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अनुभवकर्ता स्तुति
स्वप्रकाश
इस कविता में संकेतों के माध्यम से मैंने अनुभवकर्ता के स्वरुप का वर्णन करने का प्रयास किया है। यहाँ पर नकारात्मक ज्ञान एवं नेति-नेति विधि का प्रयोग किया गया है। जिन्होंने आत्मज्ञान प्राप्त किया है वे इसे भली भांति समझ पाएंगे। असीम अनुपम अनन्त आनन्द शून्य स्वरूप चिदंबरम। अजर अमर निश्चल प्रकाश रूपा सर्व साक्षी ब्रह्मनम।। अनाम अरूप सत्य शाश्वत सर्व साथी निराकरम। अद्वैत तत्वम पूर्ण एकम आदियोगी सुंदरम।। निर्लिप्त अस्तित्व नित्य स्थित त्रिकाल वासी वंदनम। अज्ञेय साक्षी असंग प्रेमी त्रिकाल दर्शी निर्गुणम।। जगत दृष्टा, स्वप्न दृष्टा, निद्रा दृष्टा आत्मनम। भूत साक्षी, भविष्य साक्षी, सर्व साक्षी तुझे नमन।। तन भी तू ना, मन भी तू ना, बुद्धि तू ना, ना भावना। यह जगत तू ना, स्वप्न तू ना, निद्रा तू ना, ना अहम ना।। ना कर्म तू, ना कर्ता तू, ना भोक्ता तू, ना कर्म फ़ल तेरे। ना पाप तू, ना पुण्य तू, है उचित अनुचित से परे।। हस्त हीनं, पाद हीनं, उदर हीन, न देह त्वम। मुख विहीनं, नख विहीनं, चक्षु हीन, न जिव्हा त्वम।। कर्ण हीनं, त्वक विहीनं, इंद्रीहीन, त्वम संपूर्णम। अनंत शक्ति, प्रेम शांति असीम सागर चहुं दिशम।। गुरु शरण जाकर ज्ञान पाकर देह से आत्मन हुआ। मन कर्म वाणी शुद्ध कर के पूर्ण शिव में अस्त हुआ।। संसारी बंधन तोड़ कर सब शिव प्रेम में विलय हुआ। अज्ञान नाश से चित्त शुद्ध शान्त बोधि सत्व हुआ।। **दोहा** *गुरु की शरण में जाय के, अज्ञान करो सब नाश। देह भाव को त्याग के, आत्मन में करो वास।।* ॐ गुरुवे नमः ॐ आत्मन नमः ॐ ब्रह्मन नमः ॐ शांति: शांति: शांति: **आभार:** मैं परम श्रद्धेय गुरुदेव श्री तरुण प्रधान जी एवं गुरुक्षेत्र का उनकी शिक्षाओं एवं मार्गदर्शन के लिए आभारी हूँ। संपर्क सूत्र.. साधक: स्वप्रकाश....... ईमेल: swaprakash.gyan@gmail.com
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