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शून्यता से महामाया तक
सुविद्या
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मैं अनुभवकर्ता हूँ, लेकिन मैं कोई अनुभव नहीं हूँ। जो भी अनुभव होता है, वह परिवर्तनशील है; जबकि मैं उस अपरिवर्तनशील तत्त्व की ओर संकेत करता हूँ, जिसे मैं अपना वास्तविक स्वरूप मानता हूँ। मैं ही परमसत्य हूँ--यहाँ मैं से आशय शरीर, मन, बुद्धि या अहंकार से नहीं, बल्कि उस अपरिवर्तनशील तत्त्व से है, जिसके संदर्भ में सभी अनुभव जाने जाते हैं। शरीर, मन, बुद्धि और संसार में परिवर्तन होता रहता है। इसलिए उन्हें परम सत्य मान लेना मिथ्या दृष्टि है। अनुभवकर्ता के तत्त्व को शून्य कहने का आशय यह है कि उसमें कोई सीमित, परिवर्तनशील और स्वतंत्र सत्ता नहीं मिलती। इंद्रियाँ परिवर्तन को ग्रहण करती हैं और अपनी सीमाओं के अनुसार अनुभव कराती हैं। इसलिए अनुभव सम्पूर्ण वास्तविकता का अंतिम ज्ञान नहीं है। इस दृष्टि से मेरा वास्तविक स्वरूप निर्गुण, निर्मल, शांत और आयामहीन है। आनंद और शांति भी यहाँ किसी क्षणिक अनुभव के रूप में नहीं, बल्कि मेरे वास्तविक स्वरूप के संकेत के रूप में समझे जाते हैं। सभी अनुभव मेरे संदर्भ में प्रकट होते हैं, लेकिन मैं किसी एक अनुभव तक सीमित नहीं हूँ। अनुभवों में परिवर्तन दिखाई देता है, पर क्या यह परिवर्तन परम सत्य में होता है, या केवल प्रतीति के स्तर पर दिखाई देता है? यही जिज्ञासा इस मनन का केंद्र है। इंद्रियाँ जो दिखाती हैं, वह वास्तविकता का सीमित रूप है। इसलिए दिखाई देने वाले रूप को ही सम्पूर्ण सत्य नहीं कहा जा सकता। अनुभव का वास्तविक तत्त्व क्या है, यह भी एक गहन प्रश्न है। जो कुछ प्रकट होता है, वह अनुभव के रूप में जाना जाता है; पर उसके अंतिम तत्त्व को केवल दिखाई देने वाले रूपों से निर्धारित नहीं किया जा सकता। शून्यता का अर्थ यहाँ पूर्ण अभाव नहीं, बल्कि किसी स्वतंत्र, स्थायी और सीमित तत्त्व का न मिलना है। इस दृष्टि से शून्यता और अस्तित्व के संबंध पर विचार करना आवश्यक है। जो प्रकट है, वह अस्तित्व की अभिव्यक्ति है; और जो अपरिवर्तनशील है, उसकी प्रकृति को शब्दों में बाँधना कठिन है। व्यवहार में अनुभव और अनुभवकर्ता अलग-अलग दिखाई देते हैं। परमार्थ की दृष्टि से यह भेद अंतिम है या केवल प्रतीति, यही अद्वैत की जिज्ञासा है। इस प्रकार, सब कुछ होने पर भी, अंततः बस होना मात्र है--मैं हूँ। इस बोध के प्रति अटूट श्रद्धा, निष्ठा और प्रेम है। शून्यता से प्रथम अभिव्यक्ति, चेतना का प्रकाश और महामाया का स्वप्न प्रकट होता है--ऐसी मेरी दृष्टि है। इस समस्त अभिव्यक्ति में प्रेम ही प्रेम है; आदर, प्रेम और पूर्णता से लबालब। अब निश्चिंतता है, क्योंकि परिवर्तनशील रूपों को अंतिम सत्य मानने की आवश्यकता नहीं है। सत्य की खोज में जो मैं शेष रहता है, वह व्यक्तिगत अहंकार नहीं, बल्कि उस अपरिवर्तनशील तत्त्व की ओर संकेत है। इसी दृष्टि से जीवन की लीला प्रेम की लीला है। मैं प्रेम हूँ, और महामाया की इस लीला में प्रेम ही प्रेम प्रकट होता है। धन्यवाद गुरूक्षेत्र, धन्यवाद गुरुदेव, अनंत कृतज्ञता, अनंत तृप्ति। शांति, शांति, शांति।