Wise Words
समर्पण
जानकी
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<br><br> <div style="max-width:100%"> <img width="500px" src="https://blogger.googleusercontent.com/img/a/AVvXsEiHo157iEOuAzZRRmw_nL-J-ExH2klvo7x70xgR_QDHz2V24wocYYBCs1U_l6IFlB6ysYsI_2SkV5skDxDqfhkCWV5RS9ulEU5n-1sOKyHd9RX7PtoHaLuqDD3D827j6JQLvbj-fK3q4FYA_AZKGI-Fe57cjoLiizI23Zzn2a39DMCCoE9jJjqZ71okzXA=w320-h236" alt="Any Width"> </div> <br><br> कहाँ थी विगत में स्वयं को न जानी। यही देह, मन् को सदा श्रेष्ठ मानी॥ मिलाये स्वयं से धूलि थी चरण की। अहोभाग्य मेरा मैं शिष्या तरुण की॥२ यही आवरण को अटल सत्य माना। दिखाये जो पर्दा पिछे का ख़ज़ाना॥ सिंहासन दिलाये अपेक्षा शरण की। स्वयं से जलन् है मैं शिष्या तरुण की॥२ न ही श्रेय चाहे न श्रेष्ठाभिलाषा। करुणा, क्षमाशील सभी को दिलासा॥ सदा ज्ञान प्रवाह सरि तेज अरुण की। अवश्य था पुण्य हूँ शिष्या तरुण की॥२ यहाँ थे गुरु, मार्ग, वाणी अनेक। वही प्रिय, शुद्ध करोड़ों में एक॥ नहीं जानती क्यूँ गुरु आप वरण की। यही जानती बश हूँ शिष्या तरुण की॥२ न मालूम कहाँ हूँ जीवन में मरण में। यही जानती हूँ हमेशा शरण में॥ गुरु है शिखर में मैं शुरू चरण की। न डर है न चिंता हूँ शिष्या तरुण की॥ नहीं जानती कुछ न अज्ञान गाऊँ। हमेशा गुरुदेव मैं सानिध्य पाऊँ॥ न आराधना देव, अग्नि, वरूण की। सगर्व कहूँ नित्य शिष्या तरुण की॥२ जहाँ आप न मिले वो स्वप्न न आए। गुरुदेव बिना तो न जागृति भाए॥ सुगन्ध बिखेरूँ सरि फूल चरण की। मैं स्रष्टा से ज़्यादा हूँ शिष्या तरुण की॥२ वहाँ स्वार्थ कैसा जहाँ तन मनार्पण। स्वीकारें गुरुदेव प्रेमिल समर्पण॥ पवित्र, सुनम्य सरि जल चरण की। मैं द्रष्टा से ज़्यादा हूँ शिष्या तरुण की॥२ ***