Wise Words
मन
दिप्तज्योती
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मन के बारे में जब भी हम बात करते हैं,,तो हम अनुभव करते हैं कि यह भी अनुभव है।।परंतु एक असीमित फैलाव का बोध होता है,,जिस पर विचार या भाव की बाढ़ है। जो इस मन का ही रूप अहम , विचार या भाव के रूप में मिलता है।।कभी कभी ये निर्विचार के रूप में भी हमसे खेल खेलता है।।तो आखिर कैसे इसकी असत्यता की पहचान हो,ये गहरी बात है।। जो निर्विचार को,और विचार दोनों ही दशा को जान रहा है,,जो साक्षी स्वरूप अनुभवकर्ता है, वो ही आपका स्वरूप अचल,अटल सत्य है। मन इतना चंचल है जैसे कि पारा।।जिस प्रकार पारा यदिि उच्च स्थान से गिर जाए तो उसे उठाना बहुत कठिन होता है।हाथ लगाते ही वह एक से अनेक टुकड़ों में बिखर जाता है।।ठीक इसी प्रकार यह मन रूपी पारा अपने मूल स्थान से आत्म पद से विषय रूपी गड्ढे में गिर गया है।। गिरने पर यह कल्पना, भावना, विचार इत्यादि अनेक नाम रूपों में बिखर गया है।। अब यदि कोई एक विचार को रोकना चाहे, तो अनेक विचार पैदा हो जाते हैं। कल्पना को रोकना चाहे तो कल्पना का बाजार लग जाता है। परंतु मन का एक बड़ा ही निर्मल स्वभाव है, कि वह नित्यानंद स्वयं के स्वरूप में ही डुबकी लगाकर शांत व तप्त होता है। क्योंकि वह देहिक, दैविक और भौतिक तीनों तापों को सह करके संतप्त हो चुका है।। इसलिए यह अपने स्वरूप की तरफ लौटने में आनंद को अनुभूत करता है।।और स्वयं में लय कर अस्तित्व हो जाता है।।