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स्मृति क्षेत्र
पुनीत
## स्मृति क्षेत्र अखण्डमण्डलाकारं व्याप्तं येन चराचरम्। तत्पदं दर्शितं येन तस्मै श्रीगुरवे नमः॥ ___________________________________________________________________ यदि इसको बहुत ही साधारण भाषा में समझने का प्रयास किया जाये तो इस तरह होगा। जब एक बच्चा जन्म लेता है तो उसको सब एक नाम से पुकारते है, धीरे धीरे वो उसके स्मृति में अंकित हो जाता है। फिर उसका नाम बुलाते ही बच्चा मुड़कर देखता है।जैसे जैस बच्चा बढ़ा होता है तो चलना कैसे है, वो सीखता है, पहले रेंगता है, हाथ पाव चलाता है, घुटने के बल चलता है फिर एक एक क़दम से धीरे धीरे चलना सीखता है, यह सारी विधियाँ उसके स्मृति में अंकित होती जाती है। फिर यदि उसको एक स्थान से दूसरे स्थान जाना है तो उसकी स्मृति में चलने की जो विधि है उसी से वो चल कर जाता है, यह स्वतः होता है । इसी प्रकार उसके माता पिता कैसे दिखते है उसके स्मृति में अंकित होता जाता है, बाद में फिर देखते ही उसे ज्ञात हो जाता है कि यही मेरे माता पिता है। किसी और को देख कर नहीं कहता है कि यह मेरे माता पिता है। यह स्मृति से आ रहा है। आस-पास के लोग, उनके नाम, शिक्षा, सूचना सब स्मृति में अंकित होता जाता है। फिर उसकी पूरी दुनिया उसके स्मृति में होती है। इस प्रकार उसका, इस जन्म के संस्कार स्मृति में छपकर स्मृति क्षेत्र का निर्माण करते है, जिसे जीव स्मृति कहते है। अब एक प्रयोग करते है : यदि उससे बोला जाये कि कोई एक नया रंग सोचो उसकी कल्पना करो जो कभी ना देखा हो तो बहुत ही कठिनाई मालूम होगी क्योंकि स्मृति में ऐसा कोई रंग ही नहीं है। आप सिर्फ़ वही रंग की कल्पना कर सकते है जो आपकी स्मृति में है। वैसा ही स्वाद और सुगंध के साथ भी होता है। अत: हम कह सकते है कि हमारा पूरा जीवन हमारी स्मृति से आता है। यदि गहरे में सोचा जाये तो पूरा का पूरा लोक स्मृति से ही बना है। यदि स्मृति नहीं तो कुछ नहीं। अब इसमें आगे बढ़ते है। अभी तक जिस भी स्मृति की बात की वह जीव की इस जन्म की स्मृति थी, उसी प्रकार उसके अनेकों जन्म की स्मृतियाँ भी स्मृति क्षेत्र में संस्कार के रूप में अंकित है, जिसे कारण शरीर कह देते है। कारण शरीर में बची हुई इच्छाएँ अगले जन्म का कारण बनती है जो की प्रारब्ध के रूप में जीव में उतरती है। सोते समय हम स्वप्न लोक के स्मृति क्षेत्र में पहुँचते है। मृत्युपरांत दूसरे प्रकार के स्मृति क्षेत्र में पहुँचते है। इसी प्रकार विभिन्न लोकों के विभिन्न स्मृति क्षेत्र है. अब इसमें यदि चित्त के स्वयं संगठन और स्वसमानता का नियम लगा दिया जाये तो, कई जीव स्मृति से कारण शरीर बनता है, अनेक कारण शरीर से मिलकर महास्मृति बनता है और अनेक महास्मृति मिलकर विश्वस्मृति का निर्माण करती है। विश्व स्मृति ही आकाशिक स्मृति है। सब कुछ वही से आ रहा है, भूत, भविष्य, कल्पनाएँ आदि। यदि साधक आकाशिक स्मृति का प्रयोग करना सीख जाए है तो उसकी प्रगति निश्चित है। सोचने योग्य बात : - बच्चा जब जन्म लेता है उसे कैसे पता होता कि दूध कैसे पिया जाता है? - बचपन में कुछ बच्चों का व्यवहार, परिवार के बाकी सदस्यों से अलग होता है, वो संस्कार कहाँ से आ रहे है? - फ़ोन पर बात करते-करते व्यक्ति गाड़ी या साइकिल चलाते चलाते रास्ते पर अपने घर की तरफ़ कैसे चला जाता है? किसी और के घर क्यों नहीं चला जाता - बारिश होने से पहले चिटियों को कैसे पता कि धरती से बाहर आना है? इस प्रकार और भी उदाहरण भरे पड़े हैं एक छोटा सा प्रयास, धन्यवाद!
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