ज्ञानाक्षर
जानना और समझना, मान्यताएं और धारणाएं
जितेन्द्र गिरी
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<br><br><div><img width='50%' src='images/62487141-1000288142.jpg'></div><br><br> क्या हम वास्तव में इस जगत को जानते हैं, या अपनी मान्यताओं को मजबूत करते हैं? हमारे जानने और समझने की प्रक्रिया परत दर परत विकसित होती है, हम पहले कुछ बुनियादी बातें सीखते हैं और फिर उन्हीं के आधार पर आगे का ज्ञान अर्जित करते हैं, उदाहरण के लिए, पहले हम अंकों को पहचानना सीखते हैं, फिर जोड़ना, घटाना, गुणा करना और भाग देना सीखते हैं, इसके बाद इन्हीं प्रक्रियाओं के आधार पर क्षेत्रफल, आयतन और गणित की दूसरी जटिल अवधारणाओं को समझते हैं, यह प्रक्रिया क्रमवार चलती है, ऐसा नहीं हो सकता कि हम गिनती जाने बिना जोड़-घटाव की प्रक्रिया को उसी अर्थ में सीख लें। इस प्रकार हमारा नया ज्ञान प्रायः पुराने ज्ञान पर आधारित होता है, लेकिन यहाँ एक महत्त्वपूर्ण प्रश्न उठता है - "यदि हमारे ज्ञान का आधार ही गलत हो, यदि हमारी शुरुआती समझ ही किसी गलत मान्यता पर टिकी हो, तो क्या होगा? क्या उस आधार पर निर्मित हमारा आगे का ज्ञान भी हमें सत्य से दूर नहीं ले जायोगा? इसे एक उदाहरण से समझते हैं। मुझे अपने सामने एक प्राणी दिखाई देता है, जिसके चार पैर, दो सींग और एक पूँछ है, बचपन में मुझे बताया जाता है कि इस प्राणी का नाम 'गाय' है, धीरे-धीरे मैं गाय के बारे में जानकारी एकत्र करता हूँ, किताबें पढ़ता हूँ, दूसरे मनुष्यों के अनुभवों से सीखता हूँ और गाय के शरीर, भोजन, रोग, प्रजनन तथा व्यवहार के विषय में विशेषज्ञता प्राप्त कर लेता हूँ, अब मैं गाय का इलाज कर सकता हूँ, उसके लिए भोजन तैयार कर सकता हूँ और उसकी नस्ल सुधारने के प्रयास भी कर सकता हूँ। इस पूरी प्रक्रिया में मेरा ज्ञान बढ़ा है, मैं पहले की तुलना में गाय के बारे में बहुत अधिक जानता हूँ, लेकिन क्या मैंने वास्तव में गाय को जाना है, या गाय के विषय में अपनी एक अवधारणा को लगातार अधिक मजबूत किया है? गाय ने स्वयं मुझे कभी नहीं बताया कि उसका नाम गाय है, उसने स्वयं मुझे यह नहीं समझाया कि कौन-सा भोजन उसके लिए लाभदायक है और कौन-सा हानिकारक है, मैंने उसे देखा, उसके व्यवहार का निरीक्षण किया, दूसरे मनुष्यों के ज्ञान को ग्रहण किया और अपनी बुद्धि के आधार पर उसके बारे में निष्कर्ष निकाले, इन निष्कर्षों में से अनेक सही और उपयोगी हो सकते हैं, लेकिन क्या इनसे यह सिद्ध हो जाता है कि मैंने गाय की संपूर्ण वास्तविकता को जान लिया है? गाय और गाय के बारे में मेरी अवधारणा दो अलग बातें हैं, गाय मेरे सामने उपस्थित एक जीव है, जबकि उसकी अवधारणा मेरी बुद्धि में निर्मित समझ है, अवधारणा मुझे गाय को पहचानने और उसके साथ व्यवहार करने