बोलना सीखें। -उत्तर को समझने का प्रयास करें, समय लें। तुरंत प्रतिप्रश्न पूछना शुरू न करें। -यदि आप उत्तर से असहमत हैं, तो उसे न बताएँ, सरल रूप से उस मार्ग या गुरु को छोड़ दें। -यदि आपको संतोषजनक उत्तर नहीं मिलते हैं और यह बार-बार होता है, तो चुपचाप उस गुरु को छोड़ दें। -गुरु को सिखाने का प्रयास न करें। कोई भी गुरु इसे पसंद नहीं करता। -वह प्रश्न न पूछें जिसका उत्तर आपको पहले से ही पता है। संसार के सभी गुरुओं की राय जमा करने की कोई आवश्यकता नहीं है। -ऑनलाइन बैठकों में, प्रश्न पहले से लिखकर अपना समय बचाएँ। कहिलेकाहीँ यही क्रियाकलापले मात्र पनि तपाईंको उत्तर देखाउन सक्छ। **शिक्षक के लिए आदर ** आपको शिक्षक और उनके शिक्षाओं के लिए अत्यधिक आदर (सम्मान) होना चाहिए। शिक्षक यह बहुत आसानी से भाँप सकते हैं कि आपके मन में आदर नहीं है, या आप दिखावा कर रहे हैं, और तब वे आपको सदैव के लिए टालेंगे। स्मरण रखें, गुरुक्षेत्र सदैव देख रहा है, अपने शिक्षक या किसी अन्य शिक्षक के बारे में उनकी पीठ पीछे अनाप-शनाप (बुरा) बात न करें। वैसे भी, ऐसे शिक्षक से जुड़ने का कोई अर्थ नहीं है जिसे आप पसंद नहीं करते, आप केवल अपना समय तर्क और वाद-विवाद में नष्ट करेंगे, आप कुछ भी नहीं सीखेंगे। सामान्यतः शिक्षक ऐसे छात्रों से छुटकारा पा लेते हैं, भले ही वे बुद्धिमान क्यों न हों, और वे एक योग्य या आज्ञाकारी छात्र को प्राथमिकता देते हैं, भले ही वे अधिक बुद्धिमान न हों। **वरिष्ठ अन्वेषकों के लिए आदर ** सदैव अपने वरिष्ठों का आदर करें, वे निश्चित रूप से आपसे अधिक जानते हैं, उन्होंने निश्चित रूप से आपसे अधिक उपलब्धियाँ प्राप्त की हैं। यह सोचना कि वे भी आप ही की तरह एक छात्र हैं, और उनसे तुच्छ मामलों पर तर्क करना, आपका अपना नुकसान करेगा। वे आपको टालेंगे, और पुनः कभी आपको सलाह या सहायता नहीं करेंगे। आध्यात्मिक वृत्तों में, कोई भी छात्र स्वयं को वरिष्ठ होने का दावा नहीं करता, वे अत्यन्त विनम्र होते हैं, वे यह घोषित करेंगे कि वे कुछ भी नहीं जानते हैं। वे बहुत शालीन होते हैं। कभी-कभी तर्कशील मानसिकता वाला एक नया छात्र इसे उनकी हीन भावना समझता है, क्योंकि वे शेखी नहीं बघार रहे होते हैं, और उनसे बुरा व्यवहार करना प्रारम्भ कर देता है। स्मरण रखें, विनम्रता मूर्खता या दुर्बलता नहीं है। ऐसे लोग शीघ्र ही वरिष्ठों का अनुग्रह (कृपा) खो देते हैं। कुछ भी सदैव छिपा नहीं रहता, और उनमें से कुछ जाकर गुरु को इस प्रकार के व्यवहार के विषय में बताते हैं, जिसके परिणामस्वरूप निष्कासन होता है, और यह बड़ा आध्यात्मिक नुकसान करता है। **सहपाठी का आदर ** सदैव अपने सहपाठीयों का आदर करें। आप उनके समान स्तर पर हैं, आप उनसे उत्तम या श्रेष्ठ नहीं हैं। जब कोई व्यक्ति किसी नए मार्ग, नए आश्रम या नए गुरु से जुड़ता है, विशेष रूप से तब जब उसका कोई पूर्व मार्ग था