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ज्ञानतरंग: "मुक्ति और बंधन "
जानकी
"ज्ञानतरंग" सद्गुरूदेव श्री तरुण प्रधान जी द्वारा विभिन्न सत्संग, प्रवचन और लेखों में व्यक्त किए गए कुछ मुख्य विचारों का संकलन है। इस भाग में "मुक्ति और बंधन" से संबंधित कुछ ज्ञानतरंगों को प्रश्तुत किया गया है। यह श्रृखला के रुपमें इससे आगे भी क्रमश: प्रकाशित होता रहेगा। **मुक्ति और बंधन** १। ज्ञानमार्ग में अज्ञान से मुक्ति यानि आत्मज्ञान ही मुक्ति है, बंधन का नाश होना मुक्ति है, और कोई मुक्ति नहीं। २। मुक्ति का अर्थ व्यक्तिनिष्ठ और ऐच्छिक है। एक की मुक्ति दूसरों से नहीं मिलती। ३। आसक्ति में दुःख है, बंधन है; त्याग में सुख और मुक्ति है। ४। बंधन और दुःख स्वयं का है। ५। चित्त का नियम ही बंधन है, यही कारण माया उपयोगी है। यदि वह अनियमित होता और अपने हिसाब से चलता तो न सृष्टि होती, न जीवन होता, न बंधन। ६। जब तक जीवन है तब तक बंधन अटल है। ७। बंधन मानसिक है, इसलिए घटनाओं को बदलकर नहीं, आसपास के वातावरण को बदलकर नहीं, स्वयं को बदलकर मुक्त होना है। ८। सभी दुःखों का कारण अज्ञान है। ज्ञान ही मुक्ति दिलाता है। ९। इच्छाओं को मेरा मान लेना ही बंधन है, इच्छाओं के पीछे भाग जाना दुःख का कारण है। १०। अज्ञानी को माया ने बांधा है, इसलिए वह दुःखी है। अर्धज्ञानी माया को बांधना चाहता है, इसलिए वह दुःखी है। ज्ञानी जानता है मैं ही माया हूँ, और वह सुखी है। ११। शरीर ने मुझे नहीं पकड़ा है, मैंने शरीर को पकड़ा है यही आसक्ति बंधन का कारण है, शरीर तो एक यन्त्र मात्र है; शरीर ही हमें प्रतिपल छोड़ रहा है। १२। जो नियम के बंधन में है उनको नियमित दिखाई पड़ता है, माया वह दिखा देती है जो वह चाहती है, जो जीव चाहता है। १३। संसार को छोड़ना कायरता है, जिससे संसार छुट गया वह संन्यासी है, मुक्त है। १४। व्यक्ति अद्वैत के स्तर तक नहीं पहुँच सकता। व्यक्ति से मुक्ति अद्वैत है। १५। मुक्ति कुछ करने से नहीं मिलती, कुछ न करने से मिलती है। १६। जिसमें निवेश था वह असत्य निकला, बंधन निकला, निरस निकला, इसी का नाम विरक्ति है। ये प्रगतिका चिन्ह है, ज्ञान के बाद अपने आप होता है। १७। जो नहीं है वह हो नहीं सकता। जब घर में भूत नहीं है उसको भगाया नहीं जा सकता। चित्त माया है, यानि कि नहीं है तो उसका विलय भी नहीं हो सकता। १८। चित्त के नियम से मुक्ति चित्त का नियम का ही उपयोग करके मिलती है। १९। माया में कर्म के नियम से छुटकारा संभव नहीं है। कर्म मेरा नहीं है यह जानना और अनावश्यक का त्याग से ही कर्मबंधन से मुक्ति संभव है। २०। वासनापूर्ति ही वासनामुक्ति की ओर ले जाती है। २१। कर्मों से मुक्ति संभव नहीं है, कर्मबंधन से मुक्ति संभव है, चेतना से कर्मबंधन नष्ट हो सकता है। २२। अज्ञान का बंधन ही कर्मबंधन है। जो कर्म अकर्ता भाव से होता है उसका संस्कार नहीं बनता, कर्मबंधन नहीं बनता। २३। कर्म का त्याग कर्महीनता नहीं है। मैं कर्ता नहीं हूँ ये कर्महीनता है। २४। मुक्ति के लिए कर्मबंधन से मुक्त होना चाहिए। २५। कोई भी सांसारिक कार्य बड़ा नहीं है। जो कर्म स्वयं को और दूसरों को इस लोक से मुक्ति दिलाए वही बड़ा और पुण्य का कार्य होता है। २६। साधकों की सेवा उत्तम सेवा है, सांसारिक लोगों की सेवा का भी दुरूपयोग होता है। २७। कर्म करके तो सभी संतुष्ट/असंतुष्ट हैं; जो न करके संतुष्ट है वह आनंद में है, मुक्त है। २८। जो मुक्ति के शीखर पर है वह अकेला होता है। मुक्ति/स्वतंत्रता की किमत अकेले होकर चुकाई जाती है। क्योंकि भीड़ अज्ञानीओं के आसपास ही जमा होती है। २९। साधक में भी सभी