में सहायता कर सकती है, लेकिन यह मान लेना कि मेरी अवधारणा ही गाय की संपूर्ण वास्तविकता है, ये एक गलत बात होगी। अब इस उदाहरण का दूसरा पक्ष देखिए। मैं गाय की ऐसी नस्ल तैयार करने का प्रयास करता हूँ, जो अधिक दूध दे, मेरी दृष्टि में यह एक बड़ी उपलब्धि है, मैं इसे नस्ल सुधार कहता हूँ, क्योंकि मैंने अपनी आवश्यकता के अनुसार गाय की दूध देने की क्षमता बढ़ा दी है, मुझे लगता है कि मैंने गाय को पहले से बेहतर बना दिया है। लेकिन क्या अधिक दूध देना गाय के लिए भी बेहतर है? यदि अधिक दूध देने की क्षमता के कारण उसके शरीर पर अतिरिक्त भार पड़ता है, उसका स्वास्थ्य प्रभावित होता है या उसे चलने-फिरने में कठिनाई होती है, तो मेरे द्वारा निर्धारित सुधार का मापदंड और गाय का कल्याण एक-दूसरे से अलग हो गए, मैंने अपनी आवश्यकता को केंद्र में रखकर एक परिवर्तन किया और फिर उसी परिवर्तन को उन्नति का नाम दे दिया। गाय ने मुझे कभी यह प्रमाणपत्र नहीं दिया कि अब वह पहले से अधिक पूर्ण हो गई है, मैंने ही अपनी आवश्यकताओं और अपने मापदंडों के आधार पर उसे बेहतर घोषित कर दिया। यहाँ प्रश्न केवल गाय की नस्ल का नहीं है, प्रश्न उस दृष्टिकोण का है, जिसके आधार पर मैं किसी चीज को अच्छा, बुरा, उन्नत या अपूर्ण घोषित करता हूँ। क्या मैंने गाय को उसके अपने संदर्भ में समझने का प्रयास किया, या उसे अपनी आवश्यकताओं के संदर्भ में समझा? क्या मैंने उसके कल्याण को केंद्र में रखा, या अपने लाभ को? क्या मैंने अपनी मान्यताओं की जाँच की, या उन्हें ही सत्य मानकर आगे बढ़ता रहा? जीवन में भी ऐसा ही होता है, हम बचपन से अनेक धारणाएँ ग्रहण करते हैं, हम सीखते हैं कि क्या सुंदर है, क्या कुरूप है, क्या सफलता है, क्या असफलता है, क्या उन्नति है और क्या पतन, इन धारणाओं के आधार पर हम संसार को देखते हैं, उसका मूल्यांकन करते हैं और उसे अपनी इच्छाओं के अनुरूप बदलने का प्रयास करते हैं। धीरे-धीरे हम अपने मापदंडों को ही सत्य का मापदंड मानने लगते हैं, हमें लगता है कि जिस वस्तु में हमारी दृष्टि से कोई कमी है, उसमें वास्तव में कमी है, जिसे हम सुधार रहे हैं, वह वास्तव में अपूर्ण है, और जिसे हम बेहतर बना रहे हैं, वह वास्तव में पहले से बेहतर हो रहा है। लेकिन क्या हमने कभी जाँच की कि हमारे ये मापदंड कहाँ से आए हैं? क्या वे वस्तु की वास्तविकता को व्यक्त करते हैं, या हमारी आवश्यकताओं, इच्छाओं और धारणाओं को? यही प्रश्न प्रकृति और समूचे जगत के विषय में भी उठता है। संभव है कि प्रकृति अपने ढंग से कार्य कर रही हो और हम अपनी सीमित समझ के आधार पर उसमें सुधार करने का दावा कर रहे हों? इसका अर्थ यह नहीं कि प्रकृति में रोग, पीड़ा, विनाश या असंतुलन नहीं हैं, अथवा प्रकृति में होने वाला प्रत्येक परिवर्तन अनिवार्य रूप से