और उसने कुछ मात्रा में प्रगति तथा अभ्यास किया था, तो वह अपने सहकर्मियों के प्रति दुष्टता प्रदर्शित करने लगता है, उन्हें निम्न मूर्ख घोषित कर देता है। वे घोषणा करेंगे: "दूसरे मार्ग पर मेरा २० वर्षों का अनुभव है, तुम क्या जानते हो?" यह कुछ कठिनाई उत्पन्न कर सकता है। जब आप एक नवआगन्तुक हैं, तो पुरानी बातों को भूल जाएँ, नया मार्ग अपनाएँ, अपनी अनुभव के पन्ने को पूरी तरह से स्वच्छ कर दें। नई शिक्षाओं, नए मार्ग के लिए स्थान बनाएँ। विनम्र रहें और अपनी अज्ञानता को स्वीकार करें। आप यहाँ सीखने आए हैं, दूसरों से यह तर्क करने के लिए नहीं कि आपका पिछला मार्ग कितना महान था या आप कितने बड़े गुरु हैं। सहकर्मी या तो आपसे घृणा करेंगे, या आपसे भयभीत होकर आपको टालेंगे। यह शिक्षक की तीक्ष्ण दृष्टि से छिपा नहीं रह सकता। **कनिष्ठों के लिए आदर और देखभाल ** अपने कनिष्ठों की सहायता करें। स्नेही, देखभाल करने वाले और दयालु बनें, विशेष रूप से युवा लोगों के लिए। आप भी अतीत में वैसे ही थे और आप यहाँ केवल गुरु कृपा के कारण ही पहुँचे हैं। अपने उत्कृष्ट वाद-विवाद कौशल से उन्हें छोटा दिखाने की कोई आवश्यकता नहीं है। उन्हें सिखाने का प्रयास न करें, यह आपका कार्य नहीं है, यह आपके गुरु का कार्य है। आपका कार्य सीखना है, बस। जब आप अपने कनिष्ठों को सिखाना शुरू करते हैं, तो आप यह संकेत दे रहे होते हैं कि गुरु अपना कार्य ठीक से नहीं कर रहे हैं। और यह गुरु को पसंद नहीं आएगा। यदि आपको सिखाना ही पड़े, तो अपने गुरु से अनुमति लें। यहाँ तक कि यदि आप कनिष्ठों की सहायता करना चाहते हैं तो भी आपको पहले अपने गुरु से पूछना चाहिए। सिखाने का कौशल एक बहुत भिन्न क्षमता है, यह सब में नहीं होती। आप अपनी अपरिपक्क शिक्षाओं से किसी कनिष्ठ को हानि पहुँचा सकते हैं। इसके बहुत बुरे परिणाम हो सकते हैं। **निष्कर्ष ** वाद-विवाद निस्सन्देह एक अत्यन्त उपयोगी कौशल है, परन्तु यह वकीलों इत्यादि के लिए उत्तम है, आध्यात्मिक साधक के लिए नहीं। वाद-विवाद और तर्क का समग्र प्रभाव सदैव नकारात्मक होता है। यह कभी भी किसी भी पक्ष में सीखने या सुधार का कारण नहीं बनता। न्याय या तर्कशास्त्र का विस्तृत ज्ञान होना और एक तर्क निर्मित करने तथा उत्तम तर्क का उपयोग करके उसे सिद्ध करने की एक शालीन क्षमता होना बहुत उत्तम है, परन्तु इस क्षमता का उपयोग अपने लाभ और सबके कल्याण के लिए होना चाहिए, न कि वाद-विवाद जीतने के लिए या अपनी बौद्धिक श्रेष्ठता प्रदर्शित करने और दूसरों को अपमानित करने के लिए। आपको उन लोगों के प्रति भी सचेत रहने की आवश्यकता है जो तर्क करते हैं, वे आपके मित्र नहीं हैं, आपका कल्याण उनका लक्ष्य नहीं है, उनके अच्छे इरादे नहीं हैं तो हर कीमत पर उनसे बचें, व्यवस्थित रूप से सीखें, और शांति तथा आनंद में रहें।
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