वृत्तियाँ होती है लेकिन वह शांत दिखाई देता है, क्योंकि वह चेतना के प्रकाश में है, मुक्त है। ३०। आम व्यक्ति का लक्ष्य सुख और मुक्ति है, साधक का लक्ष्य मनुष्य जीवन से मुक्ति है और ज्ञानी पहले से मुक्त है। ३१। अनुभवकर्ता सदा मुक्त है, जिसको मुक्ति चाहिए वह अज्ञान है। ३२। हर तरहका संभावना व्यक्त करना मेरा स्वभाव है; यही मुक्ति है, स्वतंत्रता है। ३३। जन्म-मृत्यु माया के खेल है। मैं ही नहीं हूँ- यही मुक्ति है। ३४। जिससे मुक्ति चाहिए वह ही माया है, वह ही स्वप्न है, मैं क्या हूँ जानना ही परम मुक्ति है, और यह अभी संभव है। ३५। जीव की मुक्ति नहीं होती, जीव से मुक्ति हमेशा है। ३६। मनुष्य जीवन से मुक्ति का अर्थ ऊपरी योनियों में विकास करना है। ३७। संसार ही निर्वाण है, मुक्ति के लिए संसार को होकर ही गुज़रना पड़ता है। ३८। मुक्ति का मार्ग जीवन से बचके नहीं, जीवन से होकर जाने में है। ३९। शरीर को मैं मानना और इच्छाओं की अधिकता बंधन है। ४०। मुक्ति भी खेल है और बंधन भी खेल है, ज्ञानमार्ग में कर्महीनता लक्ष्य है। ४१। न कर्म है न बंधन है, सब मन गढंत है, जो काम की चीज है उसका उपयोग कर लिया जाता है। ४२। मिथ्याकरण से जिसको सत्य मान लिया था उससे मुक्ति हो जाती है। अज्ञेयता रह जाता है वह अज्ञेयता मैं स्वयं हूँ; यहाँ पर बुद्धि संतुष्ट हो जाता है। ४३। भ्रम से बाहर रहने का सोच भी भ्रम ही है। व्यक्ति कभी भी माया से छुटकारा नहीं पा सकता। इसलिए मुक्ति कभी प्रयत्न से नहीं मिलती। ४४। स्वतंत्रता में ख़तरा है, बंधन में सुरक्षा है, इसलिए जीव बंधन पसंद करता है। ४५। इच्छाओं की अधिकता बंधन है। इच्छापूर्ति के फेर में रहना गुलामी है, नियंत्रण स्वाधीनता है। ४६। इच्छाओं का अंत परमानंद है। इच्छाएं मेरी नहीं, यह ज्ञान मुक्ति की कुंजी है। ४७। किसी चीज से बंधा नहीं होना स्वतंत्रता है। तत्व का ही स्वतंत्र अस्तित्व है, नामरुप का नहीं; जो भी प्रकट है वह बंधन में है। ४८। जो बदलता है उस का स्वतंत्र अस्तित्व नहीं हो सकता और साक्षी को बाध्य करनेवाला कोई चीज़ नहीं होता। ४९। मेरा जन्म लेना संभव नहीं है, मैं तो इस चक्र से पहले से ही मुक्त हूँ। इस ज्ञान से यहीं इसी क्षण मेरी मुक्ति संभव है। ५०। मुक्त हुए हो तो मुक्त रहो। ५१। संबंध निर्भरता के लिए है, निर्भरता बंधन है। जब तक जीवन की इच्छा है कोई न कोई बंधन रहेगा। ५२। संसारी लोग अधिक जमा करने में और "सफल" होने में व्यस्त रहते हैं। उनको जब बोध होता है, तब तक कर्मबंधन जमा हो चुका होता है। ५३। किसी को कुछ देकर भूलना चाहिए; यदि याद रखा तो त्यागा नहीं है, क्योंकि वहाँ कोई उमीद रह गई है, यही बंधन है। ५४। सुख मिला तो वहीं पड़े रहेंगे, दुःख मिला तो मुक्ति मिलेगी। ५५। सब चीज यहीं है, जो आवश्यक है वह लेना है और जो अनावश्यक है वह छोड़कर मुक्त होना है। ५६। जैसे नाव लहर को रोक नहीं सकता; उसके ऊपर तैर सकता है उसी तरह जीव भी नाद के नियमों को तोड़ नहीं सकता लेकिन इसी का उपयोग करके ऊपर जा सकता है, मुक्त हो सकता है। ५७। सत्य जानने के लिए विभाजन हटाना ज़रूरी है। विभाजन के बिना जीवन नहीं है, जीवन के बिना ज्ञान नहीं है, ज्ञान के बिना मुक्ति नहीं है। ५८। ज्ञान और मुक्ति किसी को नहीं होती, क्योंकि जो ये ढूँढने गया था मिलने के साथ ही व्यक्ति नहीं बचता, तत्व बन जाता है। ५९। मुक्ति के बारे में अध्यात्म में सभी का सार है: आवागमन का अंत, जीव का अंत, संसार का अंत, दुःख का अंत, कर्म का अंत। ६०। जो मुक्त है वह सदा मुक्त है और जो बंधन में है वह सदा बंधन में है। क्रमश:
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