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साक्षी और माया का अमर प्रेम
स्वप्रकाश
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साक्षी हूँ मैं तू मेरा साया है, सत्य हूँ मैं तू मेरी माया है। आत्मन हूँ मैं तू मेरा साया है, जन्मो जनम में तुझको पाया है ।। मेरी सृष्टि है तू , मेरी अभिव्यक्ति है तू। तेरा दीवाना हूँ मैं, राज़ो की रानी है तू ।। असंख्य रूपों में मैं तेरे लिये ही आता हूँ, तुझको पाकर मैं पूर्ण हो जाता हूँ। तेरे अनुभव के लिए मैंने देह धरी हैं, तेरे बिन मेरी कहानी अधूरी है ।। मुझे जानकर ही तेरा ज्ञान संभव है, मेरे बिना तेरा होना असंभव है। जहाँ भी गया हूँ तुझको ही पाया है, आत्मन हूँ मैं तू मेरा साया है ।। साक्षी हूँ मैं तू मेरा साया है, सत्य हूँ मैं तू मेरी माया है। तू अनुभव तो अनुभवकर्ता हूँ मैं, तू दृश्य तो दृष्टा हूँ मैं। तू बंधन तो मुक्ति हूँ मैं , तू शक्ति तो शिव हूँ मैं ।। तू नाम रूप तो तत्त्व हूँ मैं, तू मिथ्या तो सत्य हूँ मैं । तू चित्र तो पर्दा हूँ मैं, तू माया तो ब्रह्म हूँ मैं ।। तू मार्ग तो मंजिल हूँ मैं, तू लहर तो सागर हूँ मैं । तू घड़ा तो मिट्टी हूं मैं, तू अनित्य तो नित्य हूं मैं ।। साक्षी हूँ मैं तू मेरा साया है, सत्य हूँ मैं तू मेरी माया है। तू परिवर्तन तो पृष्ठभूमि हूँ मैं, तू विभाजन तो एकता हूँ मैं। तू पदार्थ तो शून्यता हूँ मैं, तू सीमित तो अनन्त हूँ मैं ।। एक दूजे के बिन हम दोनों अपूर्ण हैं, तू और मैं मिलकर ही पूर्ण हैं। तेरी आघोष में मैंने खुद को भुला दिया, गुरु ने मुझे मेरा ज्ञान करा दिया ।। साक्षी हूँ मैं तू मेरा साया है, सत्य हूँ मैं तू मेरी माया है। आत्मन हूँ मैं तू मेरा साया है, जन्मो जनम में तुझको पाया है ।। <font color="blue">**सभी सुखी हों, सभी समृद्ध हों, सभी ज्ञानवान हों, सभी मुक्त हों ....**</font> <font color="green">**श्री गुरुवे नमः ....ॐ शांति शांति शांति .....**</font> **आभार:** मैं परम श्रद्धेय गुरुदेव श्री तरुण प्रधान जी एवं गुरुक्षेत्र का उनकी शिक्षाओं एवं मार्गदर्शन के लिए आभारी हूँ। **संपर्क सूत्र..** *साधक की कलम से : स्वप्रकाश.......* *ईमेल: swaprakash.gyan@gmail.com*