अच्छा है, बल्कि प्रश्न यह है कि किसी स्थिति को अपूर्ण और किसी परिवर्तन को सुधार घोषित करने का हमारा आधार क्या है? प्रकृति में हस्तक्षेप करना अपने आप में उसे दूषित करना नहीं है, अनेक परिवर्तन जीवन की रक्षा और पीड़ा कम करने में सहायक भी होते हैं, लेकिन जब हम अपने सीमित दृष्टिकोण को संपूर्ण सत्य मानकर चलते हैं, तब अपनी मान्यताओं को ही प्रकृति का नियम समझने की भूल कर बैठते हैं। इसी प्रकार, संसार के बारे में हमारा ज्ञान भी संसार की संपूर्ण वास्तविकता का पर्याय नहीं है, हम संसार को देखते हैं, अनुभव करते हैं, उसके बारे में विचार करते हैं और फिर उन विचारों के आधार पर संसार की व्याख्या करते हैं, इस प्रक्रिया में हमारे पास जानकारी बढ़ती जाती है, लेकिन जानकारी का बढ़ना और अपनी मूल मान्यताओं की जाँच होना दो अलग प्रक्रियाएँ हैं। यदि हमारी शुरुआती मान्यता ही अपरीक्षित है, तो संभव है कि हमारा आगे का ज्ञान उसी मान्यता को बार-बार पुष्ट करता रहे, हम अपनी धारणाओं के आधार पर संसार को समझें और फिर संसार की अपनी व्याख्या से उन्हीं धारणाओं को सही सिद्ध करते रहें। इस प्रकार ज्ञान का विस्तार होता रहता है, लेकिन यह आवश्यक नहीं कि हमारी समझ की बुनियाद भी सत्य के निकट पहुँच रही हो। यहीं से मनन की दिशा बदल सकती है, प्रश्न केवल यह नहीं रह जाता कि हम संसार के बारे में कितना जानते हैं, बल्कि यह भी हो जाता है कि हम जो जानते हैं, उसे सत्य क्यों मानते हैं? हमारी जानकारी किन आधारों पर निर्मित हुई है? हमारे निष्कर्षों में प्रत्यक्ष अनुभव कितना है, दूसरों से प्राप्त जानकारी कितनी है और हमारी अपनी मान्यताओं का योगदान कितना है? ज्ञानमार्ग की दृष्टि से यह जाँच विशेष महत्त्व रखती है, यहाँ केवल नई जानकारियाँ जोड़ना पर्याप्त नहीं है, अपनी मान्यताओं और धारणाओं की भी जाँच करनी होगी, विशेषकर उन धारणाओं की, जिन्हें हम इतना स्वाभाविक मान चुके हैं कि कभी उन पर प्रश्न ही नहीं उठाते। हो सकता है कि सत्य की खोज में कभी आगे बढ़ने के बजाय पीछे लौटना अधिक आवश्यक हो, अपने ज्ञान के आधार तक लौटना, यह देखना कि हमने किन मान्यताओं को बिना जाँचे स्वीकार कर लिया और कहीं ऐसा तो नहीं कि उन्हीं मान्यताओं के आधार पर हम अपने समूचे अनुभव-जगत की व्याख्या कर रहे हैं? अंततः प्रश्न यह नहीं है कि जगत पूर्ण है या अपूर्ण, अथवा हमारी प्रत्येक धारणा गलत है? प्रश्न यह है कि क्या हम अपनी धारणाओं और जगत की वास्तविकता के बीच अंतर कर पा रहे हैं? क्या हम वास्तव में जगत को जान रहे हैं, या जगत के अनुभवों के आधार पर अपने भीतर निर्मित अवधारणाओं को ही अधिकाधिक पुष्ट कर रहे हैं? और शायद सबसे मूलभूत प्रश्न यह है कि " जिसे मैं जगत का ज्ञान कह रहा हूँ, उसमें जगत कितना है और मेरी मान्यताएँ कितनी हैं?"